‘गाँधीवादी आलोचक’ आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ( अभिदेशक, सुल्तानपुर मे प्रकाशनार्थ प्रेषित )

शीर्षक में मैंने गाँधीवादी आलोचक शब्द को इनवर्टेड कामा में रखा है क्योंकि हिन्दी में गाँधीवादी आलोचना की किसी परंपरा का जिक्र नहीं मिलता. यह मुद्दा हमें नए सिरे से अध्ययन की चुनौती देता है. भारतीय राजनीति के रंगमंच पर महात्मा गाँधी का पदार्पण और हिन्दी साहित्य के मंच पर छायावाद का पदार्पण लगभग एक साथ होता है. अकारण नहीं है कि साहित्य की सभी विधाओं पर गाँधीजी का गहरा प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है. हिन्दी के कवियों ने उन्हें ‘दिव्यात्मा’ और ‘युगावतार’ तक कहा है. उनके व्यक्तित्व पर असंख्य कविताएँ लिखी ही गईं है, कई महाकाव्य लिखे गए हैं. गोपालशरण सिंह ने बीस सर्गों का ‘जगदालोक’ नामक महाकाव्य, ठाकुरप्रसाद सिंह ने ‘मृत्युंजय’ तथा नटवरलाल स्नेही ने ‘गाँधीचरितमानस’ लिखा. भवानीप्रसाद मिश्र ने ‘गाँधी पंचशती’ और सोहनलाल द्विवेदी ने ‘गाँधी शतदल’ लिखा। सियारामशरण गुप्त ने ‘बापू’ लिखा जिसमें उन्हें ‘कालातीत’, ‘आत्मालोक’, ‘कालजयी’ आदि कहकर संबोधित किया. सुमित्रानंदन पंत ने अपने ‘लोकायतन’ में उन्हें इष्टदेव के रूप में देखा और लिखा कि “देखा न चरित्र धरा ने तुमसा समग्र संयोजित”. सोहनलाल द्विवेदी ने लिखा, “तुम बोल उठे, युग बोल उठा / तुम मौन बने युग मौन बना.” सुकवि ज्योतिषी ने लिखा, “कौन तुम युग देवता साकार”. मैथिलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा’‘और ‘साकेत’‘में गांधीवादी विचारों की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है. सियारामशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी और बच्चन जैसे कवियों के साहित्य में भी गांधी के व्यक्तित्व और उनके दर्शन का ब्यापक प्रभाव दिखाई देता है. प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों में सत्याग्रह, ह्रदय-परिवर्तन, स्वाधीनता-संगाम में सत्य-अहिंसा के शस्त्रों का प्रयोग, आश्रमों की स्थापना द्वारा सुधार आदि गांधीवाद के अनेक पक्ष अभिव्यक्त हुए है. ’प्रेमाश्रम’, ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’, ‘गबन’ जैसे‘उपन्यासों तथा ‘नमक का दारोगा’, ’समरयात्रा’‘एवं अन्य कहानियों में गांधीवाद का व्यवहारपक्ष ब्यापक रूप से उभरकर आया है. विश्वंभरनाथ शर्मा “कौशिक’, सुदर्शन, भगवतीचरण वर्मा एवं जैनेंद्र आदि ऐसे कथाकार हैं जिनके साहित्य में गांधी-दर्शन की अनेकश: और विभिन्न रूपों में अभिव्यक्ति हुई है. जब साहित्य की अन्य विधाओं पर गाँधीजी गहरा प्रभाव दिखाई देता है तो भला आलोचना उनके प्रभाव से वंचित कैसे रह सकती है ? क्या गांधी से प्रभावित साहित्य की समीक्षा के लिए भी गांधीवादी मूल्यों की जरूरत नहीं होगी ? हमें यह देखकर आश्चर्य होता है कि हिन्दी आलोचना जगत में मार्क्सवादी, मनोविश्लेषणवादी