हिन्दी में गांधीवादी आलोचना क्यों नहीं ? ( 2 फरवरी 2020 को जनसत्ता में )

हिन्दी आलोचना पर केन्द्रित जितनी भी पुस्तकें आजतक लिखी गई हैं, उनमें मार्क्सवादी, मनोविश्लेषणवादी आदि विदेशी दर्शनों से परिचालित आलोचना पद्धतियों की चर्चा तो विस्तार से की गई है किन्तु गाँधीवादी आलोचना पद्धति का कोई उल्लेख नहीं मिलता है, जबकि साहित्य की सभी विधाओं पर महात्मा गाँधी का गहरा प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है. हिन्दी के कवियों ने तो उन्हें ‘दिव्यात्मा’ और ‘युगावतार’ तक कहा है। उनके व्यक्तित्व पर असंख्य कविताएँ लिखी ही गईं है, कई महाकाव्य लिखे गए हैं. गोपालशरण सिंह ने बीस सर्गों का ‘जगदालोक’ नामक महाकाव्य, ठाकुरप्रसाद सिंह ने ‘मृत्युंजय’ तथा नटवरलाल स्नेही ने ‘गाँधीचरितमानस’ लिखा। भवानीप्रसाद मिश्र ने ‘गाँधी पंचशती’ और सोहनलाल द्विवेदी ने ‘गाँधी शतदल’ लिखा। सियारामशरण गुप्त ने ‘बापू’ लिखा जिसमें उन्हें ‘कालातीत’, ‘आत्मालोक’, ‘कालजयी’ आदि कहकर संबोधित किया। सुमित्रानंदन पंत ने अपने ‘लोकायतन’ में उन्हें इष्टदेव के रूप में देखा और लिखा कि “देखा न चरित्र धरा ने तुमसा समग्र संयोजित”। सोहनलाल द्विवेदी ने लिखा, “तुम बोल उठे, युग बोल उठा / तुम मौन बने युग मौन बना।” सुकवि ज्योतिषी ने लिखा, “कौन तुम युग देवता साकार”। मैथिलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा’‘और ‘साकेत’‘में गांधीवादी विचारों की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है। सियारामशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी और बच्चन जैसे कवियों के साहित्य में भी गांधी के व्यक्तित्व और उनके दर्शन का ब्यापक प्रभाव दिखाई देता है। प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों में सत्याग्रह, ह्रदय-परिवर्तन, स्वाधीनता-संगाम में सत्य-अहिंसा के शस्त्रों का प्रयोग, आश्रमों की स्थापना द्वारा सुधार आदि गांधीवाद के अनेक पक्ष अभिव्यक्त हुए है। ’प्रेमाश्रम’, ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’, ‘गबन’ जैसे‘उपन्यासों तथा ‘नमक का दारोगा’, ’समरयात्रा’‘एवं अन्य कहानियों में गांधीवाद का व्यवहारपक्ष ब्यापक रूप से उभरकर आया है। विश्वंभरनाथ शर्मा “कौशिक’, सुदर्शन, भगवतीचरण वर्मा एवं जैनेंद्र आदि ऐसे कथाकार हैं जिनके साहित्य में गांधी-दर्शन की अनेकश: और विभिन्न रूपों में अभिव्यक्ति हुई है। ऐसी दशा में भला आलोचना उनके प्रभाव से वंचित कैसे रह सकती है ? डॉ. मैनेजर पाण्डेय के अनुसार, “ गाँधी जी लेखकों को लोक जीवन से जुड़ने, समाज के दबे- कुचले लोगों के बारे में सोचने, उपनिवेशवाद की दिमागी गुलामी से मुक्त होने, अपनी परंपरा की शक्ति को पहचानने, भारतीय समाज के रूढिवाद को जानने और जीवन के सभी प्रसंगों में साहसी आलोचनात्मक चेतना विकसित करने का जो आह्वान किया था, उसका व्यापक प्रभाव हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य पर है. “ ( गाँधी विचार और साहित्य, सुमन जैन, पृष्ठ-459)‘ मैंने उस दौर के आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, शान्तिप्रिय द्विवेदी, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, रामस्वरूप चतुर्वेदी, नगेन्द्र, विजयदेवनारायण साही तथा आज के बिजयबहादुर सिंह, विश्वनाथप्रसाद तिवारी, कृष्णदत्त पालीवाल, श्रीभगवान सिंह, गोपेश्वर सिंह जैसे प्रतिष्ठित आलोचकों के आलोचना साहित्य का अनुशीलन किया है और पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इनके आलोचना कर्म पर गाँधी का ब्यापक प्रभाव है। गाँधी जी को ‘महात्मा’ कहा गया और आजादी के बाद ‘राष्ट्रपिता’। गाँधी का जीवनदर्शन इस देश की पूरी एक पीढ़ी का संस्कार बन गया। लाखों गाँधी के अनुयायी बने। स्वचंछंदतावादी कहे जाने वाले आलोचक आचार्य नंददुलारे