23 मार्च को ‘सांप्रदायिक सद्भाव दिवस’ के रूप में मनाया जाए
23 मार्च. भारत माता को खून से लथपथ कर देने वाला, उसका अंग भंग कर देने वाला ऐसा काला दिन जिसे हम बार-बार भूलने की कोशिश करते हैं किन्तु उसका वीभत्स रूप हमारे सामने बार बार उपस्थित होता रहता है. इसी दिन शहीदे आजम भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दी गई थी. इसी दिन पंजाब के मशहूर इंकलाबी कवि अवतार सिंह पाश को खालिस्तानी उग्रवादियों ने गोली मार दी थी और यही 23 मार्च का मनहूस दिन है जब 1940 में मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में मुसलमानों के लिए पृथक पाकिस्तान का प्रस्ताव पास किया था. इसी की परिणति में हमारे देश में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए और देश बँट गया. इन दंगों में लाखों निरपराधों, महिलाओं और बच्चों तक को बेरहमी से कत्ल किया गया और आज भी देश के किसी न किसी हिस्से में यह कत्लेआम जारी है. हम हर साल आजादी का जश्न मनाते हैं. जश्न मनाते- मनाते और विजय के गीत गाते- गाते हम भूल चुके हैं कि जिस मुल्क की आजादी हमें मिली उसे मजहब के नाम पर चंद जिद्दी नेताओं ने पद और कुर्सी के लिए तीन टुकड़ों में बाँट दिया. यह बँटवारा साधारण बँटवारा नहीं था. पाकिस्तान के लिए ‘कायदे आजम’ के खिताब से नवाजे...