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Showing posts from July, 2020

ज्ञान के माध्यम- भाषा का सबसे विश्वसनीय अन्वेषक: प्रो. जोगा सिंह विर्क

प्रो. जोगा सिंह विर्क ( जन्म- 10.7.1053) वास्तव में हिन्दी के योद्धा नहीं है. उनकी मातृभाषा पंजाबी है. वे मातृभाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं और उन्होंने अपने जीवन का यही मिशन बना लिया है. यदि ऐसा होता है तो देश के 99 प्रतिशत विद्यार्थियों को फायदा होगा, उन विद्यार्थियों का श्रम बचेगा जो ज्ञान अर्जित करने में लगेगा. इससे सबसे ज्यादा फायदा हिन्दी का होगा क्योंकि हिन्दी भाषी विद्यार्थी देश में सबसे ज्यादा हैं. इसीलिए पंजाबी भाषी जोगा सिंह को मैंने ‘हिन्दी का योद्धा’ कहा है. दरअसल भारतीय भाषाएं बची रहेंगी तभी हिन्दी भी बची रहेगी, वर्ना अंग्रेजी सबको लील लेगी। पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला में भाषा विज्ञान विभाग में प्रोफेसर रहे जोगा सिंह विर्क शिक्षा के माध्यम के विषय में गंभीर शोध किया है और ‘भाषा नीति के बारे में अंतर्राष्ट्रीय खोज’ नाम से एक छोटी किन्तु महत्वपूर्ण पुस्तिका की हजारों प्रतियाँ छपवाकर वितरित किया है और वे आज भी इस काम में लगे हुए हैं. उनकी दृढ़ मान्यता है कि मातृभाषाओं के माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा ही उचित, लाभप्रद और उपयोगी हो सकती है. यूनेस्को ...

नयी आलोचना का आलोचनात्मक विवेक : ए अरविन्दाक्षन

ए. अरविन्दाक्षन ( 10.6.1949 ) के रूप में मशहूर प्रो. अप्पुकुट्टन अरविन्दाक्षन कवि और अनुवादक के साथ- साथ एक प्रतिष्ठित आलोचक भी है. अमूमन देखा जाता है कि दक्षिण के प्रतिष्ठित हिन्दी विद्वानों और साहित्यकारों की शिक्षा उत्तर भारत के काशी और प्रयाग जैसे शिक्षा केन्द्रों से मिली होती है. प्रो. ए. अरविन्दाक्षन दक्षिण के अकेले ऐसे साहित्यकार हैं जिनका जन्म केरल में हुआ, वहीं शिक्षा हुई और उन्होंने वहीं पर अध्यापन भी किया, किन्तु उनकी भाषा अथवा भाषण को सुनकर कोई उन्हें अहिन्दीभाषी मानने के लिए सहमत नहीं होगा. उनकी सूक्ष्म और पैनी आलोचना-दृष्टि, विश्लेषण-क्षमता तथा संवेदनशीलता उन्हे आलोचक के रूप में अलग और विशिष्ट पहचान दिलाती है. उनके पास सही अर्थों में आलोचनात्मक विवेक है. वे बहुभाषाभाषी ही नहीं हैं, बल्कि, हिन्दी, मलयालम और अंग्रेजी साहित्य के गहरे अध्येता भी हैं और उसका स्पष्ट प्रभाव उनके सृजन पर दिखाई देता है. प्रो. अरविन्दाक्षन की आलोचना का क्षेत्र आधुनिक साहित्य है. अज्ञेय उनके प्रिय कवि हैं. ‘महादेवी वर्मा के रेखा चित्र’, ‘अज्ञेय की उपन्यास यात्रा’, ‘महादेवी वर्मा’, ‘समकालीन हिन्दी ...

