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Showing posts from July, 2021

हमारे समय का अनुपम आदमी : अनुपम मिश्र

“हमारे समय का अनुपम आदमी”- प्रभाष जोशी ने अनुपम मिश्र के बारे में यही कहा था। उनके निधन पर वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उनका एक व्यक्ति-चित्र खींचा था, .” सच्चे, सरल, सादे, विनम्र, हंसमुख, कोर-कोर मानवीय। इस ज़माने में भी बग़ैर मोबाइल, बग़ैर टीवी, बग़ैर वाहन वाले नागरिक। दो जोड़ी कुर्ते-पायजामे और झोले वाले इंसान। गांधी मार्ग के पथिक। 'गांधी मार्ग' के सम्पादक। पर्यावरण के चिंतक। 'राजस्थान की रजत बूँदें' और 'आज भी खरे हैं तालाब' जैसी बेजोड़ कृतियों के लेखक।" एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन के उद्गार से अनुपम मिश्र का उक्त चित्र पूरा बनता है, “ स्मार्टफोन और इंटरनेट के इस दौर में वे चिट्ठी-पत्री और पुराने टेलीफोन के आदमी थे। लेकिन वे ठहरे या पीछे छूटे हुए नहीं थे। वे बड़ी तेज़ी से हो रहे बदलावों के भीतर जमे ठहरावों को हमसे बेहतर जानते थे।" सरल, सपाट, टायर से बनी चप्पल पहनने वाले अनुपम एकदम शांत स्वभाव के थे। उनका अपना कोई घर नहीं था। वह गाँधी शांति प्रतिष्ठान के परिसर में ही रहते थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटा, बड़े भा...

बारूद की ढेर से न्याय की गुहार का अर्थ : सोनी सोरी

“सोनी सोरी ( जन्म 15.4.1975 ) भी मादरे हिन्द की बेटी हैं, लेकिन भारत माता की इस बेटी पर 'राष्‍ट्रवादी रक्षकों' ने हमला किया है. मैं जब ये पंक्तियां लिख रहा हूँ, सोनी सोरी दिल्ली पहुँच चुकी हैं. अपोलो अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है. इससे पहले वह जगदलपुर के महारानी जिला अस्पताल में पुलिस और सैन्य बलों से घिरी हुई थीं. पिछली रात उन्हें जगदलपुर से गीदम के रास्ते में, जहाँ उनका घर है, घेर लिया गया. वह मोटर साइकिल पर पीछे बैठी थीं और उनकी सहकर्मी रिंकी मोटर साइकिल चला रही थीं. रिंकी को चाकू दिखाया गया और सोनी को कुछ दूर ले जाकर उन पर हमला किया गया. उनके चेहरे पर कोई जलनेवाली चीज़ मल दी गई जिससे उनका चेहरा सूज गया और उन्हें दिखाई नहीं दे रहा है. उन्हें बोलने में भी परेशानी हो रही है. अभी उनकी सूजन खत्म हो गई है लेकिन देखने और बोलने में दिक्कत बनी हुई है. आज सुबह उन्होंने किसी तरह बताया कि जिन लोगों ने हमला किया उन्होंने धमकी दी है कि अगर उन्होंने मारडुम की मुठभेड़ का मामला उठाना बंद नहीं किया और वहाँ के पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जाँच और कार्रवाई की माँग बंद नहीं की तो यही सलूक उनकी ...

उर्दू की नई आलोचना के प्रमुख स्तंभ- शम्सुर्रहमान फारुकी

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में जन्मे, गोरखपुर में पले बढ़े और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. करके कुछ दिन अध्यापन करने के बाद आई.ए.एस. बनकर पोस्ट मास्टर जनरल के पद से अवकाश ग्रहण करने वाले शम्सुर्रहमान फारुकी ( 30.9.1935-25.12.2020) का उर्दू की नई आलोचना में विशेष स्थान है. क्लासिक्स के प्रति गहरा अनुराग होने के बावजूद वे आधुनिक साहित्य और आलोचना पद्धति के प्रति बहुत सजग हैं. उन्होंने साहित्यिक आलोचना के पश्चिमी सिद्धांतों को आत्मसात किया और बाद में उन्हें उर्दू साहित्य में लागू किया. उन्हें उर्दू आलोचना का टी.एस.इलियट कहा जाता है. काव्य समीक्षा के सभी पहलुओं पर फारुकी साहब की नजर गई है और उन्होंने उसकी बारीकी से जाँच- पड़ताल की है. हिन्दी और उर्दू में प्रगतिशील आन्दोलन एक साथ विकसित हुए थे. शम्सुर्रहमान फारुकी जैसे विद्वान साहित्यकार उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि से अपरिचित हों-यह असंभव है किन्तु एक प्रतिष्ठित नौकरशाह का जीवन जीते हुए समाज के शोषित वर्ग की पीड़ा और आकाँक्षा उन्हें प्रभावित न कर सकी हो, यह स्वाभाविक ही है. उनके पास वर्ग- संघर्ष की वैज्ञानिक दृष्टि का अभाव है...

