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Showing posts from January, 2022

आलोचना में जनतंत्र के अन्वेषी : अशोक वाजपेयी

दुर्ग ( म.प्र.) में जन्मे, दिल्ली में पढ़े-लिखे, भारतीय प्रशासनिक सेवा में अधिकारी रहे अशोक वाजपेयी ( जन्म-16.01.1941 ) कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं किन्तु एक सुधी समीक्षक के रूप में भी उनकी पहचान है. वे हिन्दी के ऐसे विरल आलोचक हैं जिनकी समीक्षा-दृष्टि के दायरे में साहित्य के अलावा संगीत, चित्र, स्थापत्य आदि अन्य कलाएं भी शामिल हैं. संस्कृति का क्षेत्र भी इस दायरे में आ जाता है. वे आलोचना में एक ‘समावेशी परिसर’ बनाने की वकालत करने वाले आलोचक हैं. ‘फिलहाल’, ‘कुछ पूर्वग्रह’, ‘कविता का गल्प’, ‘कवि कह गया है’ आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ हैं. इसके अतिरिक्त ‘मेरे साक्षात्कार’ में भी उनकी आलोचनात्मक मान्यताएं देखी जा सकती हैं. आधुनिक कवियों में अज्ञेय, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, केदारनाथ सिंह, विजयदेवनारायण साही, कुँवरनारायण आदि के साहित्य की उन्होंने समीक्षाएं की हैं. अपने अन्य समकालीन कवियों- धूमिल, लीलाधर जगूड़ी, वेणु गोपाल, ऋतुराज, चंद्रकांत देवताले, प्रयाग शुक्ल, विष्णु खरे, सोमदत्त, राजेश जोशी, दूधनाथ सिंह, कुमार विमल, मणि मधुकर, राजकमल चौधरी, गंगाप्रसाद विमल, जगद...

भारत का सबसे गरीब मुख्य मंत्री : मानिक सरकार

त्रिपुरा में लगातार पाँच बार से जीतकर सत्ता में आने वाली भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी ) की सरकार 2018 में भाजपा से पराजित हो गई। वहाँ 1998 से 2018 तक लगातार मुख्यमंत्री पद पर बने रहने वाले मानिक सरकार (22.1.1949) चुनाव हारने के बाद मुख्यमंत्री का सरकारी आवास खाली करके अपनी पत्नी पंचाली सरकार के साथ सीपीएम के दफ्तर में रहने के लिए चले गए। पार्टी ने उनको रहने के लिए पार्टी ऑफिस में ही एक कमरे का इंतजाम कर दिया। उनके करीबी लोगो ने बताया कि मुख्यमंत्री आवास से वे चंद कपड़े और किताबें लेकर निकले और सीधे पार्टी दफ्तर पहुँच गए। दरअसल मानिक सरकार के पास रहने के लिए अपना कोई घर नहीं है। 2018 में चुनाव के वक्त दिए गए उनके हलफनामे के अनुसार जब उनकी आर्थिक स्थिति को सार्वजनिक किया गया तो पता चला कि उनके पास सिर्फ 1520 रूपए नकदी हैं। 20 जनवरी को उनका बैंक बैलेंस 2410.16 रूपए था। उस समय वे देश के सबसे ज्यादा लंबे समय से मुख्यमंत्री थे। माऩिक सरकार मुख्यमंत्री के नाते मिलने वाला अपना पूरा वेतन 26315 रूपए पार्टी फंड के लिए दान कर देते थे। बदले में पार्टी से उन्हें 9700 रूपए गुजारा भत्ता के...

