हिन्दी की संस्कृतनिष्ठता के जनक आचार्य रघुवीर
रावलपिण्डी ( आजकल पाकिस्तान ) में जन्में, लाहौर से एम.ए., लंदन से पी-एच.डी. और हालैंड से डी.लिट्. करने वाले महान भाषाविद्, भारतीय संस्कृति के संरक्षक, राजनेता और महान कोशकार आचार्य रघुवीर ( 30.12.1902-14.5.1963) की स्वाधीनता के बाद राजभाषा हिन्दी के स्वरूप को निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका है. वे संस्कृत, फारसी, अरबी, उर्दू, बांग्ला, मराठी, तमिल, तेलुगू, पंजाबी, जापानी, जर्मन, फ्रेंच और मंगोल भाषा के गहरे अध्येता थे. यूरोप की अधिकाँश महत्वपूर्ण भाषाओं पर उनकी गहरी पकड़ थी. भारतीय संस्कृति की धरोहर को संचित करने के उद्देश्य से उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्राएँ कीं. उन्होंने, ‘इंडियन साइंटिफिक नोमिक्लेचर ऑफ बर्ड्स ऑफ इंडिया, वर्मा एण्ड सीलोन’ ( आंग्ल भारतीय पक्षी नामावली), ‘ए कंप्रिहेंसिव इंग्लिश-हिन्दी डिक्शनरी ऑफ गवर्नमेंटल एण्ड एजूकेशनल वर्ड्स एण्ड फ्रेजेज’, ‘हिन्दी- इंग्लिश डिक्शनरी ऑफ टेक्निकल टर्म्स’, ‘अर्थशास्त्र शब्दकोश’, ‘हिन्दी कथाकोश’ आदि की रचना करके हिन्दी को तकनीकी दृष्टि से समृद्ध करने का महान कार्य किया है.
आचार्य रघुवीर के शब्द निर्माण का आधार संस्कृत की संरचना थी. उन्होंने शब्द निर्माण में याँत्रिकता तथा वैज्ञानिकता को आधार बनाया. उनका मानना था कि उपसर्ग तथा प्रत्ययों के धातुओं के योग से लाखों शब्द सहज ही बनाए जा सकते हैं. कहा भी गया है,
“उपसर्गे धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते, प्रहार-आहार-संहार-विहार-परिहारवत.”
उन्होंने विस्तार से उदाहरण देकर समझाया कि किस प्रकार ‘गम्’ धातु मात्र से 180 शब्द सहज ही बन जाते हैं. – प्रगति, परागति, परिगति, प्रतिगति, अनुगति, अधिगति, अपगति, अतिगति, आगति, अवगति, उपगति, उद्गति, सुगति, संगति, निगति, निर्गति, विगति, दुर्गति, अवगति, अभिगति, गति, गन्तव्य,, गम्य, गमनीय, गमक, जंगम, गम्यमान, गत्वर और गमनिका.
इस तरह उन्होंने स्पष्ट किया कि 520 धातुओं के साथ 20 उपसर्गं तथा 80 प्रत्यय के योग से लाखों शब्दों का निर्माण किया जा सकता है.
आचार्य रघुवीर ने इसी दृष्टिकोण से शब्दों का निर्माण किया है और उनका यह दृष्टिकोण संविधान की धारा- 351 के अनुकूल भी है. संविधान की उक्त धारा में कहा गया है कि अपने शब्द भण्डार के विस्तार के लिए ( हिन्दी ) मुख्यत: संस्कृत से तथा गौणत: अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करेगी. अपने कोश- निर्माण के संबंध में उन्होंने कहा है कि भारतीय संविधान ने जो आधार हिन्दी भाषा के विकास के लिए निर्धारित किए हैं उनका वे पालन कर रहे हैं. हमारी शब्दावली मुख्यत: संस्कृत से ली गई है जिसमें व्युत्पादक, संयुक्त और पदबंध स्तर पर उन सभी तत्वों को शब्द रचना का आधार बनाया गया है जो हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली को अखिल भारतीय स्तर पर प्रयोजनीय और स्वीकार्य बना सकें.
