बारूद की ढेर से न्याय की गुहार का अर्थ : सोनी सोरी
“सोनी सोरी ( जन्म 15.4.1975 ) भी मादरे हिन्द की बेटी हैं, लेकिन भारत माता की इस बेटी पर 'राष्ट्रवादी रक्षकों' ने हमला किया है. मैं जब ये पंक्तियां लिख रहा हूँ, सोनी सोरी दिल्ली पहुँच चुकी हैं. अपोलो अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है.
इससे पहले वह जगदलपुर के महारानी जिला अस्पताल में पुलिस और सैन्य बलों से घिरी हुई थीं. पिछली रात उन्हें जगदलपुर से गीदम के रास्ते में, जहाँ उनका घर है, घेर लिया गया. वह मोटर साइकिल पर पीछे बैठी थीं और उनकी सहकर्मी रिंकी मोटर साइकिल चला रही थीं. रिंकी को चाकू दिखाया गया और सोनी को कुछ दूर ले जाकर उन पर हमला किया गया. उनके चेहरे पर कोई जलनेवाली चीज़ मल दी गई जिससे उनका चेहरा सूज गया और उन्हें दिखाई नहीं दे रहा है. उन्हें बोलने में भी परेशानी हो रही है. अभी उनकी सूजन खत्म हो गई है लेकिन देखने और बोलने में दिक्कत बनी हुई है.
आज सुबह उन्होंने किसी तरह बताया कि जिन लोगों ने हमला किया उन्होंने धमकी दी है कि अगर उन्होंने मारडुम की मुठभेड़ का मामला उठाना बंद नहीं किया और वहाँ के पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जाँच और कार्रवाई की माँग बंद नहीं की तो यही सलूक उनकी बेटी के साथ भी किया जाएगा.“
उक्त टिप्पणी प्रो. अपूर्वानंद की है जिसे फरवरी 2016 में उन्होंने पोस्ट किया है. वे आगे लिखते हैं,
“वे हाल में बस्तर के मारडुम में हुई एक फर्जी मुठभेड़ की जाँच की माँग कर रही थीं. इस मुठभेड़ में ‘हिडमा’ नाम के एक आदिवासी को मार डाला गया था. पुलिस ने दावा किया कि हिडमा इनामी नक्सली है लेकिन हिडमा के गाँववालों ने पुलिस के मुठभेड़ के दावे को गलत बताया और कहा कि हिडमा को पुलिस उसके घर से उठाकर ले गई थी. उन्हें उस पुलिस ऑफिसर का नाम भी याद था, जो वहाँ आया था. सोनी इन गाँववालों के इस सच को दुनिया के सामने लाने के लिए उन्हें रायपुर ले गई थीं और उनकी प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करवाई थी. वह इस घटना के लिए एफआईआर दायर करवाने की कोशिश कर रही थीं.“
सोनी सोरी का जन्म छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के समेली गाँव में एक आदिवासी परिवार में हुआ था. यह ऐसा दुर्गम इलाका है जहाँ कई जगहों पर जाने के लिए कई- कई दिन पैदल चलना पड़ता है. उनके पिता का नाम मुंडाराम था. उनका परिवार राजनीतिक चेतना से संपन्न परिवार था. उनके पिता मुंडाराम गाँव के सरपंच और चाचा सी.पी.आई. पार्टी के विधायक भी रह चुके हैं. इस पारिवारिक पृष्ठभूमि का असर सोनी सोरी के व्यक्तित्व पर भी पड़ा. उनकी पढ़ाई गाँधीवादी परिवेश में हुई. माता रुक्मणी कन्या आश्रम, डिमरापल, जगदलपुर से इंटर की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे जबेली गाँव के एक आदिवासी विद्यालय में शिक्षण कार्य करने लगीं.
