पाठ-केन्द्रित समकालीन आलोचना के आदर्श : नंदकिशोर नवल
वैशाली जिला (बिहार) के चांदपुरा नामक गाँव में जन्मे, पटना से पढे-लिखे, पटना विश्वविद्यालय में ही शिक्षक रहे और पटना में ही दिवंगत हुए प्रो. नंदकिशोर नवल( 2.9.1937-12.5.2020 ) का समकालीन आलोचकों में विशिष्ट स्थान हैं.
‘हिन्दी आलोचना का विकास’, ‘कविता की मुक्ति’, ‘प्रेमचंद का सौन्दर्य शास्त्र’, ‘शब्द जहाँ सक्रिय है’, ‘यथा प्रसंग’, ‘मुक्तिबोध : ज्ञान और संवेदना’, ‘समकालीन काव्य यात्रा’, ‘दृश्यालेख’, ‘निराला : कृति से साक्षात्कार’, ‘रचना का पक्ष’, ‘शताब्दी की कविता’, ‘पार्श्वच्छवि’, ‘निराला : काव्य की छवियाँ’, ‘निराला और मुक्तिबोध : चार लम्बी कविताएं’, ‘कविता : पहचान का संकट’, ‘आधुनिक हिन्दी कविता का इतिहास’, ‘हिन्दी कविता : अभी बिलकुल अभी’, ‘कविता से आर पार’, ‘सूरदास’, ‘तुलसीदास’, ‘मैथिलीशरण’, ‘रीतिकाव्य’, ‘उत्तरछायावाद और रामगोपाल शर्मा ‘रुद्र’, ‘दिनकर : अर्धनारीश्वर कवि’, ’निकष’, ‘क्रमभंग’, ‘पुनर्मूल्यांकन’, ‘मुक्तिबोध की कविताएं : बिम्ब प्रतिबिम्ब’, ‘हासिया’, ‘रचनालोक’, ‘कवि अज्ञेय’, ‘नागार्जुन और उनकी कविता’ आदि उनकी महत्वपूर्ण समीक्षा कृतियाँ हैं. उन्होंने साहित्य अकादमी के लिए महावीरप्रसाद द्विवेदी और मुक्तिबोध के लिए मोनोग्राफ भी लिखा है. निराला रचनावली ( आठ खंड) तथा दिनकर रचनावली ( चौदह खंडों मे, तरुण कुमार के साथ ) का उन्होंने संपादन किया है. इसके अलावा उन्होंने ‘रुद्र समग्र’ ( रामगोपाल शर्मा ‘रुद्र’ का संपूर्ण काव्य ), ‘काव्य समग्र : रामजीवन शर्मा ‘जीवन’, ‘राकेश समग्र’ ‘अलक्षित रामइकबाल सिंह ‘राकेश’, ‘रामावतार शर्मा : प्रतिनिधि संकलन’, ‘अंधेरे में ध्वनियों के बुलबुले’ ( वैशाली जनपद के कवियों की कविताओं का संकलन), ‘नामवर सिंह संचयिता’, ‘मुक्तिबोध : कवि-छवि ( मुक्तिबोध पर चुने हुए हिन्दी के श्रेष्ठ निबंध), ‘निराला : कवि-छवि’ ( निराला पर चुने हुए हिन्दी के श्रेष्ठ निबंध), ‘स्वतंत्रता पुकारती’ ( हिन्दी के तेईस कवियों की राष्ट्रीय कविताओं का संकलन), ‘कामायनी परिशीलन’ ( कामायनी पर चुने हुए हिन्दी के श्रेष्ठ निबंध), ‘हिन्दी की कालजयी कहानियाँ’, ‘हिन्दी साहित्य : बीसवीं सदी’ आदि का भी संपादन किया है.
नामवर सिंह के साथ ‘आलोचना’ पत्रिका के सहायक संपादक के रूप में वे लंबे समय तक जुड़े रहे और इससे उन्हें विशेष प्रतिष्ठा मिली. इसके अलावा उन्होंने ‘ध्वजभंग’, ‘सिर्फ’, ‘धरातल’, ‘उत्तरशती’ तथा ‘कसौटी’ जैसी पत्रिकाओं का भी समय- समय पर संपादन किया.