आदि विदेशी दर्शनों से परिचालित आलोचना पद्धतियों की चर्चा तो विस्तार से की गई है किन्तु गाँधीवादी आलोचना पद्धति का कोई उल्लेख नहीं मिलता है, जबकि इसी दौर के आचार्य नंददुलारे वाजपेयी सहित शान्तिप्रिय द्विवेदी, रामस्वरूप चतुर्वेदी, नगेन्द्र, विजयदेवनारायण साही, और आज के विजय बहादुर सिंह, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कृष्णदत्त पालीवाल, श्रीभगवान सिंह, गोपेश्वर सिंह जैसे प्रतिष्ठित आलोचकों पर गाँधी का ब्यापक प्रभाव दिखाई देता है. प्रख्यात मार्क्सवादी आलोचक मैनेजर पाण्डेय ने भी स्वीकार किया है कि, “ गाँधी जी लेखकों को लोक जीवन से जुड़ने, समाज के दबे- कुचले लोगों के बारे में सोचने, उपनिवेशवाद की दिमागी गुलामी से मुक्त होने, अपनी परंपरा की शक्ति को पहचानने, भारतीय समाज के रूढिवाद को जानने और जीवन के सभी प्रसंगों में साहसी आलोचनात्मक चेतना विकसित करने का जो आह्वान किया था, उसका व्यापक प्रभाव हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य पर है. “ ( गाँधी विचार और साहित्य, सुमन जैन, पृष्ठ-459)‘ यहाँ मैं छायावाद के सर्वाधिक प्रतिष्ठित आलोचक आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ( 1906-1967 ) के समीक्षा- कर्म तक ही अपने को सीमित रखूँगा और मेरी स्पष्ट मान्यता है कि आचार्य वाजपेयी की समीक्षा- दृष्टि के निर्माण में गांधीवादी मूल्यों की प्रमुख भूमिका रही है. छायावादी काव्य के भीतर की जो स्वच्छंदता है उसके पीछे सिर्फ पश्चिम के रोमैंटिसिज्म का प्रभाव भर नहीं है अपितु उसमें भारत के मुक्ति- आन्दोलन की भी गूँज है जिसका नेतृत्व निर्विवाद रूप से गांधीजी कर रहे थे. सन् 1930 ई. से नंददुलारे वाजपेयी ने इलाहाबाद से निकलने वाली पत्रिका ‘भारत’ का संपादन शुरू किया. उस समय उनकी उम्र महज चौबीस वर्ष थी. तबसे 1967 ई. तक वे निरंतर आलोचना-कर्म में रत रहे. इसी बीच देश में आजादी की लड़ाई लड़ी गई, भगतसिंह की शहादत हुई, द्वितीय विश्वयुद्द हुआ, देश भर में साम्प्रदायिक दंगे हुए, देश को आजादी मिली, हमारा अपना संविधान लागू हुआ. इस बीच हिन्दू राष्ट्रवाद के समर्थकों, सशस्त्र क्रान्ति में विश्वास करने वाले हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएसन के युवा नेताओं तथा वामपंथियों द्वारा गाँधी के नेतृत्व का निरंतर विरोध होता रहा किन्तु गाँधी जी अपने पथ से कभी भी विचलित नहीं हुए. चौबीस वर्ष के युवा के भीतर आमतौर पर उग्र विचार देखे जाते हैं किन्तु सन् 1930 से ही वाजपेयी जी ने गाँधी के विचारों और उनके आन्दोलन के तरीकों का समर्थन करते हुए जिस निष्ठा के साथ लिखा उससे प्रमाणित होता है कि उनके विचार और व्यक्तित्व पर गाँधी का जो प्रभाव आरंभ में पड़ा वह अन्त तक बना रहा. 