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Showing posts from September, 2020

अनुसंधानपरक आलोचना-दृष्टि का मार्क्सवादी चेहरा : वीर भारत तलवार ( सार्थक समय में )

वीरभारत तलवार ( 20.9.1947 ) हिन्दी के गंभीर अध्येता, शोधार्थी और आलोचक हैं. वे चुपचाप अपना काम करने में विश्वास करते हैं. प्रचार के किसी हथकंडे का इस्तेमाल किए बिना वे सिर्फ अपने अनुसंधान कार्य की गुणवत्ता के बल पर जाने जाते हैं. मार्क्सवादी दृष्टि संपन्न वीर भारत तलवार की आलोचना शोधपूर्ण एवं वस्तुनिष्ठ है. हिन्दी आलोचना में अपने लिए उन्होंने अलग राह निकाली है. बड़े नामों से आतंकित हुए बिना वे न सिर्फ उनकी स्थापनाओं से असहमति प्रकट करने का साहस रखते हैं बल्कि अपनी असहमति और अपनी स्थापनाओं को पूरे तथ्यों और तर्कों के साथ प्रमाणित करने की कोशिश भी करते हैं. उनकी आलोचना में जितनी गंभीरता और ईमानदारी होती है उतना ही अध्ययन और परिश्रम भी झलकता है. हिन्दी नवजागरण पर उनका काम बहुत महत्वपूर्ण है. रामविलास शर्मा के बाद उन्होंने हिन्दी नवजागरण संबंधी बहस को नई दृष्टि से देखा हैं. यद्यपि उनके शोध- निष्कर्षों और विश्लेषण की पद्धति से अधिकाँश आलोचकों को असहमति है. भारतेन्दु संबंधी उनके मूल्यांकन को पचा पाना आसान भी नहीं है. फिर भी हिन्दी नवजागरण संबंधी बहस को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका बेहद महत्...

आलोचना में आधुनिकताबोध के प्रतिमान : मैनेजर पाण्डेय ( जनसंदेश में)

गोपालगंज (बिहार) जिले के गांव ‘लोहटी’ में जन्म लेने वाले मैनेजर पाण्डेय ( जन्म 23.9.1941) हमारे समय के सबसे गंभीर और जिम्मेदार समीक्षकों में हैं. दुनिया भर के समकालीन विमर्शों, सिद्धांतों और सिद्धांतकारों पर उनकी पैनी नजर रहती है. उन्होंने हिन्दी की मार्क्सवादी आलोचना को, सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के आलोक में, देश-काल और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अधिक संपन्न और सृजनशील बनाया है. वैश्विक विवेक और आधुनिकता बोध उनकी आलोचना की प्रमुख विशेषताएं हैं. ‘साहित्य और इतिहास दृष्टि’, ‘शब्द और कर्म’, ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’, ‘भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य’, ‘आलोचना की सामाजिकता’, ‘हिन्दी कविता का अतीत और वर्तमान’, ‘आलोचना में सहमति असहमति’, ‘भारतीय समाज में प्रतिरोध की परंपरा’, ‘अनभै सांचा’ आदि पाण्डेय जी की महत्वपूर्ण समीक्षात्मक कृतियां हैं. पाण्डेय जी की पुस्तक ‘भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य’ भक्ति आंदोलन की सामाजिक महत्ता और लोकभाषाओं तथा उसके साहित्य के प्रति उनकी रुचि का प्रमाण है. इसमें उन्होंने सूर के काव्य को समकालीन किसान जीवन से जोड़ करके देखा है. वे घोषित क...

