लोक साहित्य : प्रतिरोध की चेतना ही उसकी समृद्धि है.
वस्तुत: किसी भी समाज में भाषा के तीन स्तर होते हैं, एक शासक वर्ग की भाषा जिसके माध्यम से मुख्यत: शासन संचालित होता है तथा जिसमें तथाकथित शिष्ट साहित्य का सृजन होता है, दूसरा स्तर जातीय भाषाओं का होता है और तीसरा जनपदीय भाषाओं और बोलियों का. ये स्तर भेद वैसे ही होते हैं जैसे समाज में वर्ग भेद. कहने के लिए समाज दो वर्गों में बँटा है -शोषक और शोषित. परन्तु इन दोनो वर्गों के बीच एक मध्य वर्ग भी होता है. इतिहास में इस मध्य वर्ग के चरित्र की बड़ी आलोचना की गई है- इसकी ढुलमुल नीति को लेकर. बहरहाल, सबसे निचले स्तर पर जनपदीय भाषाओं अथवा बोलियों में रचा गया साहित्य होता है जिसमें बहुसंख्यक समाज की भावनाएं अभिव्यक्त होतीं हैं. यह साहित्य ज्यादातर मौखिक होता है. इसे ही लोक साहित्य कहते हैं क्योंकि मौखिक परंपरा से संचित होने के कारण अमूमन इसके रचनाकारों के बारे में पता नही होता. यहां इस तथ्य का उल्लेख करना भी जरूरी है कि आज की बोलियां कही जाने वाली जनपदीय भाषाएं भी उतनी ही पुरानी हैं जितनी की कोई भी जातीय भाषा. धार्मिक कारणों से अथवा शासन का केन्द्र होने के कारण मिलने वाली अनुकूल प...