यह पूरा इलाका नक्सलियों से प्रभावित है. मैं यहाँ कहना चाहता हूँ कि नक्सली पैदा नहीं होते हैं, परिस्थितियाँ उन्हें नक्सली बनने पर मजबूर करती हैं. अनादि काल से जल जंगल जमीन आदिवासियों के जीवन के आधार हैं. जब ये आधार उनसे छीने जाते हैं और उनकी पुकार कोई नहीं सुनता तब उन्हें हथियार उठाने पर मजबूर होना पड़ता है. कॉरपोरेट और नेता मिलकर यह खेल खेलते हैं.
जब कभी मुठभेड़ होती है तब सैनिक और नक्सली ही मरते हैं. कोई नेता या पूँजीपति नहीं मरता. लड़ाई दरअसल जल, जंगल और जमीन को बचाने की है.
एक दिन नक्सलियों के एक ग्रुप ने आकर सोनी सोरी को बताया कि उन लोगों ने उनका विद्यालय तोड़ देने का निर्णय लिया है क्योंकि पुलिस के लोग यहाँ आकर ठहरते हैं. सोनी सोरी ने अपने एक साक्षात्कार में बताया कि उन्होंने नक्सलियों से विद्यालय न तोड़ने की सिफारिश की क्योंकि उसमें आदिवासियों के बच्चे ही पढ़ते हैं और वे स्वयं भी आदिवासी हैं. उन्होंने शिक्षा के महत्व को भी समझाया. उन्होंने नक्सलियों को आश्वासन दिया कि उनके विद्यालय का इस्तेमाल पुलिस को ठहरने के लिए नहीं किया जाएगा. नक्सलियों ने दूसरे कई विद्यालय तोड़ दिए किन्तु सोनी सोरी का विद्यालय उनके आश्वासन पर छोड़ दिया.
उसी दौर में आदिवासियों की जमीनें देश की बड़ी कंपनियों को देने के लिए सरकार ने ‘सलवा जुडुम’ अभियान चलाया. सरकार द्वारा चलाया गया यह अभियान यद्यपि नक्सलियों के खिलाफ था किन्तु इसकी चपेट में बड़ी संख्या में निर्दोष और निरीह आदिवासी भी आने लगे. इस अभियान में आदिवासियों के गाँव खाली कराने के लिए घरों में आग तक लगा दी जाती थी. सुरक्षाबलों ने आदिवासी महिलाओं पर निर्मम अत्याचार किए और हजारों आदिवासियों को जेलों मे ठूँस दिया. सोनी सोरी ने इसका विरोध किया. एक आदिवासी औरत होने के बावजूद पुलिस के जुर्म के खिलाफ आवाज उठाने की जुर्रत करने के कारण पूरा सत्ता तंत्र सोनी सोरी को सबक सिखाने पर तुल गया ताकि कोई आदिवासी सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत न कर सके.
सोनी सोरी को 9 सितंबर 2011 को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया और छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया गया. उनपर आरोप लगाया गया कि 7 जुलाई 2010 को कांग्रेसी नेता अवधेश गौतम पर हुए नक्सली हमले में वे शामिल थीं. उनके पत्रकार भतीजे लिंगा कोड़ोपी पर भी फर्जी मुकदमें दायर किए गए. उनपर झूठे कागजों पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला गया, उन्हें बेइन्तहाँ यातनाएँ दी गईं. लेकिन पुलिस के दबाव में वे नहीं झुकी. उन्हें पुलिस ने जिस तरह प्रताड़ित किया उसके बारे में अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है,
“मुझे नंगा करके बिजली का शॉक दिया गया, बलात्कार किया गया, मेरे अंदर पत्थर डाले गए.... मैं कितना रोई. मैंने तीन बच्चों को अपनी योनि से ही बाहर निकाला, लेकिन जब कोलकाता में मेरी योनि से पत्थर निकाले जा रहे थे तो मुझे जो दर्द हुआ वह बच्चा पैदा करने के दर्द से कई गुन ज्यादा था. मेरा क्या गुनाह था, सिवाए इसके कि मैं एक पढ़ी लिखी आदिवासी महिला थी. मेरी जैसी अनगिनत आदिवासी औरतें इस यातना को आज भी झेल रही हैं. मैं यह सब दिखाना चाहती हूँ, ताकि देश के लोग सोचें कि क्या हो रहा है.” ( गिरिजेश वशिष्ठ के ट्विटर से) ये सारी अमानुषिक यातनाएँ उन्हें जेल में दी गईं.