पाठ-केन्द्रित समकालीन आलोचना के आदर्श : नंदकिशोर नवल

वैशाली जिला (बिहार) के चांदपुरा नामक गाँव में जन्मे, पटना से पढे-लिखे, पटना विश्वविद्यालय में ही शिक्षक रहे और पटना में ही दिवंगत हुए प्रो. नंदकिशोर नवल( 2.9.1937-12.5.2020 ) का समकालीन आलोचकों में विशिष्ट स्थान हैं. ‘हिन्दी आलोचना का विकास’, ‘कविता की मुक्ति’, ‘प्रेमचंद का सौन्दर्य शास्त्र’, ‘शब्द जहाँ सक्रिय है’, ‘यथा प्रसंग’, ‘मुक्तिबोध : ज्ञान और संवेदना’, ‘समकालीन काव्य यात्रा’, ‘दृश्यालेख’, ‘निराला : कृति से साक्षात्कार’, ‘रचना का पक्ष’, ‘शताब्दी की कविता’, ‘पार्श्वच्छवि’, ‘निराला : काव्य की छवियाँ’, ‘निराला और मुक्तिबोध : चार लम्बी कविताएं’, ‘कविता : पहचान का संकट’, ‘आधुनिक हिन्दी कविता का इतिहास’, ‘हिन्दी कविता : अभी बिलकुल अभी’, ‘कविता से आर पार’, ‘सूरदास’, ‘तुलसीदास’, ‘मैथिलीशरण’, ‘रीतिकाव्य’, ‘उत्तरछायावाद और रामगोपाल शर्मा ‘रुद्र’, ‘दिनकर : अर्धनारीश्वर कवि’, ’निकष’, ‘क्रमभंग’, ‘पुनर्मूल्यांकन’, ‘मुक्तिबोध की कविताएं : बिम्ब प्रतिबिम्ब’, ‘हासिया’, ‘रचनालोक’, ‘कवि अज्ञेय’, ‘नागार्जुन और उनकी कविता’ आदि उनकी महत्वपूर्ण समीक्षा कृतियाँ हैं. उन्होंने साहित्य अकादमी के लिए मह...

हिन्दी की संस्कृतनिष्ठता के जनक आचार्य रघुवीर

रावलपिण्डी ( आजकल पाकिस्तान ) में जन्में, लाहौर से एम.ए., लंदन से पी-एच.डी. और हालैंड से डी.लिट्. करने वाले महान भाषाविद्, भारतीय संस्कृति के संरक्षक, राजनेता और महान कोशकार आचार्य रघुवीर ( 30.12.1902-14.5.1963) की स्वाधीनता के बाद राजभाषा हिन्दी के स्वरूप को निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका है. वे संस्कृत, फारसी, अरबी, उर्दू, बांग्ला, मराठी, तमिल, तेलुगू, पंजाबी, जापानी, जर्मन, फ्रेंच और मंगोल भाषा के गहरे अध्येता थे. यूरोप की अधिकाँश महत्वपूर्ण भाषाओं पर उनकी गहरी पकड़ थी. भारतीय संस्कृति की धरोहर को संचित करने के उद्देश्य से उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्राएँ कीं. उन्होंने, ‘इंडियन साइंटिफिक नोमिक्लेचर ऑफ बर्ड्स ऑफ इंडिया, वर्मा एण्ड सीलोन’ ( आंग्ल भारतीय पक्षी नामावली), ‘ए कंप्रिहेंसिव इंग्लिश-हिन्दी डिक्शनरी ऑफ गवर्नमेंटल एण्ड एजूकेशनल वर्ड्स एण्ड फ्रेजेज’, ‘हिन्दी- इंग्लिश डिक्शनरी ऑफ टेक्निकल टर्म्स’, ‘अर्थशास्त्र शब्दकोश’, ‘हिन्दी कथाकोश’ आदि की रचना करके हिन्दी को तकनीकी दृष्टि से समृद्ध करने का महान कार्य किया है. आचार्य रघुवीर के शब्द निर्माण का आधार संस्कृत की संरचना थ...