17 नवंबर 1930 ई. को उन्होंने गाँधी के सत्याग्रह और असहयोग पर ‘भारत’ में लिखा, “ आज जिस सत्याग्रह और असहयोग की गतिविधि की ओर दुनिया की आँखें लगी हुई हैं, बड़े- बड़े महापुरुष जिन्हें संसार के इतिहास में नवयुग की सृष्टि करने वाले कहते हैं, मिस्र और फिलिस्तीन जैसे प्राचीन महान देश जिसका चमत्कार देखकर अनुसरण करने में अपना परम हित मानते हैं, उन महान आदर्शों की व्याख्या करने में हम अपने को असमर्थ पाते हैं........ यदि हम आदर्शों को छोड़कर वस्तुस्थिति की ओर ध्यान दें और पिछले छच -सात महीनों के इतिहास को देखें, तो संभव है हम आगे चलकर सत्याग्रह और सहयोग को समझ सकें.” ( नंददुलारे वाजपेयी रचनावली, सं. विजय बहादुर सिंह, खंड-7, पृष्ठ-96) इसी तरह 23 फरवरी 1931 ई. के ‘भारत’ में उन्होंने लिखा, “महात्मा जी जिस अहिंसा का प्रचार करते हैं, वह बड़ा ऊंचा आदर्श है. सत्य और अहिंसा के मार्ग में महात्मा जी इतने आगे बढ़ गए हैं कि उनके देशवासी पीछे छूटते जाते हैं. महात्मा जी की साधना बड़ी सच्ची है. वे इस युग के श्रेष्ठ योगी और महापुरुष हैं. पर उनकी महत्ता योगी होने के कारण नहीं है. कम से कम वे इतिहास में तो एक योगी होने की हैसियत से इतना स्मरण नहीं किए जाएंगे, जितना एक लोकनेता होने की हैसियत से किए जाएंगे. महात्मा जी ने लोकवाद पर बहुत जोर दिया है और वे समूह के सच्चे प्रेमी और अधिनायक हैं. उनक चरखा, कला संबंधी विचार, उनके भाषण इस बात के प्रमाण हैं कि वे व्यक्तिगत साधना को लोकहित के बराबर महत्व नहीं देते.” और ‘भारत’ के 23 मार्च के अंक में लिखा, “महात्मा जी के महान प्रभाव के संबंध में हमें कुछ कहना नहीं है. वे भारत के हृदय सम्राट हैं और उनकी वाणी राष्ट्रवाणी है. त्याग और तपस्या, बुद्धि विवेक और ज्ञान का जैसा समन्वय महात्मा जी में है, किसी भी राष्ट्रीय नेता मे नहीं है. सत्य और अहिंसा के प्राचीन दिव्यास्त्रों का आधुनिक युग के लिए आविष्कार कर महात्मा जी ने देश को जो उपहार दिए हैं, वे एकदम अमूल्य हैं.” ( उद्धृत, ‘हिन्दी आलोचना और गाँधी’ शीर्षक श्रीभगवान सिंह का लेख, ‘दस्तावेज’ -162, पृष्ठ- 12) महात्मा गाँधी के प्रति उनकी आस्था का भला इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है ? उनके एक -एक शब्द श्रद्धा-रस से सराबोर हैं. फिर उन्हें गाँधीवादी कहने में संकोच क्यों ? ‘भारत’ का संपादन करते हुए वाजपेयी जी ने निराला, प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त और आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मूल्यांकन किया था. प्रसाद, पंत और निराला तो उनके मित्र जैसे थे. प्रसाद और निराला की पुस्तकों की उन्होंने भूमिकाएं लिखी हैं. जो लोग आचार्य वाजपेयी को रामचंद्र शुक्ल का प्रतिद्वंद्वी मानते हैं उनके लिए, शुक्ल जी के बारे में कहे गए वाजपेयी जी के कुछ उद्धरण पेश है. “ शुक्ल जी ने हिन्दी समीक्षा में क्रान्तिकारी परिवर्तन किया. वे नए युग के विधायक थे.” “ वे एक उच्च कोटि के सहृदय और काव्य-मर्मज्ञ हैं. “ “शुक्ल जी की साहित्यिक देन कितनी