नवल जी आलोचना में पाठ को बहुत महत्व देते हैं. निराला और मुक्तिबोध उनके सर्वाधिक प्रिय कवियों में से हैं. इन कवियों के साहित्य की समीक्षा करते हुए उन्होंने उनके काव्य की पाठ परंपरा पर सबसे ज्यादा जोर दिया है. निराला पर लिखते हुए वे कहते हैं, “उन्होंने ( निराला ने ) अपने संपूर्ण कवि-जीवन में दो महान कविताओं की रचना की- ‘सरोज स्मृति’ और ‘राम की शक्ति पूजा’. इनमें से पहली कविता पुत्री-प्रेम की कविता है और दूसरी पत्नी प्रेम की. क्या यह आकस्मिक है? इस प्रश्न का सही उत्तर तब मिलता है, जब हम उनके संपूर्ण साहित्य और विचारधारा पर दृष्टि डालते हैं........ जिस समाज में नारी के रूप में जन्म लेना ही पाप माना जाता हो, जिसमें नारी को कोई सामाजिक और राजनीतिक अधिकार न प्राप्त हो, जिसमें वह संपत्ति की हकदार न मानी गयी हो, जिसमें पति की मृत्यु के बाद उसे जिन्दा जला देने का धार्मिक विधान रहा हो और जिसमें माता-पिता द्वारा नवजात पुत्रियों की हत्या तक कर देने की परंपरा चली आती हो, उसमें पत्नी-प्रेम और पुत्री-प्रेम की कविता लिखना, पत्नी की मुक्ति के लिये अपनी एक आँख तक निकालकर देवता को चढ़ाने को उद्यत हो जाना और पुत्री की मृत्यु पर विलाप करना तथा अपने पितृत्व की निरर्थकता का एहसास करना निश्चय ही एक मानवीय ही नहीं, क्रान्तिकारी कार्य है.” ( निराला और मुक्तिबोध : चार लंबी कविताएं, नंदकिशोर नवल, पृष्ठ-12-13)
आलोचना को लेकर अपनी मान्यता को स्पष्ट करते हुए नवल जी लिखते हैं, “ इतना अवश्य मानने लगा हूँ कि प्रत्येक श्रेष्ठ कवि की एक अपनी दुनिया होती है और न केवल यह कि उसकी दुनिया की टकराहट दूसरे कवि की दुनिया से हो सकती है, बल्कि यह भी कि उस दुनिया को जाँचने के नियम भी दूसरे कवि की दुनिया के नियमों से भिन्न हो सकते हैं. ऊपर से उनमें अंतर्विरोध दिखलाई पड़ सकते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि गहराई में भी वे अंतर्विरोध बरकरार रहें. ( समकालीन काव्य यात्रा, भूमिका, पृष्ठ-7)
अपूर्वानंद ने उनकी रचना- यात्रा पर टिप्पणी करते हुए कहा है, “(उनकी) साहित्यिक रुचि का निर्माण उत्तर छायावादी दौर में हुआ लेकिन जल्दी ही नई कविता से उनका परिचय हुआ और उनके सामने एक नई खिड़की सी खुल गई. अकविता और अकहानी, युवा कविता, भूखी पीढ़ी, श्मसानी पीढ़ी की भीषण उथल-पुथल और रोमांचकारी बहसों में वे शामिल हुए. इस समय के स्वभाव के अनुसार ही उन्होंने ‘ध्वजभंग’ और ‘सिर्फ’ नामक पत्रिकाएं भी निकालीं. इसी समय वे नक्सलवादी आंदोलन के संपर्क में आए और उनकी राजनीतिक सक्रियता आरंभ हुई. कुछ वक्त बाद वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए. इस रूप में भी वे एक समर्पित कार्यकर्ता थे. पार्टी से उनका लगाव और उसके प्रति उनका समर्पण पूरा था. पिछली सदी के आठवें दशक में जब प्रगतिशील लेखक संघ का पुनर्गठन हुआ तो वे जोश के साथ उसमें संगठनकर्ता के तौर पर सक्रिय हुए. उनकी और खगेंद्र ठाकुर की जोड़ी के बिना बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का