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हिन्दी आलोचना के डिक्टेटर नामवर सिंह

हिन्दी आलोचना के डिक्टेटर नामवर सिंह. नामवर सिंह असाधारण प्रतिभा संपन्न आलोचक हैं. असाधारण इसलिए कि उनकी पुस्तक ‘बकलम खुद’ 1951 में छपी जब वे सिर्फ 24 साल के थे. ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’ 1952 में छपी जब वे 25 साल के थे, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ 1954 में छपी जब वे 27 साल के थे और उनकी बहुचर्चित पुस्तक ‘छायावाद’ 1955 में छपी जब उनकी उम्र मात्र 28 वर्ष की थी. बतौर काशीनाथ सिंह उन्होंने ‘छायावाद’ पुस्तक मात्र ग्यारह दिनों में लिखकर पूरी की थी. इसी तरह उन्होंने ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ अट्ठारह दिनों में और ‘दूसरी परंपरा की खोज’ भी दस –बारह दिनों में ही लिखी थी. जीयनपुर के गंवई परिवेश से काशी में आकर और भयंकर आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए इतनी कम उम्र में ऐसी ऐतिहासिक कृतियों का लेखन सामान्य प्रतिभा के बश की बात नहीं है. नामवर सिंह ने ‘छायावाद’ नामक पुस्तक लिखकर हमें छायावाद की विशेषताओं से परिचित कराया और उसके सकारात्मक मूल्यों को रेखांकित किया. अपनी उक्त पुस्तक में उन्होंने छायावाद की सामान्य प्रवृतियोंका विश्लेषण किया और छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों- प्रसाद, निराल...