जबर्दस्त है, इसका अनुमान इतने से ही किया जा सकता है कि यद्यपि वे प्राचीन दार्शनिक मान्यताओं के विपरीत निर्देश करते आए हैं, किन्तु आज भी वे उस काल के काव्य के प्रामाणिक विवेचक माने जाते हैं और उनकी देख- रेख में प्राचीन अनुसंधान का कार्य भी होता रहता है और यह भी उन्ही के व्यक्तित्व का परिणाम है कि नवीन समुनन्त काव्य को अपना पैर जमाने के लिए ( शुक्ल जी के विरोध के बावजूद ) लगातार पंद्रह वर्षों तक अथक उद्योग करना पड़ा. आज भी स्थिति यह है कि साहित्य और उसके आनुषंगिक विषयों पर अध्ययन के अधिक प्रशस्त रास्ते खुल जाने पर भी अबतक शुक्ल जी ही साहित्य के अन्तिम वाक्य माने जाते हैं.” (उद्धृत, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ- 35) नंददुलारे वाजपेयी रचनावली के संपादक, वाजपेयी जी के प्रमुख अध्येता और शिष्य विजय बहादुर सिंह लिखते हैं, “ अन्तिम और प्रौढ़ दिनों में पहुँचकर वे राष्ट्रीय ( जातीय ) साहित्य की अपनी अवधारणा प्रस्तुत करते हुए जिन चार महान हिन्दी लेखकों को छांटते हैं, उनमे प्रेमचंद, प्रसाद, निराला और आचार्य शुक्ल हैं.” ( आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, पृष्ठ- 35 ) वाजपेयी जी जब मार्क्सवाद से टकराते हैं तब सीधे- सीधे उसके समानान्तर गाँधी के विचार-दर्शन का हवाला देने लगते हैं. वे कहते है, “ आज के जनवादी लेखक को व्यक्तिगत त्याग और कष्ट सहिष्णुता अपनानी होगी. उसे प्रेमचंद और टॉलस्टाय के मार्ग पर चलना होगा. वह किसी मार्क्सवादी नुस्खे को लेकर काम नहीं कर सकता. उसे अब भी चरित्र और आचरण की आवश्यकता है. महान आदर्शों के पीछे जीवन के क्षुद्र स्वार्थों को मिटा देने की साधना करनी होगी. हम जिस जनवादी राष्ट्र या मानव समूह की कल्पना करते हैं, वह केवल आर्थिक दृष्टि से सुखी नहीं होगा, उसे पूर्णत: सांस्कृतिक और नैतिक मानव भी होना चाहिए. यहाँ भी मार्क्सवादी शिक्षाएं और उपचार मुझे तो अधूरे दिखाई देते है. उनसे तो गाँधी जी का सर्वोदय सिद्धान्त मुझे भारतीय जीवन के अधिक अनुरूप जान पड़ता है.” ( नया साहित्य : नये प्रश्न, पृष्ठ- 230) वाजपेयी को कुछ विद्वानों ने स्वच्छंदतावादी समीक्षक और कुछ ने सौष्ठववादी समीक्षक कहा है. अपने मौलिक दृष्टिकोण, नव्यतर समीक्षात्मक मान, तलस्पर्शी दृष्टि और मार्मिक व्याख्या के कारण वे हिन्दी के मूर्धन्य आलोचकों में माने जाते हैं. वे पहले समीक्षक हैं जिन्होंने छायावादी काव्य का गहन और सूक्ष्म विश्लेषण किया. छायावादी काव्य के नए जीवन दर्शन, नयी भाव धारा, नूतन कल्पना छवियों और अभिनव भाषाओं ने उन्हें अपनी ओर आकृष्ट किया और उनके आलोचनात्मक दृष्टिकोण को नवीन चेतना दी. