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मातृभाषा में सबके लिए समान और अनिवार्य शिक्षा का प्रश्न

विश्व हिन्दी- दिवस पर विशेष आजकल सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम अपनाने का देश की अधिकाँश राज्य सरकारों में होड़ लगा हुआ है. ऐसा क्यों न हो ? अंग्रेजी माध्यम के बल पर ही मात्र तीन प्रतिशत लोग सत्ता पर काबिज हैं. जबकि देश की आधी से ज्यादा आबादी द्वारा बोली जानो वाली हिन्दी हाशिए पर ठेल दी गई है. कहा जाता है कि यह निर्णय अभिभावकों की मांग पर लिया जा रहा है. अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों की जगह अंग्रेजी माध्यम वाले प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश दिलाना पसंद कर रहे हैं. इस तरह सरकारी बांग्ला या हिन्दी माध्यम के स्कूलों में छात्र-संख्या घट रही है. यह सही भी है. एक अनुमान के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में ही हमारे बंगाल के शहरी क्षेत्र के लगभग 70 प्रतिशत बांग्ला या हिन्दी माध्यम वाले स्कूल या तो बंद हो चुके हैं या अंग्रेजी माध्यम में बदल चुके हैं. किन्तु इसके वास्तविक कारण तलाशने की जगह, सरकारें समूची प्राथमिक शिक्षा अंग्रेजी माध्यम में बदलने की तैयारी कर रही है. जब चपरासी तक की नौकरियों में भी अंग्रेजी अनिवार्य होगी तो अंग्रेजी की मांग बढ़ेगी ही. यह ...