कथा समीक्षा के एकांतिक साधक : मधुरेश

बरेली ( उ.प्र.) में जन्मे, बरेली में पढ़े-लिखे और बदायूँ में शिक्षक रहे मधुरेश ( जन्म-10.01.1939) का मूल नाम रामप्रकाश शंखधर है. मधुरेश की पहचान मुख्यतः कथा-समीक्षक के रूप में है. वे अंग्रेजी और हिन्दी दोनो विषयों में एम.ए. और पी-एच.डी. हैं. ‘हिन्दी कहानी : अस्मिता की तलाश’, ‘नई कहानी : पुनर्विचार’, ‘आज की हिन्दी कहानी : विचार और प्रतिक्रिया’, ‘सिलसिला : समकालीन कहानी की पहचान’, ‘देवकीनन्दन खत्री’, ‘सम्प्रति : समकालीन हिन्दी उपन्यास में संवेदना और सरोकार’, ‘रांगेय राघव’, ‘राहुल का कथा-कर्म’, ‘हिन्दी कहानी का विकास’, ‘हिन्दी उपन्यास का विकास’, ‘नई कहानी : पुनर्विचार’, ‘अमृतलाल नागर : व्यक्तित्व और रचना संसार’, ‘भैरव प्रसाद गुप्त’, ‘मार्क्सवादी आलोचना और शिवदान सिंह चौहान’, ‘दिव्या का महत्त्व’, ‘हिन्दी उपन्यास : सार्थक की पहचान’, ‘कहानीकार जैनेन्द्र कुमार : पुनर्विचार’, ‘हिन्दी आलोचना का विकास’, ‘यशपाल के उपन्यास’, ‘यशपाल : रचनात्मक पुनर्वास की एक कोशिश’, ‘आलोचना : प्रतिवाद की संस्कृति’, ‘समय, समाज और उपन्यास’, ‘स्त्री की दुनिया’, ‘ऐतिहासिक उपन्यास : इतिहास और इतिहास-दृष्टि’, ‘राधेश्या...

बचपन बचाने की जिद में जीवन : कैलाश सत्यार्थी

इस दुनिया में लाखों क्या करोड़ों ऐसे बच्चे हैं जिनका बचपन हमारा समाज छीन लेता है. उनका बचपन मशीनों पर खटते हुए, दूसरों की गुलामी करते हुए और तरह- तरह की हिंसा का शिकार होते हुए बीत जाता है. वे न केवल हँसते- खेलते बचपन से दूर रहते हैं, बल्कि किताबों की रंग- बिरंगी दुनिया से भी वे अपरिचित ही रह जाते हैं. कैलाश सत्यार्थी (जन्म-11.1.1954) एक ऐसे व्यक्ति का नाम है जिसने दुनिया भर के दबे-कुचले ऐसे ही बच्चों का बचपन उन्हें वापस करने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है. उन्होंने 1980 में ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ की स्थापना की. बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए और उनका नेतृत्व किया. दुनिया भर के वंचित, ग़रीब और हाशिए के बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और आजादी के लिए उन्होंने दुनिया भर के नोबेल पुरस्कार विजेताओं और विश्व नेताओं को एकजुट करके ‘लॉरिएट्स एंड लीडर्स फॉर चिल्ड्रेन’ की स्थापना की. उन्होंने पूरी दुनिया में बच्चों के प्रति हिंसा को ख़त्म करने के उद्देश्य से ‘100 मिलियन फॉर 100 मिलियन’ नामक एक विश्वव्यापी आन्दोलन की शुरुआत की जिसका उद्देश्य है दुनिया भर के 100 मिलियन दबे...

‘खड़ी बोली में पद्य’ की प्रतिष्ठा का पहला सेनानी : अयोध्या प्रसाद खत्री

जिन दिनों हिन्दी नवजारण के अग्रदूत कहे जाने वाले भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र, गद्य खड़ी बोली में लिख रहे थे किन्तु कविता के लिए ब्रजभाषा को ही सबसे उपयुक्त मान रहे थे, उन्हीं दिनों बिहार के बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री ने कविता के लिए भी खड़ी बोली अपनाने का आन्दोलन चलाकर अपनी मौलिक और क्रान्तिकारी दृष्टि का परिचय दिया था और भारतेन्दु व उनके मंडल को चुनौती दी थी. पुरुषोत्तम प्रसाद वर्मा ने मार्च 1905 ई. की ‘सरस्वती’ में ‘अयोध्या प्रसाद खत्री’ शीर्षक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने लिखा है कि “खड़ी बोली के प्रचार के लिए खत्री जी ने इतना द्रव्य खर्च किया कि राजा -महाराजा भी कम करते हैं.” उन्होंने ब्राह्मण टोली में ब्राह्मणों के बीच घोषणा कर दी थी कि जो पंडित अपने यजमानों के यहाँ सत्यनारायण कथा खड़ी बोली में बाँचेंगे, उन्हें वे हर कथा -वाचन के लिए दस रूपए देंगे. हाँ, उन्हें अपने यजमानों से कथा-वाचन का प्रमाण पत्र लाना होगा. वे ऐसा करते भी थे. उन्होंने कर्मकांड के लिए अनेक पुस्तकों का खड़ी बोली में अनुवाद कराया था और उन्हें वे नि:शुल्क वितरित करते थे. गजेन्द्र कान्त शर्मा ने उनपर एक लेख लिखा है....