उन्हें प्रताड़ित करने के बाद उन्हें धमकी दी गई कि यदि उन्होंने अपने साथ हुए जुल्मों के बारे में किसी को भी बताया तो उनके बच्चों की परवरिश करने वाले सोनी के भाई को भी जेल में डाल दिया जाएगा. लेकिन पुलिस की धमकी से डरे बिना सोनी सोरी ने अपने ऊपर किए गए पुलिस के जुल्म की दास्तान सबको बता दिया. बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जाँच कराए जाने पर उनके यौनांग में तीन पत्थर पाए गए. ढाई साल की यातनापूर्ण सजा के बाद सुप्रीम कोर्ट से उन्हें स्थाई जमानत मिल गई. छत्तीसगढ़ पुलिस ने उनपर आठ आरोप लगाए थे. जाँच के बाद उनमें से सात आरोप झूठ पाए गए और एक में उन्हें जमानत मिल गई.
सोनी सोरी पर हो रहे अत्याचार को देखकर उनकी माँ ने दम तोड़ दिया. उनके पिता को भी गोली मार दी गई. सोनी सोरी के पति अनिल फुटाने को भी पुलिस ने फर्जी मामले में फँसाकर जेल में डाल दिया. बाद मे अनिल फुटाने को कोर्ट ने निर्दोष घोषित किया किन्तु तबतक तीन साल गुजर चुके थे और सोनी सोरी के पति अनिल अस्पताल में मौत की साँसें गिन रहे थे. सोनी के पति की उम्र चालीस वर्ष से भी कम थी. वह एक स्वस्थ और हट्ठे -कट्ठे जवान थे. उन्हें पुलिस ने इतना पीटा कि वे रिहा होने के बाद अपने पैरों से चलने लायक भी नहीं थे. इस तरह सोनी सोरी के बच्चे असमय ही अनाथ हो गए. एक हँसता- खेलता परिवार तबाह हो गया.
अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि जेल में उनकी भेंट ऐसी सैकड़ों बेकसूर, निरीह महिलाओं से हुई जिनके ऊपर बेइन्तहाँ जुल्म ढाए जा चुके थे. अपनी यातनाओं के बाद जब वे रो रहीं थीं तो दो आदिवासी लड़कियाँ उन्हें चुप कराने आईं. उन लड़कियों ने उन्हें चुप कराते हुए अपने ऊपर हुई यातनाओं के बारे में बताया और अपने ब्लाउज उतारकर दिखाया. उनके स्तनों के निपिल काट दिए गए थे. उन लड़कियों ने कहा कि, “ हम तो अनपढ़ हैं किन्तु आप तो पढ़ी लिखी हैं. आप इन अत्याचारों के खिलाफ लड़ सकती हैं.”