कार्यक्रम संभव न था. इस दौर में बने उनके मार्क्सवादी आग्रह ने उन्हें साहित्य को पढ़ने की एक अलग निगाह दी. इसी कारण उन्हें मार्क्सवादी आलोचक माना जाता है. लेकिन कोई दो दशक बाद वे नामवर सिंह की इस बात से सहमत हुए कि लेखक या आलोचक के आगे मार्क्सवादी जैसे विशेषण की कोई जरूरत नहीं. इस दरमियान उन्होंने जो लिखा उस पर यह मार्क्सवादी आग्रह हावी दिखता है. चाहे ‘प्रेमचंद का सौन्दर्यशास्त्र’ हो या ‘कविता की मुक्ति,’ इन संकलनों के निबंधों में इसी दृष्टिकोण से लेखकों पर विचार किया गया है. लेकिन साहित्य मात्र की अपनी सत्ता को लेकर भी वे सजग थे. लेखक को उसकी सारी जटिलता में अपने लिए उद्घाटित करना आलोचक का दायित्व है, इस समझ ने उन्हें जड़ हो जाने से बचा लिया. सोवियत संघ में ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोयिका के समय से पार्टी से उनका मोहभंग शुरू हुआ और वे लेखक संघ से भी विरत हो गए.” ( द वायर,13.5.2020)
डॉ. रामचंद्र तिवारी ने उनकी आलोचना-पद्धति पर टिप्पणी करते हुए कहा है, “ नवल की विशेषता यह है कि वे कविता की अंतर्वस्तु और रूप पक्ष दोनो को महत्व देते हैं और दोनो की संश्लिष्ट स्थिति का विवेचन करते हुए पूरी कविता का मूल्यांकन करते हैं. अत्यंत जटिल कवि मानस के रचनाकार शमशेर की कविताओं का विवेचन करते हुए आप ने यदि एक ओर वर्तमान समाज की भयावह स्थिति से उत्पन्न पीड़ा को लक्षित किया है तो दूसरी ओर उसमें प्राप्त विशिष्ट बिम्बों, चित्र-विधानों, लय-बोधों तथा भाषिक वक्रताओं की ओर भी इंगित किया है.” ( हिन्दी का गद्य साहित्य, पृष्ठ- 125)
अपूर्वानंद ने कहा है, “ वे उन चंद लेखकों में थे जो सच्चे अर्थ में साहित्य-व्यसनी अध्यापक कहे जा सकते थे. वे आलोचक, संपादक के तौर पर जाने जाते हैं लेकिन अपने छात्रों के लिए वे एक समर्पित अध्यापक ही रहे. बल्कि वे हमेशा कहा करते थे कि उन्होंने अध्यापन से ही लिखना सीखा, वही उनके लेखन का स्रोत था.”( द वायर,13.5.2020)
मधुरेश के शब्दों में, “वे प्रगतिवादी धारा के प्रमुख कवियों –नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, शमशेर और त्रिलोचन को केन्द्र में रखकर ही यथार्थवादी काव्य-विकास की पड़ताल करते हैं. अज्ञेय और श्रीकान्त वर्मा आदि को वे क्षयिष्णु और पतनशील काव्य प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं.” (हिन्दी आलोचना का विकास, पृष्ठ- 244)
एक आलोचक के दायित्व को नवल जी अच्छी तरह समझते हैं और किसी की भी वे झूठी प्रशंसा या निंदा नहीं करते. उनके लिए एक रचनाकार की सबसे बड़ी कसौटी उसकी रचनाएं ही होती हैं. ‘निराला’ के एक प्रश्न कि “आधुनिक हिन्दी कविता का इतिहास आपने धूमिल पर ही लाकर खत्म कर दिया है. क्या धूमिल के बाद कोई आधुनिक कवि नहीं दिखा आपको ?” वे जवाब देते हैं,
