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Showing posts from February, 2020

अस्सी के हुए विजय बहादुर सिंह

आज मेरे प्रिय और हमारे समय के महत्वपूर्ण आलोचक और कवि विजय बहादुर सिंह अस्सी वर्ष पूरे कर रहे हैं. 16 फरवरी 1940 को जन्में विजय बहादुर सिंह साहित्य की लोकतांत्रिकता में विश्वास करने वाले आलोचक हैं. उन्होंने अपनी आलोचना की शुरुआत नई कविता की आलोचना से की. ‘आधुनिकता और हिन्दी कविता’ शीर्षक उनका पहला लेख 1964-65 के आस- पास प्रकाशित हुआ. उन्होंने डॉक्टरेट छायावाद पर किया. धूमिल और राजकमल चौधरी पर लिखने के क्रम में वे भवानीप्रसाद मिश्र और नागार्जुन के संपर्क में आए और उसके बाद उनके ऊपर मार्क्स, लोहिया और गाँधी का व्यापक प्रभाव पड़ा. इस तरह विजयबहादुर सिंह की आलोचना दृष्टि के निर्माण में गाँधी, लोहिया और मार्क्स तीनों के दर्शनों का सम्मिलित प्रभाव है. उनके चिन्तन की जमीन भारतीय है. उन्होंने नागार्जुन और भवानीप्रसाद मिश्र को अपनी आलोचना के केन्द्र में रखकर एक ऐसी स्वाधीन आलोचना-दृष्टि विकसित की है जो शास्त्रीय जकड़बंदियों और वादग्रस्त संकीर्णताओं को न केवल झुठला सकी बल्कि उनकी साम्प्रदायिकताओं को भी उजागर करने में आगे रही. साहित्यालोचन में उनकी अंतर्दृष्टि निरंतर नवनिर्माणकारी सृजनशीलता पर र...

हिंदी के प्रथम सेनापति : महर्षि दयानंद सरस्वती

आर्यसमाज के अवदान को आज लोग भूल चुके हैं किन्तु एक समय में हिन्दू समाज को कुरीतियों, कुप्रथाओं, अंधविश्वासों और कुसंस्कारों से मुक्त करने में आर्यसमाज की अप्रतिम भूमिका थी। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज सुधारक और देशभक्त थे। किन्तु मैं यहाँ उन्हें हिन्दी के प्रथम प्रतिष्ठापक के रूप में स्मरण कर रहा हूँ। स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को काठियावाड़ ( गुजरात) क्षेत्र के ‘टंकारा’ नामक स्थान में हुआ था। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। वे समृद्ध परिवार के थे। उनका बचपन बड़े आराम से बीता। आगे चलकर पंडित बनने की लालसा में वे वेदादि ग्रंथों के अध्ययन में लग गए। इसी क्रम में सन् 1872 ई. में स्वामी जी कलकत्ता आए और यहां देवेन्द्रनाथ ठाकुर तथा केशवचंद्र सेन से उनकी मुलाकात हुई। यहाँ उनका बड़ा सम्मान हुआ। यद्यपि ब्राह्मसमाजियों पर उनका अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ा किन्तु कलकत्ते में ही केशवचंद्र सेन ने उन्हें सलाह दी कि यदि वे संस्कृत छोड़ कर आर्यभाषा (हिन्दी) में बोलना आरम्भ करें तो उसका व्यापक प्रभाव पूरे भारत पर और सामान्य जनता पर भी पड़...

आधुनिक हिन्दी की दिशा तय करने वाले योद्धा : राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द

राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’ ( जन्म 3 फरवरी 1823) को इतिहास में खलनायक की तरह चित्रित किया गया है, किन्तु, जिस समय देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी संकट काल से गुजर रही थी, राजा शिवप्रसाद उसके समर्थन और उत्थान का ब्रत लेकर साहित्य क्षेत्र में आए। उन्होंने हिन्दी, उर्दू, फारसी, संस्कृत, अंग्रेजी, बंगला आदि भाषाओं का गहरा अध्ययन किया था। बनारस में जन्म लेने वाले राजा शिवप्रसाद ने तृतीय सिख युद्ध में खुलकर अंग्रेजों का साथ दिया था और फिर सरकारी स्कूलों के इंस्पेक्टर हो गए। आरंभ से ही साहित्य में गहरी रुचि रखने वाले राजा शिवप्रसाद की प्रमुख पुस्तकें है- ‘मानवधर्मसार’, ‘योगवाशिष्ठ के कुछ चुने हुए श्लोक’, ‘उपनिषद् सार’, ‘भूगोलहस्तामलक’, ‘स्वयंबोध उर्दू’, ‘वामा मनरंजन’, ‘आलसियों का कोड़ा’, ‘विद्यांकुर’, ‘राजा भोज का सपना’, ‘वर्णमाला’, ‘हिन्दुस्तान के पुराने राजाओं का हाल’, ‘इतिहास तिमिर नासक’, ( भाग-1, 2, और 3 ), ‘सिखों का उदय और अस्त’, ‘गुटका’ ( भाग-1,2,3 ), ‘नया गुटका’ ( भाग-1,2 ), ‘हिन्दी व्याकरण’, ‘कुछ बयान अपनी जबान का’, ‘बालबोध’, ‘सैण्डफोर्ड और मारटन की कहानी’, ‘बच्चों का ईनाम’...