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का शिष्य होते हुए और उनका पूर्ण सम्मान करते हुए वाजपेयी जी ने सबसे पहले छायावाद के संबंध में शुक्ल जी के मतों का दृढ़तापूर्वक खंडन करते हुए स्थापित किया कि छायावादी काव्य पश्चिम या बंगला के काव्य का अनुकरण न होकर रीतिबद्ध और द्विवेदी कालीन कविता की प्रतिक्रिया था जिसमें राष्ट्रीय चेतना मुखर थी और पश्चिम की तथा बंगला कविताओं का प्रभाव भी था. उन्होंने यह भी स्थापित किया कि छायावाद सिर्फ शैली नहीं है. उसका अपना जीवन-दर्शन भी है और उसकी अपनी भाव- संपत्ति भी है. वाजपेयी जी ने भक्तिकाल, रीतिकाल और द्विवेदी कालीन कविता की सीमाओं के परिप्रेक्ष्य में छायावादी काव्य की उपलब्धियों का उचित मूल्यांकन कर छायावाद की महत्ता स्थापित की. छायावादी कविताओं पर विचार करते हुए वाजपेयी जी ने इस भ्रान्त धारणा का खंडन किया कि शैली और अनुभूति दो अलग-अलग वस्तुएं हैं. जहां शैली और अनुभूति में पार्थक्य होता है और शैली प्रधान हो जाती है वहां रीतिवादी रूढ़ काव्य का निर्माण होने लगता है और जहां शैली की उपेक्षा होने लगती है वहां रूखापन आने लगता है. वाजपेयी जी ने अपनी पुस्तक हिन्दी साहित्य छ बीसवीं शताब्दी की भूमिका में अपना आलोचनात्मक दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए सात चेष्टाओं की ओर संकेत किया है। वे हैं, रचना में कवि की अंतर्वृत्तियों ( मानसिक उत्कर्ष –अपकर्ष ) का अध्ययन, रचना में कवि की मौलिकता, शक्तिमत्ता और सृजन की लघुता- विशालता ( कलात्मक सौष्ठव) का अध्ययन, रीतियों, शैलियों और रचना के वाह्यांगों का अध्ययन, समय और समाज तथा उनकी प्रेरणाओं का अध्ययन, कवि की व्यक्तिगत जीवनी और रचना पर उसके प्रभाव का अध्ययन, कवि के दार्शनिक, सामाजिक और राजनीतिक विचारों आदि का अध्ययन तथा कवि के जीवन संबंधी सामंजस्य और संदेश का अध्ययन. उपर्युक्त मान्यताओं में ऊपर से नीचे की ओर प्रमुखता कम होती गई है. इसके अलावा वाजपेयी जी के समीक्षात्मक दृष्टिकोण को समझने के लिए उनकी सूर, प्रसाद, निराला और पंत की व्यावहारिक समीक्षाएं भी उपयोगी हैं. फिलहाल, उन्होंने हिन्दी के जिन महत्वपूर्ण साहित्यकारों को अपनी आलोचना का आधार बनाया है उनमें उपर्युक्त के अलावा सूर, रामचंद्र शुक्ल और प्रेमचंद महत्वपूर्ण हैं. वाजपेयी जी की प्रमुख समीक्षा कृतियों में ‘हिन्दी साहित्य: बीसवीं शताब्दी’, ‘जयशंकर प्रसाद’, ‘प्रेमचंद’, ‘आधुनिक साहित्य’, ‘नया साहित्य : नए प्रश्न’, ‘कवि निराला’, तथा ‘राष्ट्रीय साहित्य तथा अन्य निबंध’, ‘महाकवि सूरदास’ आदि उल्लेखनीय है. उनके निधन के बाद भी उनकी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुईं जिनमें ‘कवि सुमित्रानंदन पंत’, ‘नयी कविता’, ‘रससिद्धांत’, ‘साहित्य का आधुनिक युग’, ‘आधुनिक साहित्य : सृजन और समीक्षा’ तथा ‘रीति और शैली’ प्रमुख है. सूर की आलोचना करते हुए वे लिखते हैं, “ स्थिति विशेष का पूरा दिग्दर्शन भी करें, घटनाक्रम का आभास भी दें और साथ ही समुन्नत कोटि के रूप-सौन्दर्य और भाव-सौन्दर्य की परिपूर्ण झलक भी दिखाते जायँ, यह विशेषता हमें कवि सूरदास में ही मिलती है. गोचारण