हिन्दी के ‘महामना’ : पं. मदन मोहन मालवीय

हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयागराज के संस्थापक, उ.प्र.(तत्कालीन पश्चिमोत्तर प्रान्त और अवध) में सरकारी काम-काज के लिए देवनागरी के प्रयोग के लिए सफलतापूर्वक आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले, हिन्दी के अनन्य सेवक, प्रख्यात वकील, ‘हिन्दुस्तान’, ‘अभ्युदय’, ‘लीडर’, ‘मर्यादा’, ‘विश्वबंद्य’ जैसे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का संपादन करने वाले महान पत्रकार, कांग्रेस के चार बार अध्यक्ष रहे वरिष्ठ नेता, गाँधी जी के अनन्य सहयोगी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक, भारत रत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ( 25.12.1861-12.11.1946) का जन्म प्रयागराज में एक सामान्य परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम पं. ब्रजनाथ और माँ का नाम मूना देवी था. वे कुल सात भाई- बहनों में पाँचवीं संतान थे. उनकी आरंभिक शिक्षा प्रयागराज और बी.ए. की पढ़ाई कलकत्ता विश्वविद्यालय में हुई. 1886 मे कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन हुआ था जिसकी अध्यक्षता दादभाई नौरोजी ने की थी. मदन मोहन मालवीय ने इस अधिवेशन में भाग लिया था. उस समय उनकी उम्र मात्र 25 वर्ष थी किन्तु उनमें राष्‍ट्रीय चेतना इतनी विकसित थी कि‍ उन्‍हें ...

हिन्दी के पहले डॉक्टोरेट : पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल

गढ़वाल (उत्तराखंड) जिले के ‘पाली’ नामक गाँव में जन्मे, श्रीनगर( गढ़वाल), लखनऊ, कानपुर तथा काशी में पढ़े-लिखे तथा काशी व लखनऊ विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल (13.12.1901-24.07.1944) को किसी भारतीय विश्वविद्यालय से हिन्दी का प्रथम डी. लिट. होने का गौरव हासिल है. ‘द निर्गुण स्कूल ऑफ हिन्दी पोयट्री’ विषय पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने उन्हें 1934 ई. में डी. लिट् की उपाधि से नवाजा था और हिन्दी जगत में उसकी भूरि- भूरि प्रशंसा हुई थी. उनका यह शोध-प्रबंध बाद में ‘हिन्दी में निर्गुण संप्रदाय’ के नाम से प्रकाशित हुआ. हिन्दी जगत में बड़थ्वाल जी ने अपनी शोध- वृति और समीक्षा-दृष्टि के कारण ही पहचान बनाई. संत, सिद्ध, नाथ और भक्ति साहित्य की खोज और विश्लेषण में ही उनकी विशेष रुचि थी. उन्होंने भक्ति आन्दोलन को हिन्दू जाति की निराशा का परिणाम नहीं माना अपितु उसे भक्ति धारा का स्वाभाविक विकास माना है. उन्होंने गोरखनाथ की रचनाओं का संपादन ‘गोरखबानी’ नाम से किया है. इस कृति से उन्हें विशेष ख्याति मिली. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘नाथ सिद्धों की रचनाएं’ की भूमिका में लिखा है,...