इस संबंध में डॉ. दिलीप सिंह की टिप्पणी है, “उन्होंने ( रघुवीर )ने हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण उसकी समस्त रचनात्मक प्रविधियों का इस्तेमाल करते हुए किया. इसका एक बहुत बड़ा भाग उन्होंने स्वतंत्रता के पहले तैयार किया था. जिसे हम ‘ग्रेट इंग्लिश इंडियन डिक्शनरी’ ( 1944) के नाम से जानते हैं. इसे ही बाद में विस्तार देकर ‘ए काँप्रिहेंसिव इंग्लिश हिन्दी डिक्शनरी ऑफ गवर्नमेंटल एंड एजूकेशनल वर्ड्स एंड फ्रेजेज’ नाम से प्रकाशित किया गया. इसके निर्माण में पूरे भारत के विभिन्न विषयों के सत्तर शीर्षस्थ विद्वानों ने योगदान दिया. यह कार्य निष्पादन और ग्राह्यता दोनो ही दृष्टियों से विशाल और अनुकरणीय है.” ( हिन्दी भाषा चिन्तन, पृष्ठ-12)
वे आगे लिखते हैं, “यह संकलन लगभग पच्चीस विषयों की पारिभाषिक शब्दावली उपलब्ध कराता है, जिसमें विज्ञान और मानविकी की सभी शाखाओं, गणित, भाषा विज्ञान, औषधि विज्ञान, कानून, प्रशासन, कृषि, वाणिज्य आदि के साथ -साथ खेल, शतरंज, नृत्य, संगीत, पत्रकारिता, फिल्म, मूर्ति और चित्रकला जैसे विषयों की शब्दाली भी दी गई है.” ( उपर्युक्त, पृष्ठ-13)
आचार्य रघुवीर की शब्द- निर्माण संबंधी उक्त नीति का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हुआ कि राजभाषा हिन्दी संस्कृतनिष्ठता की बेड़ियों में जकड़ती चली गई और उसी अनुपात में लोक से दूर होती गई. आचार्य रघुवीर यह भी मानते थे कि कोई भी शब्द कठिन या आसान नहीं होता, बल्कि, प्रयोग शब्दों को आसान बना देते हैं. उनकी इस मान्यता के परिणामस्वरूप लाखों का शब्द भण्डार होने के बावजूद उनका कोई प्रयोग नहीं हुआ और उनका कोश आलमारियों में धूल फाँक रहा है. जहाँ हमें हिन्दी के शब्द- भण्डार के विकास के लिए आधुनिक भारतीय भाषाओं और लोकभाषाओं के पास जाना चाहिए था और उनसे उदारतापूर्वक और प्रचलित शब्द ग्रहण करने चाहिए थे, वहाँ हम संस्कृत की संस्कृतिष्ठता पर अटके रहे और राजभाषा हिन्दी अपने सहज प्रवाह में आगे नहीं बढ़ सकी. वह सच्चे अर्थों में लोक भाषा नहीं बन सकी.
आचार्य रघुवीर की संस्कृनिष्ठता के आग्रह और उनके दुष्प्रभाव की ओर लोगों का ध्यान भी गया, लोगों ने उनके कोश पर कृत्रिमता और जटिलता के आरोप लगाए. उनके कोश पर व्यंग्य करते हुए कंठ लंगोट ( टाई ), लौहपथगामिनी ( रेल) जैसे उदाहरण देकर उनके गंभीर कोश-कार्य का उपहास तक किया गया और उसे शुद्धतावाद से प्रेरित बताया गया, किन्तु सरकार का आग्रह उनकी सस्कृतनिष्ठता पर ही था.
फिलहाल, उन्होंने संस्कृत की धातु, उपसर्ग और प्रत्यय पर आधारित शब्द- निर्माण प्रक्रिया द्वारा लाखों वैज्ञानिक शब्द बनाने का मार्ग प्रशस्त किया. बाद में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग नें देशभर के वैज्ञानिकों, भाषाविदों और संसाधकों की सहायता से इसे सर्वथा नयी चुनौती के अनुरूप नया स्वरूप प्रदान किया.
आचार्य रघुवीर हिन्दी के परम हितैषी थे. वे हिन्दी को भारत में शिक्षा का माध्यम बनाने पर जोर देते थे. वे जीवनभर अंग्रेजी के वर्चस्व के विरुद्ध सभी भारतीय भाषाओं के संयुक्त मोर्चे के निर्माण की दिशा में काम करते रहे.
भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए वे पूरी तरह समर्पित थे. 1932 में उन्होंने लाहौर के निकट ‘इंटरनेशनल ऐकैडेमी ऑफ इंडियन कल्चर’ की स्थापना की और भारतीय संस्कृति के अनुसंधान कार्य की नींव रखी. इसके लिए उन्होंने यूरोप, चीन, सोवियत संघ तथा दझिण-पूर्व एशियाई देशों की अनेक यात्राएँ कीं. इनमें मंगोलिया की यात्रा सर्वाधिक उपयोगी थी. वहाँ से बहुत सी मूल्यवान सामग्री लेकर वे भारत आए. संप्रति उनका संगठन ‘सरस्वती विहार’ के नाम से दिल्ली के हौजखास इलाके में स्थित है. उनके पुत्र लोकेशचंद्र उसके सुयोग्य उत्तराधिकारी हैं.
राजनीति में भी आचार्य रघुवीर की गहरी रुचि थी. राष्ट्रीय आन्दोलन में भी उन्होंने हिस्सा लिया था जिसके लिए 1941 में उन्हें जेल की सजा हुई थी. वे राज्यसभा के दो बार सदस्य रहे. वैचारिक स्तर पर जवाहरलाल नेहरू से असहमत होने के कारण बाद में वे जनसंघ में शामिल हो गए.
‘शतपिटकम्’, ‘अथर्ववेदीया पैप्पलाद संहिता’, ‘आराजि बोजि’ आदि पुस्तकें भी उनकी अमूल्य देन हैं.
1963 में कानपुर के निकट एक कार-दुर्घटना में उनका निधन हो गया. उस समय वे जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे.
सरस्वती विहार से जुड़ीं शशिबाला ने ‘आचार्य रघुवीर : भारतीय धरोहर के मनीषी’ शीर्षक से उनपर महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी है.
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