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Showing posts from September, 2021

23 मार्च को ‘सांप्रदायिक सद्भाव दिवस’ के रूप में मनाया जाए

23 मार्च. भारत माता को खून से लथपथ कर देने वाला, उसका अंग भंग कर देने वाला ऐसा काला दिन जिसे हम बार-बार भूलने की कोशिश करते हैं किन्तु उसका वीभत्स रूप हमारे सामने बार बार उपस्थित होता रहता है. इसी दिन शहीदे आजम भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दी गई थी. इसी दिन पंजाब के मशहूर इंकलाबी कवि अवतार सिंह पाश को खालिस्तानी उग्रवादियों ने गोली मार दी थी और यही 23 मार्च का मनहूस दिन है जब 1940 में मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में मुसलमानों के लिए पृथक पाकिस्तान का प्रस्ताव पास किया था. इसी की परिणति में हमारे देश में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए और देश बँट गया. इन दंगों में लाखों निरपराधों, महिलाओं और बच्चों तक को बेरहमी से कत्ल किया गया और आज भी देश के किसी न किसी हिस्से में यह कत्लेआम जारी है. हम हर साल आजादी का जश्न मनाते हैं. जश्न मनाते- मनाते और विजय के गीत गाते- गाते हम भूल चुके हैं कि जिस मुल्क की आजादी हमें मिली उसे मजहब के नाम पर चंद जिद्दी नेताओं ने पद और कुर्सी के लिए तीन टुकड़ों में बाँट दिया. यह बँटवारा साधारण बँटवारा नहीं था. पाकिस्तान के लिए ‘कायदे आजम’ के खिताब से नवाजे...

राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 : ठेंगे पर राजभाषा

कोविड-19 ने वर्ष 2020 को मानो हाइजैक कर लिया था. सभी तरह की गतिविधियों पर अंकुश लग गया था. किन्तु इन्हीं दिनों सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने का निर्णय लिया. इसपर देश भर में चर्चा होना लाजिमी था. कोरोना के डर से यात्राओं पर तो अंकुश था किन्तु ई-संगोष्ठियों के माध्यम से यह विषय देश भर में छाया रहा. इस बात का खूब प्रचार-प्रसार किया गया कि नई शिक्षा नीति में हिन्दी और मातृभाषाओं को पहली बार बहुत अधिक महत्व दिया गया है, जबकि वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 के भाग-4 में ‘’बहुभाषावाद और भाषा की शक्ति’’ शीर्षक के अंतर्गत अनुच्छेद- 4.11 से लेकर अनुच्छेद- 4.22 तक शिक्षा के माध्यम भाषाओं के प्रश्न पर विस्तार से विवेचन है. इसके अनुच्छेद- 4.14 और अनुच्छेद- 4.20 में विशेष रूप से अंग्रेजी पर जोर है किन्तु हिन्दी का कहीं कोई जिक्र तक नहीं है. पिछली सरकारों द्वारा हिन्दी की लगातार की जा रही उपेक्षा के बावजूद 2011 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार आज भी देश की 53 करोड़ आबादी हिन्दी भाषी है. दूसरी ओर अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या दो लाख साठ हजार, यानी मात्र .02 प...

सरकारी सेवाओं से हिन्दी की बिदाई

इस साल यूपी बोर्ड की परीक्षा में आठ लाख विद्यार्थियों का हिन्दी में फेल होने का समाचार सुर्खियों में था. इधर यूपीपीएससी का रेजल्ट भी महीनों से सुर्खियों में है. 11 सितंबर 2020 को रेजल्ट आया तो उसमें दो तिहाई से अधिक अंग्रेजी माध्यम के अभ्यर्थी सफल हो गए. यह संख्या पहले 20-25 प्रतिशत के आस पास रहती थी. परिणाम आने के दूसरे दिन प्रयागराज के एक प्रतिभाशाली छात्र राजीव पटेल ने निराशा और दबाव में आकर आत्महत्या कर ली. तभी से हिन्दी माध्यम के परीक्षार्थी अपनी मांगों को लेकर प्रयागराज की सड़कों पर आन्दोलन कर रहे हैं. इस साल का यूपीएससी का रेजल्ट भी ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है. यहाँ हिन्दी माध्यम वाले सफल अभ्यर्थियों की संख्या सिर्फ तीन प्रतिशत रह गई है. 97% अभ्यर्थी अंग्रेजी माध्यम वाले सफल हुए हैं. मैने समस्या की तह में जाने की कोशिश की तो सिर घूम गया. देश में अराजपत्रित कर्मचारियों के चयन के लिए कर्मचारी चयन आयोग (स्टाफ सलेक्शन कमीशन) सबसे बड़ा संगठन है. इस संगठन की परीक्षाओं से हिन्दी को पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है. मैंने उसकी वेबसाइट पर जाकर देखा, अध्ययन किया तो सकते में आ गया. ...