सारस्वत बोध के प्रतिमान : आचार्य रामचंद्र तिवारी ( जनसंदेस टाइम्स में 4 जून को प्रकाशित )

आचार्य रामचंद्र तिवारी ( 4.6.1924- 4.1.2009) शास्त्रीय और व्याख्यात्मक आलोचना के मानदंड की तरह हैं. उन्हें किसी विशेष विचारधारा से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. वे आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परंपरा के ही आलोचक हैं और रस सिद्धांत को साहित्य के मूल्यांकन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानदंड मानते हैं. किन्तु उन्होंने शुक्ल जी का भी अंधानुकरण नहीं किया है. उन्हें जहां भी जरूरत महसूस हुई, विनम्रतापूर्वक अपनी असहमति दर्ज की है. शुक्ल जी के रस संबंधी विवेचन पर अपनी सहमति व्यक्त करते हुए वे शुक्ल जी द्वारा सूरदास के विरह वर्णन को “बैठे ठाले का काव्य” कहने पर अपनी असहमति दर्ज करते हैं और कहते हैं, “वस्तुत: तुलसी को सर्वत्र आदर्श मानकर शुक्ल जी कहीं- कहीं सूर के साथ न्याय नहीं कर पाए हैं. गोपियों के सामने प्रश्न दूरी का नहीं, व्यक्तित्व का है. वे रस रूप कृष्ण की प्रेमिका हैं, राजनीतिज्ञ कृष्ण की नहीं. यदि वे मथुरा जातीं तो भी उन्हें उनका अपना ‘कन्हैया’ कहां मिलता ? वे तो “मोर- मुकुट मकराकृत कुंडल पीत -वसन वनमाली” को प्रेम करती थीं. चक्रसुदर्शनधारी से उनका कोई नाता नहीं था. इसके अतिरिक्त सूर पुष्टिमार्गीय ...

आलोचिन्तक रमेश कुन्तल मेघ

रमेश कुन्तल मेघ (जन्म : 1.6.1931 ) का विशालकाय ग्रंथ ‘विश्वमिथक सरित्सागर’ अपने ढंग का हिन्दी में अकेला ग्रंथ है. इस पुस्तक में मेघ जी ने देश- विदेश के समाजों, संस्कृतियों, विचारों, मूल्यों, परंपराओं, ग्रंथों, इतिहासों, कहानियों, प्रतीकों, दृष्टांतों, नृत्यों, खेलों, इमारतों, नाटकों आदि सभी कुछ को समेट लिया है. इसमें विश्व के लगभग पैंतीस देशों की मिथक गाथा, विश्व धरोहर की संस्कृतियों की मिथक-चित्र-आलेखकारी, विश्व के मिथक-भौगोलिक मानचित्रों का लेखा –जोखा तथा दुर्लभ विश्वमिथक गाथाओं को शामिल किया गया है. विश्व भर के मिथकों का अस्तित्व मुख्यत: दो प्रश्नों पर टिका हुआ है- पहला यह कि सृष्टि कैसे बनी और कैसे चलती है और दूसरा यह कि मानव कैसे जन्मा ? लेखक ने मिथकीय परिप्रेक्ष्य में इन दोनो प्रश्नों के जवाब तलाशने की भी कोशिश की है. रमेश कुन्तल मेघ साहित्य के मूल्यांकन के लिए मार्क्सवादी नजरिए को सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं. ‘मिथक और स्वप्न’ ‘कामायनी की मनस्सौन्दर्य सामाजिक भूमिका’,‘आधुनिक बोध और आधुनिकीकरण’, ‘मध्ययुगीन रस-दर्शन और समकालीन सौन्दर्यबोध’, ‘तुलसी : आधुनिक वातायन से’, ‘कला शास्त्...

व्याख्यात्मक आलोचना के आदर्श प्रो.सूर्यप्रसाद दीक्षित ( जनसंदेस टाइम्स , लखनऊ, 6.7.20 को प्रकाशित)

