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Showing posts from May, 2020

हिन्दी के प्रथम आचार्य : महावीरप्रसाद द्विवेदी ( जनसंदेश टाईम्स में15 मई को प्रकाशित )

हिन्दी साहित्य के इतिहास में हिन्दी नवजागरण का तीसरा चरण ‘द्विवेदी युग’ के नाम से जाना जाता है. ‘साहित्य को ज्ञानराशि का संचित कोश’ कहने वाले आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ( जन्म- 15.5.1864 ) का जन्म उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर नामक गाँव में हुआ था. उन्होंने साहित्य की सेवा के लिए दो सौ रूपए महीने की रेलवे की सरकारी नौकरी छोड़कर तेईस रूपए महीने पर ‘सरस्वती’ के संपादन का दायित्व संभाला था. वे एक साथ कवि, निबंधकार, अनुवादक, संपादक और आलोचक हैं, किन्तु उन्होंने ‘सरस्वती’ के माध्यम से भाषा परिष्कार का जो महान कार्य किया वह अतुलनीय है. द्विवेदी जी संस्कृत के पण्डित तो थे ही, उन्होंने अंग्रेजी, बंगला, मराठी, गुजराती साहित्य का भी गंभीर अध्ययन किया था. साहित्य के अलावा इतिहास, पुरातत्व, अर्थशास्त्र, सामाजिक विज्ञान आदि में भी उनकी गहरी पैठ थी. उन्होंने ‘बेकन विचार रत्नावली’, ‘शिक्षा’, और ‘स्वाधीनता’ के नाम से क्रमश: बेकन के निबंधों, हर्वर्ट स्पेंसर की पुस्तक ‘एज्यूकेशन’ और जॉन स्टुअर्ट मिल की पुस्तक ‘आन लिबर्टी’ का हिन्दी में अनुवाद किया है. इन सबके अध्ययन से उनकी एक स्वस्थ वैज्ञ...

मार्क्सवादी आलोचक अजय तिवारी ( 6 मई 2020 को फेसबुक पर )

हिन्दी के समकालीन मार्क्सवादी आलोचकों में अजय तिवारी (जन्म 6.5.1955) का प्रमुख स्थान है. उनकी तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टि, विश्लेषण क्षमता और अपने समाज व इतिहास का व्यापक अध्ययन किसी भी रचना के मूल्यांकन में गलती नहीं करने देता. ‘प्रगतिशील कविता के सौन्दर्य मूल्य’, ‘कुलीनतावाद और समकालीन कविता’, ‘साहित्य का वर्तमान’, ‘पश्चिम का काव्य-विचार’, ‘आलोचना और संस्कृति’, ‘नागार्जुन की कविता’, ‘हिन्दी कविता : आधी शताब्दी’, ‘जनवादी समस्या और साहित्य’, ‘आधुनिकता पर पुनर्विचार : शिल्प और समाज’, ‘राजनीति और संस्कृति- व्यवस्था का आत्मसंघर्ष’, ‘ ‘विवेकानंद का क्रान्तिकारी वेदान्त‘ आदि उनकी प्रमुख आलोचना पुस्तकें हैं. अजय तिवारी की आलोचना के केन्द्र में नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवि हैं. वे अपने समय और समाज के विश्लेषण में धोखा नहीं खाते. इतिहास और समाज के वे गंभीर अध्येता हैं. साहित्य के किसी विषय, विधा या साहित्यकार पर बात करने से पहले वे उसकी ऐतिहासिक परिस्थितियों तथा राजनीतिक अवधारणाओं की जाँच परख जरूर करते हैं. नई कविता के बहाने आज के भारतीय समाज और राजनीतिक परिस्थितियों का जब वे विश्ल...

हिन्दी के आलोचक- प्रो. विष्णुकान्त शास्त्री ( जनसंदेश टाईम्स,17.4.20 को प्रकाशित)