डॉ. नौटियाल के जवाब का प्रत्युत्तर

कल की मेरी पोस्ट पर डॉ. नौटियाल की विस्तृत प्रतिक्रिया आयी है. उनके कुछ समर्थकों की भी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. इस संबंध में मुझे दो-तीन बातें कहनी हैं. 1. डॉ. नौटियाल ने कहा है कि, “उन्होंने (मैंने) लेख में जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया है वह भाषा किसी विद्वान को शोभा नहीं देता. अस्तु यह उनकी शैली हो सकती है.” निस्संदेह मेरी भाषा कहीं- कहीं अशालीन हो गई है. किन्तु यह मेरी शैली नहीं है. एक भ्रामक तथ्य को समाज में प्रमाण के रूप में प्रतिष्ठित होता देखकर कहीं- कही मेरी भाषा तल्ख हो गई है. यह लेख अब प्रकाशित हो चुका है और इसमें संशोधन की गुंजाइश नहीं रह गई है ऐसी दशा में मैं इसके लिए सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त करता हूँ. इसके साथ ही मैं अपने लेख को अपेक्षित संशोधनों के साथ वैश्विक हिन्दी सम्मेलन के वेबसाइट पर पोस्ट करने के लिए भेज रहा हूँ और पाठकों से आग्रह करता हूँ कि वे कृपया इस संशोधित लेख को ही प्रमाण मानें. 2. डॉ. नौटियाल के अनुसार मैंने उनकी 2015 की शोध- रिपोर्ट को ही आधार बनाकर अपनी बातें कही हैं जबकि उनके पास 2021 की अद्यतन रिपोर्ट है जिसमें प्रामाणिक तथ्य और नवीनतम आंक...

हिन्दी को लेकर डॉ. नौटियाल का भ्रामक शोध

केन्द्रीय हिन्दी संस्थान ने श्री आनंद कुमार, निदेशक (नीति), गृह मंत्रालय, भारत सरकार को प्रेषित अपने नवीनतम पत्र ( तिथि का उल्लेख नहीं ) में 28.07.2021 को प्रेषित अपने पूर्व पत्र से पल्ला झाड़कर समझदारी का काम किया है. संस्थान की ओर से निदेशक डॉ. बीना शर्मा ने अपने पूर्व पत्र का उल्लेख करते हुए स्पष्टीकरण दिया है और लिखा है, “वर्तमान स्थिति में किसी भी प्रकार के सर्वेक्षण की पुष्टि करना हमारे लिए संभव नहीं है.” निश्चित रूप से संस्थान ने ऐसा करके अपनी प्रतिष्ठा बचा ली है किन्तु डॉ. नौटियाल अति उत्साह में पिछले डेढ़ दशक से समाज में जो भ्रम फैला रहे हैं, उसपर से आवरण हटना बहुत जरूरी है. डॉ. नौटियाल अपने भ्रामक शोध -निष्कर्ष को गृह मंत्रालय तक पहुँचाने और उसकी संस्तुति हासिल करने के लिए हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत देश की सबसे प्रतिष्ठित संस्था केन्द्रीय हिन्दी संस्थान को भी एक बार भ्रमित करने में सफल हो गए थे. अच्छा हुआ जल्दी ही संस्थान को अपनी गलती का अहसास हो गया किन्तु अपना स्पष्टीकरण देते हुए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान और गृह मंत्रालय दोनों की किरकिरी जरूर हुई है. डॉ. जयंती...