हिन्दी के भैय्या साहब पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी

“मेरे उत्तराधिकारी कौन हैं? मेरे वंशज मेरे कानूनी उत्तराधिकारी मात्र हैं. वे मेरी भौतिक संपत्ति के ( जो नगण्य है ) उत्तराधिकारी हैं. किन्तु मेरे वास्तविक उत्तराधिकारी वे भावी युवक हैं जिनमें हिन्दी- प्रेम ही नहीं, हिन्दी का दर्द भी हो, वे नहीं जो मात्र साहित्य-रचना कर या संपादन या हिन्दी- अध्यापन कर अपना पेट पालते हों और इसी को हिन्दी -सेवा समझते हों. मेरे उत्तराधिकारी वे होंगे जो हिन्दी के हितों, हिन्दी- भाषियों और हिन्दी की सेवा करने वालों के हितों के लिए निस्पृह भाव से कार्य करें और हिन्दी -भक्त साहित्यकारों की स्मृति को जीवित रखने का प्रयास करें और हिन्दी के लिए त्याग और कठिन परीक्षा देने को तैयार हों और जो हिन्दी के मान की प्राण- पण से रक्षा करें तथा हिन्दी का अलमबरदार होना गौरव की बात समझें.” उक्त कथन हिन्दी के अनन्य सेवक पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी ( 28.12.1895-18.8.1990) के हैं जिसे उन्होंने अपनी संस्मरणों की पुस्तक ‘निजी वार्ता’ के पहले ही पृष्ठ पर लिखा है. ‘भैय्या जी’ के नाम से मशहूर पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी स्वयं को जिनका उत्तराधिकारी मानते हैं उनकी विरासत को भी उन्होंने पूरी...

नागरी के अग्रदूत : जस्टिस शारदाचरण मित्र

कलकत्ता में जन्मे, कलकत्ता में पढ़े-लिखे, कलकत्ता विश्वविद्यालय से एक ही वर्ष में बी.ए. और एम.ए. की परीक्षा देकर दोनो में प्रथम स्थान प्राप्त करके कीर्तिमान बनाने वाले, प्रेसीडेंसी कॉलेज में मात्र 21 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी के प्रोफेसर और बाद में बी.एल. की डिग्री लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट में न्यायाधीश रहे जस्टिस शारदाचरण मित्र ( 17.12.1848-04.09.1917 ) देवनागरी लिपि के द्वारा राष्ट्रीय एकता का सपना देखने वाले अप्रतिम स्वप्नदर्शी और सूत्रधार थे. राष्ट्रीय चेतना ने उन्हें ‘एकलिपि विस्तार परिषद’ नामक संस्था के गठन की ओर प्रेरित किया. अगस्त 1905 ई. में कलकत्ता में उन्होंने ‘एकलिपि विस्तार परिषद’ का गठन किया. सर्वत्र, विशेषकर भारत वर्ष में सब भाषाओं के लिए संस्कृताक्षर( देवनागरी) का व्यवहार चलाना तथा बढ़ाना ही इस परिषद् का मुख्य उद्देश्य था. इसके वे प्रथम प्रधान मंत्री थे. इसके सदस्यों में विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सर गुरुदास बनर्जी, महामहोपाध्याय पंडित सतीशचंद्र विद्याभूषण, महाराजा सर रामेश्वर सिंह( दरभंगा), महाराजा बहादुर प्रतापनारायण सिंह ( अयोध्या), महाराजा रावणेश्वर प्रसाद सिंह( गिद्...

नरेन्द्र दाभोलकर : अंधविश्वास के खिलाफ शहादत

‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ (एम.ए.एन.एस.) के संस्थापक डॉ. नरेन्द्र अच्युत दाभोलकर (जन्म-1.11.1945) की 20 अगस्त, 2013 की सुबह पुणे में अज्ञात बंदूकधारियों ने उस समय गोली मारकर हत्या कर दी जब वे सुबह की सैर पर निकले थे. उस समय उनकी उम्र 67 वर्ष थी. उनका दोष यह था कि वे अपने संगठन के माध्यम से क़ानून के दायरे में रहते हुए समाज में व्याप्त अंधविश्वास का विरोध करते थे. कुछ लोगों को उनकी यह भूमिका पसंद नहीं आई और विचारों से मुकाबला करने की जगह उन लोगों ने डॉ. दाभोलकर की गोली मारकर हत्या कर दी. महाराष्ट्र अंधविश्वास निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. अविनाश पाटील के अनुसार यह हत्या ऐसे लोगों ने करवाई है जो विचार का जवाब विचार से नहीं दे सकते, जिनके पास तर्क और विज्ञान के खिलाफ़ एक ही हथियार है- हिंसा. उनकी एक पुस्तक ‘भ्रम और निरसन’ के अनुवादक डॉ. विजय शिंदे के शब्दों में, “ डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर का जिन्दगी के सारे चिन्तन और सामाजिक सुधारों में यही प्रयास था कि इन्सान विवेकवादी बने. उनका किसी जाति-धर्म-वर्ण के प्रति विरोध नहीं था. लेकिन षड्यंत्रकारी राजनीति के चलते अपनी सत्ता की कुर्सियो...