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Showing posts from March, 2020

जन्म दिन पर विशेष- हिन्दी के योद्धा : डॉ. राम मनोहर लोहिया ( अपना भारत में प्रकाश्य )

23 मार्च डॉ. राम मनोहर लोहिया का जन्म दिन है. संयोग से 23 मार्च भारत के अमर शहीद सरदार भगत सिंह की शहादत का भी दिन है. इन दोनों विभूतियों के सपने आज भी अधूरे हैं. राम मनोहर लोहिया ( 1910- 1967 ) आजाद भारत के अकेले राजनेता हैं जिन्होंने अपनी भाषा के मुद्दे पर राष्ट्रीय संदर्भ में विचार किया और आंदोलन भी चलाए, क्योंकि वे मानते थे कि बिना भाषा के लोकतंत्र गूंगा-बहरा है. लोहिया के भाषा संबंधी चिंतन में वर्णमाला से लेकर उसकी शिक्षा और शोध तथा भारतीय भाषाओं से उसका संबंध और उसपर अंग्रेजी का कहर आदि सबकुछ शामिल है. वे भाषा को देश की बहुत सारी समस्याओं के निदान की तरह देखते हैं. मस्तराम कपूर द्वारा संपादित ‘लोहिया रचनावली’ के एक खंड में उनके भाषा संबंधी चिंतन पर लगभग पाँच सौ पृष्ठ शामिल हैं. डॉ. लोहिया ने भाषा संबंधी जिन मुद्दों पर विचार किया है उनमें सामंती भाषा बनाम लोक भाषा, देशी भाषाएं बनाम अंग्रेजी, हिन्दी क्या है?, उर्दू जबान, अंग्रेजी हटाना- हिन्दी लादना नहीं तथा हिन्दी के सरलीकरण की नीति प्रमुख हैं. लोहिया जानते थे कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में अंग्रेजी का प्रयोग आम ज...

हिन्दी में शोध का धंधा ( सबलोग के मार्च 2020 के अंक में प्रकाश्य )

उच्च शिक्षा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि है अनुसंधान, उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दायित्व है अनुसंधान और उच्च शिक्षा का सर्वाधिक उपेक्षित क्षेत्र है अनुसंधान. आज के अनुसंधान की दशा देखकर लगता है कि शोध को उपाधि का पर्याय मान लेना आधुनिक भारत की एक दुर्घटना है और इसके लिए हमारी वह व्यवस्था सबसे ज्यादा जिम्मेदार है जिसने इसे नौकरी से जोड़ दिया और इस तरह मांग और पूर्ति के गणित में उलझा दिया. यह सही है कि सभ्यता के विकास में अबतक जो कुछ भी हमने अर्जित किया है वह सब अनुसंधान की देन है और जिज्ञासु मनुष्य, साधनों के अभाव में भी अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण अनुसंधान से जुड़ा रहता है. जेम्सवाट ने किसी प्रयोगशाला में पता नहीं लगाया था कि भाप में शक्ति होती है और न तो धरती में गुरुत्वाकर्षण की शक्ति का पता लगाने के लिए न्यूटन को किसी प्रयोगशाला मे जाना पड़ा था. उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति ने अभावों में भी उन्हे इतने बड़े सत्य के उद्घाटन के लिए विवश कर दिया. हिन्दी में अनुसंधान की नींव एक विदेशी जिज्ञासु ने अपने व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक दायित्व निभाने के लिए रखी थी, वे थे ‘गार्सां ...

‘गाँधीवादी आलोचक’ आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ( अभिदेशक, सुल्तानपुर मे प्रकाशनार्थ प्रेषित )