राजनीति, साहित्य और समाज-सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने वाले प्रो. विष्णुकान्त शास्त्री (2.5.1929 - 17.4.2005 ) की ख्याति एक कुशल वक्ता और आदर्श शिक्षक की भी है. वे भक्ति साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं. ‘कवि निराला की वेदना तथा अन्य निबंध’, ‘तुलसी के हिय हेरि’, ‘अनंत पथ के यात्री : धर्मवीर भारती’, ‘अनुचिन्तन’, ‘कुछ चंदन की कुछ कपूर की’, ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य के कुछ विशिष्ट पक्ष’, ‘भक्ति और शरणागति’ आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक कृतियां हैं. उनकी कृतियों का संग्रह ‘विष्णुकान्त शास्त्री : चुनी हुई रचनाएं’( 2 खंड ) प्रकाशित है जिसके प्रथम खण्ड में आलोचनात्मक निबंध हैं. इसमें क्रमश: कालिदास, कबीर, सूर, तुलसी, भारतेन्दु, प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, दिनकर और सर्वेश्वर का मूल्यांकन किया गया है. चार निबंधों का विवेच्य विषय है- काव्य का वाचिक संप्रेषण, आधुनिक हिन्दी कविता और छंद, गीत और नवगीत तथा बांग्लादेश की संग्रामी कविता. कबीर और तुलसी की तुलना करते हुए उन्होंने जो लिखा हैं उससे उनकी दक्षिणपंथी वैचारिक दृढ़ता का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है, “मैं यह तो मानता हूं कि प्राचीन कवियों ...

अनुसंधानपरक आलोचना के आदर्श पं. चंद्रबली पाण्डेय ( फेसबुक पर 25 अप्रैल 2020 को)

हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले आजीवन ब्रह्मचारी रहे पं.चंद्रबली पाण्डेय ( जन्म 25.4.1904 ) अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, अरबी, संस्कृत और प्राकृत के विद्वान थे। एम.ए. उन्होंने हिन्दी में किया था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के वे सर्वाधिक प्रिय शिष्यों में से थे। अभावों से दोस्ती और महत्वाकांक्षाओं से दुश्मनी करने वाला संत स्वभाव का यह आलोचक किसी विश्वविद्यालय में शिक्षक भी नहीं बना जिससे इनके पास यश-विस्तारक शिष्यों की भी कोई परंपरा नहीं थी। इन्होंने अपना सारा जीवन अध्ययन और अनुसंधान में लगा दिया। वे किसान-पुत्र थे और एक स्वाभिमानी किसान की अक्खड़ता उनमें आजीवन विद्यमान रही। पं. चंद्रबली पाण्डेय की छोटी –बड़ी लगभग 34 पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें तीन अंग्रेजी में हैं। उनकी आलोचनात्मक पुस्तकों में ‘तसव्वुफ अथवा सूफीमत’, ‘उर्दू का रहस्य’, ‘भाषा का प्रश्न’, ‘राष्ट्रभाषा पर विचार’, ‘कालिदास’, ‘केशवदास’, ‘तुलसीदास’, ‘हिन्दी कवि चर्चा’, ‘हिन्दी गद्य का निर्माण’ आदि प्रमुख हैं। संस्कृत के कालिदास और हिन्दी के तुलसीदास उनके सर्वाधिक प्रिय कवियों में से हैं। ‘तसव्वुफ अथ...

हिन्दी में शोध का धंधा ( देसहरियाना, वैश्विक हिन्दी सम्मेलन, शाश्वत सृजन, न्यूज ट्रैक आदि में प्रकाशित )

शोध की उपाधि को नौकरी से जोड़ना आधुनिक भारत की एक दुर्घटना है. आज का हमारा समय सांस्थानिक अनुसंधान के चरम पतन का दौर है. इस दौर की शुरुआत 1 जनवरी 1986 से हुई जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने विश्वविद्यालय के शिक्षकों के लिए नए वेतनमान की घोषणा की और उसी के साथ पी-एच.डी. उपाधिधारी शिक्षकों को तीन अतिरिक्त वेतनवृद्धि की अनुशंसा की. इस तरह पी-एच.डी की उपाधि को पहले वेतनवृद्धि से और बाद में नौकरियों तथा शिक्षकों की पदोन्नति से जोड़कर यूजीसी ने शोधकार्य को महत्व देने का प्रयास तो किया किन्तु उसकी गुणवत्ता बनाए रखने के लिए समुचित दिशा-निर्देश नहीं दिया जिसके दुष्परिणाम कुछ दिनो बाद ही दिखायी देने लगे. शोधार्थी को आज किसी भी तरह पी-एच.डी. की उपाधि चाहिए क्योंकि बिना उसके नौकरी मिलनी कठिन है और शोध-निर्देशक को भी अपने प्रमोशन में अधिक से अधिक शोध-प्रबंधों के निर्देशन का अनुभव चाहिए. इस तरह शोधार्थी और शोध-निर्देशक दोनो का लक्ष्य जल्दी से जल्दी शोध की उपाधि प्राप्त करना है. शोध की गुणवत्ता उनकी प्राथमिकता नहीं है. इसीलिए आज दोनों ने ही श्रम से पल्ला झाड़ लिया है. दोनों में जैसे गुप्त समझौता हो...