उसूलों पर अडिग महातार्किक : पेरियार ई.वी.रामासामी ( सबलोग में)

दक्षिण में हिन्दी विरोध, ब्राह्मणवाद विरोध, वेद विरोध, गीता विरोध, रामायण विरोध, धर्म विरोध आदि को नेतृत्व प्रदान करने वाले पेरियार ईरोड वेंकटप्पा रामासामी नायकर (17.9.1879- 24.12.1973) को यूनेस्को ने 27 जून 1970 को ‘नए युग का संत’, ‘दक्षिण-पूर्व एशिया का सुकरात’ और ‘समाज –सुधार आन्दोलन का जनक’ कहकर सम्मानित किया। मात्र चौथी कक्षा तक पढ़ाई करने वाले और दस साल की उम्र में सदा के लिए स्कूल छोड़ देने वाले इस नास्तिक महानायक का दक्षिण में महात्मा ज्योतिराव फुले और डॉ. भीमराव अंबेडकर की तरह ही सम्मान और प्रभाव है। पेरियार रामासामी नायकर को सम्मान में ‘थंथई पेरियार’ अर्थात् ‘आधुनिक तमिलनाडु का पिता’ कहा जाता है। तमिल अस्मिता को उभारने और उसे स्थाई आकार देने वाले केन्द्रीय पुरुष पेरियार रामासामी नायकर ही हैं। पेरियार रामासामी नायकर का जन्म तमिलनाडु के ‘ईरोड’ नामक कस्बे में, ‘धनकर’(चरवाहा) नामक दलित हिन्दू जाति में हुआ था। इनकी माता का नाम चिन्नाबाई तथा पिता का नाम वेंकटप्पा नायकर था। इनके पिता व्यवसायी थे और आम व्यवसायियों की तरह वे भी धार्मिक स्वभाव के थे। वे दान –दक्षिणा, धर्म –कर्म, पूजा...

भूदान के नायक : आचार्य विनोबा भावे( ‘सबलोग’ में )

यह महज इत्तफाक था कि मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद सत्य की खोज में घर से भागकर काशी पहुँचने वाले युवक विनायक नरहरि भावे (11.9.1895- 15.11.1982) को सत्य का सक्षात्कार एक दूसरे गुजराती, गाँधी के दर्शन में हुआ। मालवीय जी के आमंत्रण पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गांधीजी ने व्याख्यान दिया था जिसका सारांश दूसरे दिन विनोबा ने जब अखबार में पढ़ा तो जैसे उन्हें अपनी मंजिल मिल गई। उन्होंने वहीं से गांधीजी को पत्र लिखा और अनुमति पाकर अहमदाबाद उनके आश्रम में पहुँच गए। आचार्य विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में गागोदा नामक गाँव में हुआ था। उनकी मां का नाम रुक्मिणी देवी और पिता का नाम नरहरी शम्भू राव था। उनके पिता बड़ौदा राज्य में टैक्सटाइल इंजीनियर थे। उनकी माता रूक्मिणी देवी अत्यन्त धर्मपरायण महिला थीं। ब्राह्मण परिवार होने के कारण उनका परिवार धर्म ग्रन्थों के प्रति गहरी निष्ठा रखता था और धार्मिक विधि-विधान का हिमायती था। मां उन्हें प्यार से ‘विन्या’ कहकर बुलातीं थी। विनोबा के अलावा रुक्मिणी बाई के दो और बेटे थे, वाल्कोबा और शिवाजी। विनोबा नाम गाँधी जी...

हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत : भारतेन्दु हरिश्चंद्र

“निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति कौ मूल” अर्थात अपनी भाषा की प्रगति ही हर तरह की प्रगति का मूलाधार है. इस सत्य का साक्षात्कार भारतेन्दु हरिश्चंद्र ( 9.9.1850-6.1.1885) ने आज से डेढ़ सौ साल पहले ही कर लिया था. इसीलिए हम भारतेन्दु को ‘आधुनिक हिन्दी का अग्रदूत’ कहते है. मात्र 34 वर्ष 4 माह की अल्पायु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया. इस छोटी सी आयु में साहित्य के विविध क्षेत्रों में उन्होंने जो काम किया है वह अविश्वसनीय लगता है. उन्होंने ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’, ‘कविवचनसुधा’, ‘बालाबोधिनी’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया, अनेक नाटक लिखे, नाटकों के अनुवाद किए और उसमें अभिनए किए, कविताएं, निबंध, व्यंग्य और आलोचनाएं लिखीं. भारतेन्दु मंडल के माध्यम से काशी के साहित्यकारों को एकजुट करके उनका नेतृत्व किया. साहित्यिक संस्कार उन्हें अपने पिता गोपालचंद्र से मिले थे जो ‘गिरिधरदास’ के नाम से कविताएं करते थे. भारतेन्दु आधुनिक हिन्दी आलोचना के भी अग्रदूत कहे जा सकते हैं. हिन्दी गद्य के विकास और रूप निर्धारण में उनकी पत्रिका ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’ का विशेष योगदान है. इस पत्रिका ने उस युग के आधुनिक दृष्ट...

