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Showing posts from January, 2021

चिपको के रहनुमा : सुन्दरलाल बहुगुणा ( सबलोग में 9.1.21 को प्रकाशित )

चिपको आन्दोलन की शुरुआत उत्तराखंड ( तत्कालीन उत्तर प्रदेश ) के चमोली जिले में 1970 में हुई थी। इसकी पृष्ठभूमि में उसी वर्ष आयी अलकनंदा नदी की प्रलयकारी बाढ़ थी जिसकी तबाही ने उत्तराखंड के जनजीवन को बुरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया था। इस बाढ़ में अलकनंदा का जलस्तर 538 मीटर तक बढ़ चुका था। पर्यावरणविशेषज्ञों का मानना था कि अलकनंदा की इस बाढ़ का मुख्य कारण मानव जनित कृत्य ही हैं। बाढ़ को रोकने में जंगलों की प्रमुख भूमिका होती है। इसलिए जंगलों को बचाने के लिए पहाड़ के प्रबुद्ध नागरिकों ने कमर कस ली थी। इसी बीच 1972 में वन विभाग ने चमोली जिले में टेनिस रैकेट बनाने के लिए जंगल से 300 पेड़ काटने का ठेका इलाहाबाद स्थित साइमन कंपनी को दे दिया। क्षेत्र में इसका कड़ा विरोध हुआ और कांट्रैक्ट खत्म कर दिया गया। फिर भी 1973 ई. में शासन ने जंगलों को काटकर अकूत राजस्व बटोरने की नीति बनाई। जंगल कटने का सर्वाधिक असर महिलाओं पर पड़ा। उनके लिए घास और लकड़ी की कमी होने लगी। हिंसक जंगली जानवर गावों में आने लगे। धरती खिसकने व धँसने लगी। गाँव के लोगों और खासकर महिलाओं का विरोध जारी रहा। इसके बावजूद वन विभाग ...

कानून के जाल में करुणा : डॉ. बिनायक सेन ( published in sablog )

डॉ. बिनायक सेन पर लिखते समय मुझे बीएचयू के एक दूसरे बंगाली डॉक्टर टी.के. लहरी ( डॉ. तपन कुमार लाहिड़ी ) याद आ रहे हैं. बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल से रिटायर होने के बाद उनकी योग्यता, अपने पेशे के प्रति ईमानदारी और समर्पण को देखते हुए बीएचयू प्रशासन ने उन्हें इमेरिटस प्रोफेसर बनाया. वे अविवाहित हैं और बीएचयू द्वारा उपलब्ध कराए गए कैम्पस के मकान में आज भी संत की तरह रहते हैं. चौकी पर सोते हैं. नियत समय पर घर से चैम्बर पैदल जाते हैं और मरीज देखते हैं. अपने पेंशन का भी एक हिस्सा बीएचयू को दान दे देते हैं. बनारस के लोग उन्हें देवता की तरह मानते हैं. वे इतने स्वाभिमानी और राजनीति आदि से निर्लिप्त हैं कि जनवरी 2018 में अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी उन्होंने मिलने से मना कर दिया था और कहा था कि “मैं तो एक डॉक्टर हूँ. अगर एक मरीज की तरह मिलना हो तो मुझसे वे मेरे चैम्बर में मिल सकते हैं. घर पर मैं मरीज नहीं देखता.” निस्संदेह आज के युग में जब ज्यादातर डॉक्टर मरीजों को लूटने के लिए ही पैदा हो रहे हैं, टी.के.लहरी जैसे डॉक्टर अपवाद है. भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से विभूषि...