वाजपेयी जब मार्क्सवाद से टकराते हैं तब सीधे- सीधे उसके समानान्तर गाँधी के विचार-दर्शन का हवाला देने लगते हैं। वे कहते है, “ आज के जनवादी लेखक को व्यक्तिगत त्याग और कष्ट सहिष्णुता अपनानी होगी। उसे प्रेमचंद और टॉलस्टाय के मार्ग पर चलना होगा। वह किसी मार्क्सवादी नुस्खे को लेकर काम नहीं कर सकता। उसे अब भी चरित्र और आचरण की आवश्यकता है। महान आदर्शों के पीछे जीवन के क्षुद्र स्वार्थों को मिटा देने की साधना करनी होगी। हम जिस जनवादी राष्ट्र या मानव समूह की कल्पना करते हैं, वह केवल आर्थिक दृष्टि से सुखी नहीं होगा, उसे पूर्णत: सांस्कृतिक और नैतिक मानव भी होना चाहिए। यहाँ भी मार्क्सवादी शिक्षाएं और उपचार मुझे तो अधूरे दिखाई देते है। उनसे तो गाँधी जी का सर्वोदय सिद्धान्त मुझे भारतीय जीवन के अधिक अनुरूप जान पड़ता है।” ( नया साहित्य : नये प्रश्न, पृष्ठ- 230) इसी तरह महात्मा गाँधी के निधन के बाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा, “ वह जिधर मुड़ा जीवन लहरा उठा, वह जिधर झुका, प्रेम बरस पड़ा, वह जिधर चला, जमाना ढरक पड़ा। वह शक्ति का भंडार था, क्योंकि वह सच्चे अर्थ में भक्त था।”( ग्रंथावली, खंड-9, पृष्ठ-403) आचार्य द्विवेदी ने सच्चे मन से महात्मा गाँधी के चरित्र का अनुसरण करना चाहा था, किन्तु वह संभव नहीं हो सका। उन्होंने स्वीकार किया है, “ मैने महात्मा जी के अनेक गुणों को अपने भीतर ले जाने का संकल्प कई बार किया है। संकल्पों की सच्चाई में मुझे रत्ती भर भी संदेह नहीं है।” ( ग्रंथावली, खंड-9, पृष्ठ- 408) उन्होंने लिखा है, “महात्मा गाँधी के सिवा और कोई दूसरा नेता नहीं है जिसने देश में आत्म-गरिमा का संचार किया हो।” ( ग्रंथावली, खंड-9, पृष्ठ- 271) महात्मा गाँधी के जीवन से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने कहा है, “ महात्मा जी ने केवल वाणी से नहीं, अपने संपूर्ण जीवन से यह दिखा दिया है कि मनुष्य के छोटे स्वार्थों का द्वंद्व बड़े सत्य का विरोधी नही है। इन छोटे स्वार्थों को व्याप्त करके अपना अंग बनाकर ही हृदयस्थित महा सत्य विराज रहा है। इनके भीतर से वह सेतु तैयार किया जा सकता है जो मनुष्य को मनुष्य से विच्छिन्न होने से बचाए।” ( ग्रंथावली, खंड-9, पृष्ठ- 412) ये चंद उद्धरण काफी हैं गाँधी के व्यापक प्रभाव को समझने के लिए। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने पूरे विश्वास के साथ घोषित किया था कि मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है. जनपक्षधरता द्विवेदी जी के समस्त सृजन के मूल में है. उन्होंने लिखा है, “ मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ. जो वाग्जाल मनुष्य की दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है.” ( ग्रंथावली, खंड-10, पृष्ठ-24) मानवतावाद संबंधी अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं, “ मानवतावाद ठीक है, पर मुक्ति किसकी ? क्या व्यक्ति –मानव की ? सामाजिक मानवतावाद ही उत्तम समाधान है. मनुष्य को, व्यक्ति मनुष्य को नहीं, बल्कि समष्टि –मनुष्य को, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शोषण से मुक्त करना होगा – नान्य: पन्था विद्यते अयनाय.” ( ग्रंथावली, खंड-10, पृष्ठ-8) क्या गाँधीवाद का लक्ष्य इससे कुछ अलग है ? डॉ नगेन्द्र ने तो अपने स्फुट निबंधों में प्राय: उन्हीं कवियों की समीक्षा की है जो गाँधीवाद से प्रभावित हैं। सुमित्रानंदन पंत, सियारामशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंशराय बच्चन, नरेन्द्र शर्मा, रामेश्वर शुक्ल अंचल, गिरिजाकुमार माथुर आदि की समीक्षाएं इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं। इसी तरह ‘साकेत’ के सांस्कृतिक आधार का विवेचन करते हुए उन्होंने ‘धार्मिक’, ‘सामाजिक –राजनीतिक