सूर्यप्रसाद दीक्षित( जन्म-5.7.1938) का समीक्षा क्षेत्र व्यापक है. वे आधुनिक साहित्य, मुख्यत: छायावाद के विशेषज्ञ हैं और मानते हैं कि छायावाद आधुनिक हिन्दी कविता का शिखर है. उनके अनुसार साहित्य के सौन्दर्य की, शुद्ध कविता की और वृहत्तर मानव मूल्यों की सर्वश्रेष्ठ साधना छायावाद में प्रतिफलित हुई है. वे मानते हैं कि छायावाद ने कविता को स्वायत्त अनुशासन का रूप दिया है और उसे एक परिपूर्ण व्यवस्था के रूप में परिणत कर दिया है. उनके अनुसार छायावादी कवियों की अंतर्दृष्टि वैश्विक है. सौन्दर्यबोध छायावाद का सर्वाधिक मौलिक प्रदेय है. उनके अनुसार “छायावादी कवियों ने भक्तिकाव्य तथा द्विवेदी युग के परहेजी संस्कार, रीतिकालीन कवियों के कायिक कौतुकी कदाचार और प्रगतिवादियों, प्रयोगवादियों एवं साठोत्तरी पीढ़ियों के यौनाकुल आवेश ज्वार से ऊपर उठकर सौन्दर्य की श्रेष्ठ साधना की है.” उनके अनुसार छायावादी कवियों का सौन्दर्य-विधान इतना व्यापक है, उनका चित्राधार इतना विराट है और उनकी सृष्टि इतनी विलक्षण है कि उसमें प्राय: जीवन का सर्वस्व समाहित हो गया है. दूसरी ओर छायावादी गद्य की खोज करके उन्होंने छायावाद की अ...

पहाड़ के पितामह चंडीप्रसाद भट्ट

अमूमन पहाड़ पर जन्म लेने वाले लोग पढ़ने –लिखने या रोजगार के लिए जब मैदानी क्षेत्रों में आते हैं तो दोबारा स्थाई रूप से रहने के लिए पहाड़ पर नहीं लौटते, सामाजिक कार्य करने के लिए पहाड़ पर लौटने की बात तो कभी सुनने में भी नहीं आती। किन्तु चंडीप्रसाद भट्ट (( 23.6.1934) इसके अपवाद हैं। वे समाज सेवा का प्रशिक्षण लेने के लिए तो मैदानी क्षेत्र में आए किन्तु भीष्म पितामह की तरह पहाड़ की रक्षा के लिए पुन: पहाड़ पर ही लौट गए और आज भी पहाड़ की सुरक्षा में तन- मन- धन से लगे हुए हैं। प्रख्यात पत्रकार रामचंद्र गुहा ने लिखा है, “चंडीप्रसाद भट्ट एक महान अग्रणी पर्यावरणविद, कार्यकर्ता और विस्तृत सोच और उपलब्धियों वाले चिंतक हैं, जो अपनी सहजता और अंग्रेजी पर मजबूत पकड़ न होने के कारण बहुत कम जाने गए और उन्हें काफी कम सम्मान मिला। न तो वह अपने काम का ढोल पीटते हैं और न ही उनके काम का ढोल पीटने वाला कोई है। किसी को उनके काम का वास्तविक आकलन करने के लिये गढ़वाल जाना होगा या उनके सहयोगियों से सम्पर्क करना होगा। मुझे रमेश पहाड़ी के ये शब्द बिल्कुल सटीक लगते हैं- दुनिया में आज जितने प्रकार के मुद्दों...

मार्क्सवादी आलोचक शिवकुमार मिश्र

शिवकुमार मिश्र ( प्रतिबद्ध मार्क्सवादी आलोचक हैं. ‘जनवादी लेखक संघ’ के राष्ट्रीय महासचिव और बाद में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने लम्बे समय तक लेखक संगठन का नेतृत्व किया. उनकी समीक्षा साफ सुथरी और निर्णयात्मक है. ‘कामायनी और प्रसाद की कविता गंगा’, ‘वृंदावनलाल वर्मा : उपन्यास और कला’, ‘प्रगतिवाद’, ‘यथार्थवाद’, ‘मार्क्सवादी साहित्य चिन्तन : इतिहास तथा सिद्धांत’, ‘साहित्य और सामाजिक संदर्भ’, ‘प्रेमचंद : विरासत का सवाल’, ‘भक्तिकाव्य और लोक जीवन’, ‘दर्शन, साहित्य और समाज’, ‘हिन्दी आलोचना की परंपरा और आचार्य रामचंद्र शुक्ल’, ‘आलोचना के प्रगतिशील आयाम’, ‘नया हिन्दी काव्य’, ‘आधुनिक कविता और युग संदर्भ’, ‘मार्क्सवाद देवमूर्तियां नहीं गढ़ता’, ‘साहित्य : इतिहास और संस्कृति’, ‘साम्प्रदायिकता और हिन्दी उपन्यास’ आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं. मिश्र जी की आलोचनाएं सैद्धांतिक भी हैं और व्यावहारिक भी. ‘यथार्थवाद’, ‘प्रगतिवाद’, ‘मार्क्सवादी साहित्य चिन्तन : इतिहास तथा सिद्धांत’ आदि ग्रंथ उनकी सैद्धांतिक आलोचना के प्रमाण हैं. दूसरी ओर उन्होंने प्रेमचंद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, निराला और मुक्त...

