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Showing posts from December, 2018

लोक साहित्य : प्रतिरोध की चेतना ही उसकी समृद्धि है.

वस्तुत: किसी भी समाज में भाषा के तीन स्तर होते हैं, एक शासक वर्ग की भाषा जिसके माध्यम से मुख्यत: शासन संचालित होता है तथा जिसमें तथाकथित शिष्ट साहित्य का सृजन होता है, दूसरा स्तर जातीय भाषाओं का होता है और तीसरा जनपदीय भाषाओं और बोलियों का. ये स्तर भेद वैसे ही होते हैं जैसे समाज में वर्ग भेद. कहने के लिए समाज दो वर्गों में बँटा है -शोषक और शोषित. परन्तु इन दोनो वर्गों के बीच एक मध्य वर्ग भी होता है. इतिहास में इस मध्य वर्ग के चरित्र की बड़ी आलोचना की गई है- इसकी ढुलमुल नीति को लेकर. बहरहाल, सबसे निचले स्तर पर जनपदीय भाषाओं अथवा बोलियों में रचा गया साहित्य होता है जिसमें बहुसंख्यक समाज की भावनाएं अभिव्यक्त होतीं हैं. यह साहित्य ज्यादातर मौखिक होता है. इसे ही लोक साहित्य कहते हैं क्योंकि मौखिक परंपरा से संचित होने के कारण अमूमन इसके रचनाकारों के बारे में पता नही होता. यहां इस तथ्य का उल्लेख करना भी जरूरी है कि आज की बोलियां कही जाने वाली जनपदीय भाषाएं भी उतनी ही पुरानी हैं जितनी की कोई भी जातीय भाषा. धार्मिक कारणों से अथवा शासन का केन्द्र होने के कारण मिलने वाली अनुकूल प...

पूजा में बलि- प्रथा

पेशावर के एक विद्यालय मे घुसकर एक सौ बत्तीस स्कूली बच्चों की हत्या की खबर अब लोग भूल चुके हैं. लेकिन मेरे मन से वह दर्दनाक वाकया निकलता ही नहीं. मानवता के इतिहास में ऐसा जघन्य कृत्य मैने अपने जीवन में दूसरा नहीं देखा. इस घटना के बाद मेरे एक प्रिय की टिप्पणी थी- “ अब धर्म के लिए मेरे दिल में बची खुची आस्था भी खत्म हो गई. यह सब घर्म के नाम पर हुआ. कत्ल हुए बच्चों को वे शहीद कह रहे थे और उनकी दृष्टि मे उन बच्चों को भी जन्नत नसीब होगी.” आज से करीब तीस साल पहले जब मैं मार्क्सवाद का अध्ययन कर रहा था तब मेरे मन में भी धर्म के विषय में ऐसी ही धारणा बनी थी. मेरे एक वरिष्ठ मित्र ने एक किताब ही लिख दी है- ‘धर्म के नाम पर.’ इस किताब में उन्होंने दुनि या भर में धर्म के नाम पर जो रक्त बहाए गए हैं, क्रूरताएं और हत्याएं हुई हैं उनका लेखा जोखा दिया है. मगर विगत तीस साल का अनुभव मुझे अपनी सोच पर पुनर्विचार के लिए बाध्य कर रहा है. यह सही है कि धर्म के नाम पर जो रक्तपात हुए हैं उनका लेखा जोखा कठिन है. किन्तु, इसी का एक दूसरा पहलू यह है कि मानवता का अब तक का विकास धर्म की ही देन है. इसी धर्म प्रा...

दलित विमर्श के अंतर्विरोध

धरती के भीतर सदियों से जलने वाली आग जब कभी सतह को चीरकर बाहर आ जाती है तो वह ज्वालामुखी बन जाती है, उसमें से निकलने वाली आग, लावा आदि से दूर दूर तक पहाड़ तो बनता ही है वहां की जमीन लम्बे समय के लिए अनुर्वर बन जाती है. आस पास के मनुष्यों के लिए ही नही, जीव- जन्तुओं और यहां तक कि वनस्पतियों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा हो जाता है. दलित साहित्य की स्थिति भी ज्वालामुखी से फूटने वाली आग की तरह ही है. सदियों से दबाए और कुचले गए लोगों को जब वाणी नसीब हुई और उन्हें अपने अनुभवों को बयान करने का मौका मिला तो उनके साहित्य में उनका सदियों से दबा हुआ आक्रोश मुखरित हुआ. उनकी भाषा से शालीनता गायब होती गयी. आत्मालोचन उनकी प्रकृति का हिस्सा नहीं रह गया है, असहनशीलता उनकी सामान्य विशेषता है. आज कल हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श की चर्चा चरम पर है. दलित विमर्श के ज्यादातर रचनाकारों की मान्यता है कि दलित साहित्य उसे ही माना जाएगा जिसका लेखन दलित कुल में जन्म लेने वाले व्यक्ति ने किया हो, क्योंकि दलितों की उस पीड़ा को अनुभव करने वाला एक दलित ही हो सकता है. दलितों के सृजन में ही दलित जीवन के अनुभव का यथार...