“धूमिल के बाद हिंदी में कोई कवि अब तक नहीं हो सका है, जिसके रचनात्मक व्यक्तित्व का निर्माण पूरी तरह से हो गया हो. सब अभी मेकिंग प्रोसेस में हैं. विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे, आलोक धन्वा, मंगलेश डबराल, ज्ञानेंद्रपति, राजेश जोशी, उदय प्रकाश, अरुण कमल की कविताओं को हमने देखा, जाना, पढ़ा है. इनकी कविताओं पर ठीक से एक लेख तक नहीं लिखा जा सकता, आलोचना की पुस्तक में शामिल करने की तो बात ही दूर. जीवित कवियों में सिर्फ कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह, दो ही ऐसे हैं, जिनके रचनात्मक व्यक्तित्व का निर्माण हो गया है, इसलिए हमने उन्हें शामिल किया है.” ( सत्याग्रह, 17 मई 2020)
इसी तरह उनका मानना है कि, “शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध जैसे कवियों ने भी एक भी कविता राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन पर लिखी ही नहीं है. वे कवि मानते थे कि स्वतंत्रता आंदोलन बुर्जुआ आंदोलन है, सर्वहारा आंदोलन चाहिए. जबकि मैथिली शरण गुप्त जैसे कवि कांग्रेस के साथ रहते हुए भी उसके खिलाफ, गांधी के विरोध में कविताएं लिख रहे थे. तब मैंने पाया, मैंने महसूस किया कि शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध जैसे कवि एक खास विचारधारा की पक्षधरता की जकड़न में थे. उनमें देश और समाज के प्रति उस स्तर पर कमिटमेंट नहीं था.” ( सत्याग्रह, 17 मई 2020)
आज के अस्मिता विमर्शों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा है, “ये सारे अस्मिताई लेखन और विमर्श उधार और नकल के हैं. अमेरिका के ब्लैक मूवमेंट से दलित विमर्श आया, यूरोप के फेमिनिज्म से स्त्री विमर्श. इसके पैरोकार बहुत कुछ बेजा बोलते रहते हैं. कहते हैं, स्त्री ही स्त्री की पीड़ा समझेगी, दलित ही दलित की पीड़ा समझेगा. डॉ धर्मवीर जैसे लेखक भी हैं, जिन्हें साहित्य का ज्ञान नहीं लेकिन कुछ भी बकते रहते हैं. तोलस्तोय ने घोड़े पर एक मशहूर और क्लासिक कहानी लिखी थी - इंसान और हैवान. तोलस्तोय घोड़ा तो नहीं थे! प्रेमचंद ने दलितों को केंद्र में रखकर जो कहानियां लिखी हैं, उन्हे इस आधार पर खारिज कर दें कि वे दलित नहीं थे. लेखन परकाया प्रवेश कर होता है, जाति के आधार पर नहीं.” ( सत्याग्रह, 17 मई 2020)
परवर्ती काल खंड में नवल जी अपनी आलोचना को अधिक उदार बनाना चाहते थे. उन्होंने साहित्य में वैचारिक संकीर्णता का हश्र देख लिया था. उन्होंने साहित्यिक आयोजनों में जाना भी छोड़ दिया था. रामविलास शर्मा जी तरह वे जमकर काम करना चाहते थे. उन्होंने किया भी. निश्चय ही सोवियत संघ के पतन के बाद प्रगतिशील आन्दोलन और वामपंथ की राजनीति के प्रति उनका रुख आलोचनात्मक हो गया था.
निस्संदेह नवल जी के अध्ययन एवं लेखन का क्षेत्र व्यापक और प्रामाणिक है. निराला एवं मुक्तिबोध उनके अध्ययन के केंद्र में अवश्य हैं किन्तु नए से नए कवियों की रचनाओं पर भी उनकी पैनी नजर रही है.
नवल जी कवि भी है और ‘कहाँ मिलेगी पीली चिड़िया’, ‘जनपद’, ‘द्वाभा’, ‘नील जल कुछ और भी धुल गया’, ‘पथ यहाँ से अलग होता है’ जैसे उनके कविता संग्रह प्रकाशित हैं.
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