शीर्षक में मैंने गाँधीवादी आलोचक शब्द को इनवर्टेड कामा में रखा है क्योंकि हिन्दी में गाँधीवादी आलोचना की किसी परंपरा का जिक्र नहीं मिलता. यह मुद्दा हमें नए सिरे से अध्ययन की चुनौती देता है. भारतीय राजनीति के रंगमंच पर महात्मा गाँधी का पदार्पण और हिन्दी साहित्य के मंच पर छायावाद का पदार्पण लगभग एक साथ होता है. अकारण नहीं है कि साहित्य की सभी विधाओं पर गाँधीजी का गहरा प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है. हिन्दी के कवियों ने उन्हें ‘दिव्यात्मा’ और ‘युगावतार’ तक कहा है. उनके व्यक्तित्व पर असंख्य कविताएँ लिखी ही गईं है, कई महाकाव्य लिखे गए हैं. गोपालशरण सिंह ने बीस सर्गों का ‘जगदालोक’ नामक महाकाव्य, ठाकुरप्रसाद सिंह ने ‘मृत्युंजय’ तथा नटवरलाल स्नेही ने ‘गाँधीचरितमानस’ लिखा. भवानीप्रसाद मिश्र ने ‘गाँधी पंचशती’ और सोहनलाल द्विवेदी ने ‘गाँधी शतदल’ लिखा। सियारामशरण गुप्त ने ‘बापू’ लिखा जिसमें उन्हें ‘कालातीत’, ‘आत्मालोक’, ‘कालजयी’ आदि कहकर संबोधित किया. सुमित्रानंदन पंत ने अपने ‘लोकायतन’ में उन्हें इष्टदेव के रूप में देखा और लिखा कि “देखा न चरित्र धरा ने तुमसा समग्र संयोजित”. सोहनलाल द्विवेदी ने लिख...

हिन्दी में गांधीवादी आलोचना क्यों नहीं ? ( 2 फरवरी 2020 को जनसत्ता में )

हिन्दी आलोचना पर केन्द्रित जितनी भी पुस्तकें आजतक लिखी गई हैं, उनमें मार्क्सवादी, मनोविश्लेषणवादी आदि विदेशी दर्शनों से परिचालित आलोचना पद्धतियों की चर्चा तो विस्तार से की गई है किन्तु गाँधीवादी आलोचना पद्धति का कोई उल्लेख नहीं मिलता है, जबकि साहित्य की सभी विधाओं पर महात्मा गाँधी का गहरा प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है. हिन्दी के कवियों ने तो उन्हें ‘दिव्यात्मा’ और ‘युगावतार’ तक कहा है। उनके व्यक्तित्व पर असंख्य कविताएँ लिखी ही गईं है, कई महाकाव्य लिखे गए हैं. गोपालशरण सिंह ने बीस सर्गों का ‘जगदालोक’ नामक महाकाव्य, ठाकुरप्रसाद सिंह ने ‘मृत्युंजय’ तथा नटवरलाल स्नेही ने ‘गाँधीचरितमानस’ लिखा। भवानीप्रसाद मिश्र ने ‘गाँधी पंचशती’ और सोहनलाल द्विवेदी ने ‘गाँधी शतदल’ लिखा। सियारामशरण गुप्त ने ‘बापू’ लिखा जिसमें उन्हें ‘कालातीत’, ‘आत्मालोक’, ‘कालजयी’ आदि कहकर संबोधित किया। सुमित्रानंदन पंत ने अपने ‘लोकायतन’ में उन्हें इष्टदेव के रूप में देखा और लिखा कि “देखा न चरित्र धरा ने तुमसा समग्र संयोजित”। सोहनलाल द्विवेदी ने लिखा, “तुम बोल उठे, युग बोल उठा / तुम मौन बने युग मौन बना।” सुकवि ज्योतिषी ने ल...

हिन्दी के विशेषज्ञों की विशेषज्ञता ? ( जनसत्ता 22 मार्च 2020 )

देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के चयन के लिए एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा ‘नेट’ अर्थात ‘नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट’ अथवा ‘राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा’ उत्तीर्ण करना अनिवार्य है. यह परीक्षा प्रतिवर्ष दो बार ( जून और दिसंबर ) में एन.टी.ए. ( नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ) दावारा आयोजित की जाती है और इसका पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अपने विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार करता है. देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित इस परीक्षा के लिए यू.जी.सी. ने हिन्दी का जो नया पाठ्यक्रम तैयार किया है वह हमें चौंकाता है. आगामी जून में होने वाली परीक्षा इसी पाठ्यक्रम पर केन्द्रित होगी. पूरा पाठ्यक्रम यू.जी.सी. की वेबसाइट पर मौजूद है. यह पाठ्यक्रम कुल दस इकाइयों में विभक्त है. इनमें से प्रत्येक इकाई पर समान अंक निर्धारित हैं. परीक्षार्थियों से दो –दो अंकों के कुल सौ प्रश्न अर्थात दो सौ अंकों के वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाएंगे. इनमें से अन्तिम दस प्रश्न दिए गए दिए गए अवतरणों पर केन्द्रित होंगे और बाकी अस्सी प्रश्न निर्धारित पाठ्यक्रम पर. तात्पर्य यह कि प्रत्येक इकाई से आठ प्रश्न पूछे जाने की संभावना है. सबसे पहले मैं पाठ्...