आदर्श’, ‘भौतिक जीवन’ के साथ ही ‘गाँधीवाद का प्रभाव’ की चर्चा की है. “ ( साकेत एक अध्ययन, पृष्ठ- 90) इसी तरह रामस्वरूप चतुर्वेदी ने अपने अन्तिम दिनों में ‘माध्यम’ ( अक्टूबर-दिसंबर,2003 ) के अंक में ‘हिन्द स्वराज’ और ‘कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो’ : 21वी शती में पर्यालोचन’ शीर्षक से एक विस्तृत तुलनात्मक लेख लिखा था. इस लेख को समाप्त करते हुए उन्होंने लिखा है, “ यंत्र ने जन- जन को जीवन यापन की जितनी सुविधाएं सुलभ करायी हैं, उससे कुछ अधिक ही उनके हाथ में मारक –क्षमता भी दे दी है, जिसका चरम बिन्दु 11 सितंबर 2001 को न्यूयार्क –वाशिंगटन में आतंकवादी आक्रमण के समय, यंत्र के ही सौजन्य से –सीधे टेलीविजन प्रसारण में समूचे संसार ने दया और भय –यूनानी ट्रेजेडी के कारक द्वय – की मुद्रा में स्तब्ध होकर देखा. दया उन निर्दोष व्यक्तियों के लिए जो उन सौमंजिला इमारतों में बंद मौत की घड़ियां असहाय होकर गिन रहे थे, और भय अपने लिए कि कहीं ऐसी परिस्थिति में हमें न फँसना पड़े. यहीं यंत्र के परावर्तन और ‘हिन्द स्वराज’ की चरितार्थता की संभावना निहित है.” ( ‘माध्यम’, अक्टूबर-दिसंबर, 2003) इस तरह इस काल के अनेक आलोचकों पर महात्मा गाँधी के व्यापक प्रभाव को देखा जा सकता है. आलोचकों की इस परंपरा में आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, विजयदेवनारायण साही, डॉ. नगेन्द्र, रामस्वरूप चतुर्वेदी, परशुराम चतुर्वेदी, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी आदि तो शामिल हैं ही, रघुवंश, विजयबहादुर सिंह, शंभुनाथ और गोपेशवर सिंह जैसे आलोचकों को भी रखा जा सकता है यद्यपि इनपर गाँधी की तुलना में डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्रदेव आदि का प्रभाव अधिक दिखाई देता है. इसका कारण यह है कि मुझे बराबर लगता है कि लोहिया का दर्शन गांधी के दर्शन की ही अगली कड़ी है या उसी से नाभिनाल बद्ध है. दोनो का आदर्श राम- राज्य एक ही है जिसे तुलसी ने मानस में सृजित किया है. एक ऐसा राज्य जिसमें अमीर और गरीब के बीच कम से कम अन्तर हो, जहाँ ऊंच नीच के भेद न हों, जहाँ गाँव और शहर के बीच दूरी कम हो, जहाँ बेतहासा मशीनीकरण नहीं, ग्रामीण उद्योगों का विकास हो, शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी नहीं, मातृभाषाएं हों. हाँ, गाँधी की जीवन शैली कठिन थी, गाँधी ब्रह्मचर्य में विश्वास करते थे, इसीलिए गाँधी को महात्मा कहा जाता था। गाँधी की इस जीवन शैली को अपने जीवन में उतार पाना लोहियावादियों के लिए कठिन था. धर्म में, प्रार्थना में गाँधी की गहरी आस्था थी जबकि लोहियावादियों में इस तरह की आस्था के प्रति उदासीनता दिखाई देती है। इन थोड़े से भेदों के अलावा गाँधी और लोहिया के दर्शन में गहरी समानता है। यदि गाँधी न होते तो लोहिया भी न होते। वैसे भी लोग विनोबा भावे को मठी गाँधीवादी, नेहरू को सरकारी गाँधीवादी और लोहिया को कुजात गाँधीवादी कहते हैं। ऐसी दशा में लोहियावादियों को भी गाँधीवादी आलोचकों की श्रेणी में रखना सर्वथा उचित है। हाँ, इस बात का उल्लेख मैं यहाँ जरूर करना चाहूँगा कि साधन की पवित्रता पर गाँधी जी का जितना जोर था वह लोहियावादियों के लिए कभी संभव नहीं था। शायद यही कारण है कि बाद में लोहियावादियों का नैतिक पतन बहुत हुआ और आज भी हो रहा है। और अंत में मेरा प्रस्ताव है कि हिन्दी आलोचना के इतिहास में जहाँ मार्क्सवादी, मनोविश्लेषणवादी, स्वच्छंदतावादी, प्रभाववादी आदि आलोचना पद्धतियों की चर्चा बार- बार की गई है वहीं हिन्दी साहित्य को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले सदी के महानतम महापुरुष महात्मा गाँधी के प्रभाव वाली गाँधीवादी आलोचना की भी एक श्रेणी होनी चाहिए।

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