सोनी सोरी पर उनका असर पड़ा. उन्होंने रोना छोड़कर बस्तर के निरीह और बेसहारा आदिवासियों के ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ लड़ने का बीड़ा उठाया. वे लड़कियाँ नक्सली नहीं थीं. वे निर्दोष थीं किन्तु नक्सली के नाम पर उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया गया था. सोनी सोरी ने जब उन लड़कियों से पूछा कि यहाँ से छूटने के बाद वे कहाँ जाएंगी तो उन्होंने तुरंत कहा कि नक्सलियों के पास. क्योंकि उनके साथ जो कुछ हुआ है, जितना बलात्कार हुआ है, उसके बाद कोई उन्हें अपनाएगा कैसे ? उनके भतीजे लिंगाराम कोडोपी के अनुसार वहाँ यदि 100 लोग मारे जाते हैं तो उनमें से मुश्किल से 5 ही नक्सली होते हैं. 95 निर्दोष होते हैं. उनके बच्चे बेसहारा हो जाते हैं. आमतौर पर निरीह गाँव वालों को मार कर उन्हें नक्सलियों के कपड़े पहना दिए जाते हैं और वाह- वाही लूटी जाती है. उसी के बल पर पुलिस के अफसरों के प्रमोशन होते हैं. लिंगाराम कहते हैं कि दिल्ली में यदि एक रेप होता है तो देश भर से आवाजें उठती हैं और यहाँ आदिवासियों के एक- एक गाँव में बीस- बीस महिलाओं के साथ एक साथ रेप होता है और कहीं कोई चर्चा नहीं होती. यहाँ ग्राउंड लेबुल पर रिपोर्ट के लिए पत्रकार चाहिए किन्तु किसी को भी आने नहीं दिया जाता. जो भी यहाँ आता है और इन निरीह बेसहारा लोगों के प्रति हमदर्दी जताता है उसे ‘अर्बन नक्सल’ कहकर उसे भी जेल में डाल दिया जाता है. वे बताते हैं कि आदिवासियों को कभी कोई न्याय नहीं मिलता. वहाँ कोई संविधान है ही नहीं.
जेल से छूटने के बाद सोनी सोरी ने अपना पूरा जीवन निर्दोष आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ लड़ने के लिए समर्पित कर दिया. उन्होंने आदिवासियों के घरों में घूम-घूम कर ऐसे आदिवासी बच्चों को खोज निकाला जिनके माता –पिता पुलिस या नक्सलियों द्वारा मार दिए गए थे. ऐसे बच्चों को उन्होंने अपने स्कूल में पनाह दी. अपने वेतन के पैसों से उन बच्चों की शिक्षा जारी रखी. उनके प्रयास से अनेक आदिवासी बच्चों के जीवन में ज्ञान का आलोक फैल रहा है. बस्तर में फर्जी मुठभेड़ों, आदिवासी महिलाओं के साथ सुरक्षाकर्मियों द्वारा बलात्कार आदि की समस्या को सोनी सोरी ने राष्ट्रीय स्तर पर उठाया और आज भी वे उन्हें न्याय दिलाने के लिए लगातार लड़ रही हैं.
सोनी सोरी को गोमपाड़ में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराए जाने के कारण नक्सलियों द्वारा भी प्रताड़ित किया गया. इस तरह उनपर दोनो ओर से अत्याचार होते रहे. नक्सलियों के हिंसा का विरोध करने के लिए नक्सलियों द्वारा भी और नक्सलियों से संबंध रखने के नाम पर सरकार की पुलिस द्वारा भी. ‘लोकवाणी’ के अनुसार,” वे दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला हैं जो मनुष्य के जीवन जीने और उसे जिन्दा रहने के लिए उसके फितरत से लगातार लड़ती हैं.......... जबतक सोनी जीवित हैं आदिवासियों को जिन्दा रहने का बहाना मिल जाता है. उनके कारण आदिवासियों का अस्तित्व जिंदा है. जल, जंगल और जमीन जिन्दा है, उनकी संस्कृति जिन्दा है.” ( उत्तम कुमार व हिमांशु कुमार, लोकवाणी,15 अप्रैल 2019)
गिरिजेश वशिष्ठ लिखते हैं, “सोनी सोरी आम आदिवासी महिला नहीं हैं. वो संघर्ष की जीती जागती मिसाल हैं और दमन का जिन्दा उदाहरण हैं. इस पूरी दास्तान को जब आप पढ़ रहे होंगे तो मन में बार- बार एक सवाल कौंधा होगा. सवाल ये कि आदिवासियों पर अमानुषिक जुल्म करने वाले लोग कौन थे ? हो सकता है आप के दिमाग में किसी दबंग और ठेकेदार का नाम आया हो. हो सकता है आपको लगा हो कि ये सब काम आस- पास के दबंगों ने किया हो. हो सकता है आप पुलिस थाने में जुल्म की दास्तान मानकर विचलित हो गए हों, लेकिन ये दास्तान इससे कहीं ज्यादा चिन्ताजनक और दहलाने वाली है. “
वास्तव में दुनिया भर के पूँजीपतियों की दृष्टि अब आदिवासियों के जंगल और जमीन पर है. उन्हें हड़पे बिना पूंजीवाद की भूख मिट नहीं सकती. उसे इस जमीन में दबे खनिज चाहिए और इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं. सोनी सोरी शिक्षित हैं और वह अपने जनतांत्रिक अधिकारों को समझती हैं. अपने आदिवासी बंधुओं के लिए वे उनका प्रयोग भी करती हैं. सरकारें नहीं चाहतीं कि आदिवासियों को जुबान मिले इसलिए सोनी सोरी को सजा दी गई और सरकारें आज भी उनके पीछे पड़ी हुई हैं.