आलोचना में समाजवाद के प्रहरी : डॉ. रघुवंश

हरदोई (उ.प्र.) जिले के ‘गोपामऊ’ कस्बे में जन्मे, इलाहाबाद से पढ़े-लिखे और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे डॉ. रघुवंश ( 30.06.1921—23.08.3013 ) का पूरा नाम रघुवंश सहाय वर्मा है. वे आधुनिक साहित्य के समीक्षक हैं. गाँधी और लोहिया के विचारों का प्रभाव उनपर सहज ही देखा जा सकता है. वे न तो साम्यवाद को स्वीकार करते हैं और न पूंजीवाद को. वे लिखते हैं, “ इतिहास का सच्चा और सही विश्लेषण बतलाएगा कि स्वतंत्रता और बराबरी के मूल्यों के अनुभावन के लिए यूरोप के महान राष्ट्रों ने एशिया, अफ्रीका तथा लातीनी अमरीका के देशों को निरंतर पराधीन रखा है और उनका आर्थिक शोषण किया है. इसी प्रकार वर्गों के शोषण को मिटाने के लिए, वर्गहीन समाज की रचना के लिए साम्यवादी देशों को अपने प्रभाव क्षेत्र कायम करने पड़े हैं, उपनिवेश बनाने पड़े हैं और आज भी आर्थिक प्रभाव क्षेत्र बनाए रखने के प्रयत्न जारी हैं. “ ( ‘क ख ग’, अक्टूबर, 65 ). इन दोनों से मुक्ति की आकाँक्षा उन्हें गाँधीवाद की ओर ले जाती है जिसे उन्होंने ‘प्रजातांत्रिक समाजवाद’ कहा है. वे कहते हैं, “ मूलत: मेरे चिन्तन का आधार गाँधी-विचार रहा है. अत: मेरी सत्य,...

करुणा की देवी : माँ टेरेसा

लोग उन्हें ‘मदर टेरेसा’ ( 27.8.1910 – 5.9.1997) के नाम से पुकारते हैं किन्तु ‘माँ’ कहने पर ही उस करुणा की देवी की उपयुक्त छवि मेरे मानस-पटल पर अंकित हो पाती है. हम भारतीयों का हृदय ही कुछ ऐसा है जो ‘माँ’ और ‘मदर’ में भी अर्थभेद करता है. भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने ‘मदर टेरेसा : द अथराइज्ड बॉयोग्राफी’ शीर्षक से माँ टेरेसा की जीवनी लिखी है. माँ टेरेसा पर लिखी जाने वाली पुस्तकों में यह सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक है. चौदह भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है. माँ टेरेसा से उनकी पहली मुलाकात 1975 में हुई थी जब वे दिल्ली के उपराज्यपाल किशन चंद के सचिव हुआ करते थे. माँ टेरेसा ने अपनी एक संस्था का उद्घाटन करने के लिए उपराज्यपाल को आमंत्रित किया था. नवीन चावला ने बीबीसी को बताया, "मैंने एक चीज़ नोट किया कि मदर टेरेसा की साड़ी वैसे तो बहुत साफ़ थी, लेकिन उसको जगह- जगह रफ़ू किया गया था ताकि ये न दिख सके कि वह फटी हुई है. मैंने किसी सिस्टर से पूछा कि मदर की साड़ी में इतनी जगह रफ़ू क्यों किया गया है? उन्होंने बताया कि हमारा नियम है कि हमारे पास सिर्फ़ तीन साड़ियाँ होती हैं...

ऐतिहासिक-सांस्कृतिक आलोचना के शिखर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी

बलिया जिला ( उ.प्र.) के ‘आरत दुबे का छपरा’ नामक गाँव में जन्में, काशी में शिक्षित हुए तथा शान्तिनिकेतन, चंडीगढ़ और काशी में अध्यापन करने वाले आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ( 19.8.1907-19.5.1979) मूलत: साहित्येतिहासकार, आलोचक और अनुसंधानकर्ता हैं. उन्होंने साहित्य को सांस्कृतिक चेतना के स्तर पर देखा है. इसी दृष्टि से उन्होंने अनेक मह्वपूर्ण आलोचना ग्रंथ लिखे हैं और उनके माध्यम से उन्होंने शुक्ल जी के बाद की हिन्दी आलोचना को व्यापक रूप से प्रभावित और पल्लवित किया है. ‘हिन्दी साहित्य कोश’ के अनुसार, “यद्यपि मूलत: द्विवेदी जी, रामचंद्र शुक्ल की परंपरा के आलोचक हैं फिर भी साहित्य को एक अविच्छिन्न परंपरा में देखने पर बल देकर द्विवेदी जी ने हिन्दी समीक्षा को नयी दिशा दी. साहित्य के इस नैरंतर्य का विशेष ध्यान रखते हुए भी वे लोक चेतना को कभी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने देते. वे मनुष्य की श्रेष्ठता के विश्वासी हैं और उच्चकोटि के साहित्य में उसकी प्रतिष्ठा को अनिवार्य मानते हैं. संस्कारजन्य क्षुद्र सीमाओं में बँधकर साहित्य ऊँचा नहीं उठ सकता. अपेक्षित ऊँचाई प्राप्त करने के लिए उसे मनुष्य की विराट ...