राष्ट्रभाषा ‘हिन्दुस्तानी’ और महात्मा गाँधी ( जनसत्ता, 14 सितंबर 2018 )

आजादी के बहत्तर साल बीत गए. आज भी हमारे देश के पास न तो कोई राष्ट्रभाषा है और न कोई भाषा नीति. दर्जनों समृद्ध भाषाओं वाले इस देश में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक और न्याय व्यवस्था से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक सबकुछ पराई भाषा में होता है फिर भी उम्मीद की जाती है कि वह विश्व- गुरु बन जाएगा. भाषा समस्या का समाधान क्यों नहीं हुआ ? क्या यह आज भी विचारणीय मुद्दा नहीं है ? सरकार की ओर से तो किसी तरह की कोई पहल नहीं हो रही है. क्या इसके पीछे कोई ऐतिहासिक कारण भी है ? इस मुद्दे पर गाँधी जी का क्या दृष्टिकोण था और संविधान सभा में उसपर कितना अमल हुआ ? इन सवालों पर पुनर्विचार करना आज समय की माँग है. 12 से 14 सितंबर 1949 तक लगातार चलने वाली संविधान सभा की बहस के परिणाम स्वरूप धारा 343 वजूद में आया और भारत संघ की राजभाषा ‘देवनागरी लिपि’ में लिखी जाने वाली ‘हिन्दी’ तय की गई. यह बहस इस दृष्टि से भी अभूतपूर्व थी कि सदस्यों की इतनी बड़ी उपस्थिति अन्य किसी मुद्दे पर होने वाली बहसों में पहले कभी नहीं हुई थी और इस बहस में सबसे अहम मुद्दा था हिन्दुस्तानी और हिन्दी में से किसी एक को राजभाषा...

हिन्दी आन्दोलन के भटकाव ( मुक्तांचल, जुलाई-सितंबर,2018 में प्रकाशित )

हिन्दी में एक बहुत बड़ी संख्या ऐसे लेखकों की है जिन्होंने अपने लेखकीय जीवन का बड़ा हिस्सा हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा के लिए समर्पित कर दिया है. ऐसे लेखकों को हिन्दी के आलोचकों ने अपनी पाँत में नहीं रखा, दूसरी ओर तकनीकी दृष्टि से भाषाविज्ञान के क्षेत्र में न होने के कारण इनका लेखन भाषा विज्ञान के क्षेत्र में भी नहीं शामिल किया जाता. जबकि मेरी दृष्टि में साहित्य के आलोचकों की तुलना में इनका लेखन समाज के लिए अधिक मूल्यवान है. यदि भाषा ही नहीं बचेगी तो साहित्य भला कैसे बचेगा ? भाषा, संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण घटक होती है. किसी भी जाति की संस्कृति को मिटा दें तो वह जाति खत्म हो जाती है और उस जाति की संस्कृति को खत्म करने का सबसे सरल उपाय है उसकी भाषा को नष्ट करना. पराई भाषा को ओढ़ने- बिछाने वाली जाति अपना स्वाभिमान, अपनी जातीय अस्मिता सबकुछ स्वयं ही खो दती है. गुलाम मानसिकता उसका संस्कार बन जाता है. एक गुलाम व्यक्ति ही सोचता है कि यदि वह मालिक की जबान बोलेगा तो वह फायदे मे रहेगा. अपनी स्वाधीनता के लिए जब भी कोई जाति संघर्ष करती है तो प्रकारान्तर से वह अपनी भाषा और स...

हिन्दी आलोचना में विसंगतियाँ ( सामयिक सरस्वती, अक्टूबर-दिसंबर 2018 मे प्रकाशित)

हिन्दी आलोचना का इतिहास विसंगतियों से भरा हुआ है और हमारा हिन्दी समाज अब उसके दुष्परिणाम भी झेल रहा है किन्तु हमारे वरिष्ठ आलोचकों की नजर भी उन विसंगतियों की ओर नहीं पड़ रही है. हम उनमें से कुछ विसंगतियों की ओर पाठको का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करेंगे. एक सामान्य अवधारणा है कि हिन्दी आलोचना का विकास आधुनिक काल में गद्य के विकास के साथ हुआ. प्रश्न यह है कि हिन्दी में साहित्य का सृजन जब नवीं-दसवीं सदी से ही होने लगा था तो फिर आलोचना का विकास अठारहवीं सदी से क्यों? क्या हजार साल तक सिर्फ रचनाएं होती रहीं और उनपर प्रतिक्रयाएं नहीं होती थी? यदि रचना के साथ-साथ ही आलोचना का विकास भी होता है तो क्या हिन्दी साहित्य के आदि काल से आधुनिक काल के भारतेन्दु युग तक लोग सिर्फ रचनाएं पढ़ते और सुनते रहे हैं और उनपर प्रतिक्रियाएं देने से परहेज करते रहे हैं? भला ऐसा कैसे संभव है? दरअसल आलोचना का विकास रचना के साथ ही होता है. रचना पर संतुलित प्रतिक्रिया ही आलोचना होती है. इसलिए जिस समय से हम हिन्दी साहित्य के सृजन का इतिहास स्वीकार करते हैं उसी समय से उसकी आलोचना का इतिहास भी स्वीकार करना ...