अपूर्वानंद के शब्दों में, “ वह ऐसे राज्य में हैं जहाँ पुलिस और व्यवस्था की मेहरबानी पर ही ज़िंदा हैं. अभी इसी हफ्ते जगदलपुर लीगल ऐड ग्रुप की शालिनी गेरा और इशा खंडेलवाल को उनका मकान ही नहीं, जगदलपुर छोड़ने को मजबूर कर दिया गया. वह अभी ढाई साल पहले आदिवासियों को कानूनी मदद दिलाने के ख्याल से दिल्ली, मुम्बई जैसे शहरों की महानगरीय सुविधा छोड़कर जगदलपुर गई थीं. ऐसा ही मालिनी सुब्रमण्यम के साथ हुआ जो अंतर्राष्ट्रीय गैरसरकारी संस्था का अपना काम छोड़कर छत्तीसगढ़ के असली हालात से दुनिया को परिचित कराने के विचार से वहाँ रह कर पत्रकारिता कर रही थीं.
शालिनी और ईशा पर लंबे समय से दबाव बढ़ रहा था. पहले वहाँ के वकीलों ने, पुलिस ने उनके खिलाफ अभियान चलाया और उनके वकालत करने में हर संभव रुकावट डाली. पुलिस की मिलीभगत से उनके खिलाफ पर्चे निकलवाए गए. बस्तर के पुलिस प्रमुख ने उनके बस्तर छोड़ने को उचित ठहराते हुए कहा कि वह स्थानीय लोगों का रोजगार छीन रही थीं. लिखने की तैयारी में जब मैंने अपने मित्र पत्रकार आलोक पुतुल को फोन किया तो उन्होंने बताया कि वह किसी तरह बस्तर से सुरक्षित वापस रायपुर पहुंचे हैं. वह दस दिन रहकर रिपोर्टिंग के इरादे से वहां गए थे और रास्ते में ही सर्वोच्च पुलिस अधिकारियों को अपने आने की खबर तो की ही थी, उनसे मिलने का वक्त भी माँगा था. लंबे समय तक कोई जवाब नहीं आया. इसी बीच सोनी पर हमले की घटना हुई, आलोक ने इसकी रिपोर्ट की. ( अपूर्वानंद की 24 फरवरी 2016 की पोस्ट से )
सोनी सोरी ने आरोप लगाया कि बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक शिवराम प्रसाद कल्लूरी के इशारे पर उनपर बस्तर में हमला किया गया. कल्लूरी स्वयं भी जनजाति समुदाय के ही हैं किन्तु अब उनका अपना वर्गचरित्र निर्मित हो चुका है.
जेल से रिहा होने के बाद सोनी सोरी ने आम आदमी पार्टी के टिकट पर लोक सभा का चुनाव भी लड़ा जिसमें उन्हें पराजय मिली किन्तु वे हिम्मत हारने वालों में से नहीं है. वे सरकार द्वारा चुनाव लड़ने के लिए टिकट पाना ही अपनी जीत मानती हैं.