हिन्दी की चिन्दी करने पर कटिबद्ध सांसद

एक ओर जहाँ देश में ‘हिन्दी दिवस’ और ‘हिन्दी सप्ताह’ मनाया जा रहा था तो दूसरी ओर हिन्दी दिवस के दिन ही लोकसभा में एक माननीय सांसद हिन्दी की जड़ में मट्ठा डाल रहे थे. माननीय जगदंबिका पाल जी खुद भी भोजपुरी क्षेत्र के नहीं हैं लेकिन उन्होंने संसद में हिन्दी की एक बोली भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की. इसी तरह कुछ माह पहले पूर्व सांसद आर.के.सिन्हा ने राज्य सभा में भी यही मांग दुहराई थी. इस मांग के पीछे इन सांसदों का क्या स्वार्थ हो सकता है ? बिहार के चुनाव से इसका क्या और कितना संबंध है ? मेरी समझ से परे है यह विषय ? राजनीति मेरा क्षेत्र नहीं. किन्तु इसका हिन्दी पर कितना दूरगामी दुष्प्रभाव पड़ेगा -इस बात को लेकर मेरी चिन्ता बढ़ गई है. दरअसल, अंग्रेजी के वर्चस्व को बनाए रखने के लिए अंग्रेजी के बलपर शासन में बैठे शासक वर्ग की यह सुनियोजित साजिश है जिसके द्वारा वे अंग्रेजी के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा, हिन्दी को टुकड़े -टुकड़े करके नष्ट कर देना चाहते हैं. भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग पहले भी होती रही है. जो मांग करते हैं उनके अपने बच...

नई शिक्षा नीति के चक्रव्यूह में हिन्दी (जनसत्ता )

चकित हूँ यह देखकर कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 में संघ की राजभाषा या राष्ट्रभाषा का कहीं कोई जिक्र तक नहीं है. पिछली सरकारों द्वारा हिन्दी की लगातार की जा रही उपेक्षा के बावजूद 2011 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार आज भी देश की 53 करोड़ आबादी हिन्दी भाषी है. दूसरी ओर अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या दो लाख साठ हजार, यानी मात्र .02 प्रतिशत है. यानी, देश के 99.08 प्रतिशत भारतीय भाषाएं बोलने वालों पर .02 प्रतिशत लोग शासन कर रहे हैं और उनमें भी लगभग आधे लोग सिर्फ एक भाषा बोलते हैं जिसे हमारा संविधान राजभाषा कहता है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अध्याय 4.11 के अनुसार “जहाँ तक संभव हो, कम से कम ग्रेड-5 तक लेकिन बेहतर यह होगा कि यह ग्रेड-8 और उससे आगे तक भी हो, शिक्षा का माध्यम, घर की भाषा/मातृभाषा/स्थानीय भाषा/क्षेत्रीय भाषा होगी. इसके बाद घर/स्थानीय भाषा को जहां भी संभव हो भाषा के रूप में पढ़ाया जाता रहेगा. सार्वजनिक और निजी दोनो तरह के स्कूल इसकी अनुपालना करेंगे.” यहाँ चिन्ताजनक दो बातें हैं. पहली, ग्रेड-5 या अधिक से अधिक 8 तक शिक्षा के माध्यम के रूप में घर की भाषा या मातृभाषा या स्थानीय भाषा या ...