गाँधीवादी आलोचक विश्वनाथप्रसाद तिवारी

साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष, प्रख्यात साहित्यकार विश्वनाथप्रसाद तिवारी ( जन्म- 20.6.1940 ) आज अस्सी के हो गए. ‘सादा जीवन- उच्च विचार’ को अपनी जीवन- चर्या का अंग बनाने वाले तिवारी जी मूलत: कवि हैं किन्तु एक निर्भीक और तटस्थ आलोचक के रूप में भी उन्होंने अपनी पहचान बनायी है. ‘नये साहित्य का तर्कशास्त्र’, ‘आधुनिक हिन्दी कविता’, ‘समकालीन हिन्दी कविता’, ‘हजारीप्रसाद द्विवेदी, ‘रचना के सरोकार’, ‘गद्य के प्रतिमान’, छायावादोत्तर हिन्दी गद्य साहित्य, ‘कविता क्या है?’, ‘आलोचना के हाशिए पर’, ‘कबीर’, ‘कुबेरनाथ राय’,’गद्य का परिवेश ‘आदि उनकी प्रमुख आलोचना पुस्तकें हैं. तिवारी जी के शब्दों में, “राज्य, समाज, धर्म और विचारधारा – ये चारो जब कट्टर होते हैं और अपने सच को अन्तिम मानने लगते हैं तो रचनाकार के शत्रु बन जाते हैं. राज्य का सर्वसत्तावादी तानाशाही रूप, समाज का संकीर्ण रूढ़िवादी रूप, धर्म का कर्मकाण्डी साम्प्रदायिक रूप और विचारधारा का पार्टी पिछलग्गू रूप – ये चारो रचनाकार के शत्रु हैं, क्योंकि ये एक अपना तंत्र विकसित कर लेते हैं, फिर उसकी सुरक्षा इनकी चिन्ता का मुख्य विषय बन जाती है.” ( आलो...

पत्रकारिता की अनुसंधानपरक समीक्षा के आचार्य पद्मश्री डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र

‘कल्पतरु की उत्सव लीला’ के रूप में रामकृष्ण परमहंस की अद्भुत जीवनी के प्रणेता और प्रतिष्ठित ललित निबंधकार डॉ.कृष्णबिहारी मिश्र (जन्म-1.7.1932) का नाम हिन्दी पत्रकारिता के आलोचक के रूप में भी पहली पंक्ति में रखा जा सकता है. यद्यपि उन्होंने कभी कोई पत्रकारिता नहीं की, किसी अखबार या पत्रिका का संपादन नहीं किया किन्तु उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने अनुसंधान, अध्ययन और समीक्षण से एक कीर्तिमान स्थापित किया है. डॉक्टरेट की उपाधि के लिए शोध हेतु पत्रकारिता का क्षेत्र चुनना और इसके बाद उसमें इतना रम जाना कि बाद में भी पत्रकारिता केन्द्रित कई उत्कृष्ट पुस्तकों का प्रणयन करना विरल घटना है. ‘हिन्दी पत्रकारिता : जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण भूमि’ नामक उनकी कृति जो मेरे पास है, वह 2011 में प्रकाशित आठवां संस्करण है. किसी गंभीर शोध कृति के इतने पाठक अमूमन बहुत कम देखने को मिलते हैं. अपनी उक्त पुस्तक में ‘आभार’ शीर्षक भूमिका में वे खुद लिखते हैं, “प्रस्तुत पुस्तक कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट उपाधि के लिए स्वीकृत शोध –प्रबंध है. अनुसंधान का मूल विषय था कलकत्ता की हिन्...