सोनी सोरी के ऊपर होने वाली जुल्म की कहानी आज भी यथावत जारी है. विगत 24 सितंबर 2020 को कोरोना टेस्ट में वे कोरोना से संक्रमित पाई गईं. एक दिन बाद यानी, 25 सितंबर को भाजपा एम.एल.ए. भीमा मांडवी की लक्सलियों द्वारा एक साल पहले की गयी हत्या की जाँच के सिलसिले में पूछताछ के लिए उन्हें एन.आई.ए. की टीम ने बुलाया. सोनी सोरी ने अपने को कोरोना पाजिटिव होने के बारे में उन्हें सूचित किया. इसके बावजूद एन.आई.ए. ने उन्हें उपस्थित होने को कहा. सोनी सोरी को कोई वाहन भी साथ ले जाने को तैयार नहीं था. मजबूर होकर वे अपने भतीजे लिंगाराम के पीछे बाईक पर बैठकर, बुखार से पीड़ित और बरसात में भीगती हुई अपने घर से 80 किलोमीटर दूर दंतेवाड़ा एन.आई.ए. दफ्तर पहुँचीं. इस अवस्था में भी वहाँ उनसे सात घंटे पूछताछ की गई. दूसरी ओर, इसके चार दिन बाद स्थानीय गीदम प्रशासन ने क्वारंटीन नियम तोड़ने और संक्रामक रोग फैलाने का दोषी करार देते हुए उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा-188, 269 और 270 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. ( द वायर, 4 अक्टूबर 2020 में सुकन्या शान्ता की रिपोर्ट से)
सोनी सोरी कहती हैं कि अब उन्हें जेल से डर नही लगता. वहाँ जाना आना लगा रहता है. उनके बच्चे भी उनसे कह चुके हैं कि उन्हें सुरक्षित स्थान पर रख दें और वे खुद पीड़ितों –प्रताड़ितों के हक की लड़ाई लड़े. वे कहती हैं कि जेल ने उन्हें संघर्ष करना सिखाया.. वे तिहाड़, रायपुर, कलकत्ता आदि जेलों में रही. आरंभ में कीड़ों से भरे दाल खाने को दिए जाते थे. खाने की हिम्मत नहीं होती थी. जेल के दूसरे बन्दी कहते थे कि जिन्दा रहना है तो खाना पड़ेगा. वहाँ जेल में लैट्रिन साफ कराया जाता था. हाथ द्वारा चूने से सफाई कराई जाती थी. कुछ गर्भवती महिलाएं भी थीं. एक महिला को अस्पताल में बच्चा पैदा करने लिए ले जाया गया. वहाँ अस्पताल के बेड पर भी उसके पैरों में जंजीरें बँधी रहती थीं. नक्सली के नाम पर इन जेलों में बंद अधिकांश लड़कियाँ निर्दोष होती हैं किन्तु उनके हक की लड़ाई लड़ने वाले लोग नहीं हैं.
सोनी सोरी को उनके साहस और सामाजिक कार्य के लिए दिल्ली हिन्दी अकादमी का संतोष कोली तथा समाज सेवा हेतु कुंती माथुर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. सोनी सोरी अटूट संघर्ष की एक अनोखी मिसाल हैं. उन्हें 27 नवंबर 2016 को मुंबई में मैरी पाटिल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है. मैरी पाटिल ने भी आदिवासियों की शिक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे.
आयरलैंड के एक मानव अधिकार संगठन ‘फ्रंट लाईन डिफेंडर्स’ ने वर्ष 2018 में सोनी सोरी के संघर्ष और आदिवासियों के हक के लिए लड़ते देख उन्हें प्रतिष्ठित ह्यूमन राइट्स एवार्ड देने का फैसला किया.
एक आधिकारिक बयान में फ्रंट लाईन डिफेन्डर्स के एक्ज्यूटिव डायरेक्टर एंड्रयू एंडरसन ने कहा, “ हम दुनिया के सबसे खतरनाक इलाके में अपनी जान की परवाह न करते हुए शांति और न्याय की आवाज उठाने वालों को सम्मानित कर रहे हैं.”
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