अथवा गोवर्धन –धारण के प्रसंग कथात्मक हैं, किन्तु उन कथाओं को भी सजाकर सुन्दर भावगीतों में परिणत कर दिया गया है. हम आसानी से यह नहीं समझ पाते कि कथानक के भीतर रूप-सौन्दर्य अथवा मनोगतियों के चित्र देख रहे हैं, अथवा मनोगतियों और रूप की वर्णना के भीतर कथा का विकास देख रहे हैं.” ( महाकवि सूरदास, पृष्ठ 174) आचार्य शुक्ल पर वाजपेयी जी ने आत्मनिष्ठता का आरोप लगाया है. उनके अनुसार वस्तुनिष्ठ आलोचना वह है जो दृष्टिकोण विहीन होती है, यानी, जो आलोचक की दृष्टि से नहीं, रचनाकार और उसके परिवेश की दृष्टि से लिखी जाती है. शुक्ल जी की आलोचना के बारे में वे कहते हैं, “उन्होंने अपने पूर्वनिरूपित सिद्धांतों के आधार पर प्रत्येक कवि को परखना चाहा है. जिससे उनकी समीक्षा और विश्लेषण सर्वत्र वस्तून्मुखी नहीं हो सका है. कवि की प्रवृति और परिस्थिति के साथ उसके काव्य की परख नहीं की गई है. इस कारण शुक्ल जी की समीक्षा में एक से ही पैमाने दिखायी देते हैं, और बार-बार एक से ही शब्दों का प्रयोग होने लगा है. देश काल के प्रभावों से उत्पन्न कला की विविधता की वे उपेक्षा कर गए हैं.” ( आधुनिक साहित्य, पृष्ठ 306) वाजपेयी जी ने जिन कारणों से शुक्ल जी की आलोचना की है, बहुत कुछ उन्हीं कारणों से प्रेमचंद की भी. प्रेमचंद में भी उन्हें स्थूलता नजर आती है और अंतरंगता की कमी दिखायी पड़ती है. उन्हें वे स्थायी महत्व वाले कथाकार नहीं, बल्कि सामयिक घटनाओं पर कलम चलाने वाले लेखक प्रतीत हुए हैं और उनकी सोद्देश्यता उन्हें प्रचारात्मक मालूम पड़ी है. उन्होंने लिखा है, “ हम तो रचयिता की संपूर्ण कृतियों में एक अंतर्निहित चेतना धारा देखना चाहते हैं. वह धारा हमें प्रेमचंद में नही मिलती.” ( हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी, पृष्ठ-127). इस पर नंदकिशोर नवल की टिप्पणी है, “ अंतर्निहित चेतनाधारा का स्पष्ट अर्थ है, व्यवहार से पृथक भाव. जिसका आग्रह न तो शुक्ल जी की आलोचना में है, न प्रेमचंद के कथा साहित्य में. प्रेमचंद के चरित्र प्रतिनिधि चरित्र हैं, यानी, वे वर्गीय विशेषताओं से युक्त हैं. यह हिन्दी कथा साहित्य को प्रेमचंद की देन है. लेकिन वाजपेयी जी इसके लिए उनकी आलोचना करते हैं.“ ( और कहते हैं ) “वे आधुनिक जीवन तक ही सीमित हैं और उनमें वर्गगत या जातिगत चित्रण की प्रधानता है, वैयक्तिक चित्रण नहीं.” कहना न होगा, प्रेमचंद के चरित्र सामान्य चरित्र हैं. लेकिन वे वैयक्तिक विशेषताओं से शून्य नहीं हैं. लगता है वाजपेयी जी नितांत वैयक्तिक चरित्र चाहते हैं जिनमें वे स्थूलता से मुक्त अंतरंग जीवन का सूक्ष्म चित्रण पा सकें.”( हिन्दी आलोचना का विकास, पृष्ठ- 171) इतना ही नहीं, साहित्य को लेकर प्रेमचंद की सोद्देश्यता को वाजपेयी जी ने ‘प्रोपेगेण्डा’ कहा है और उसे उनके लेखन का सबसे बड़ा दोष माना है. “उनका सबसे बड़ा दोष –जो उनके साहित्य- कला को कलुषित करने में समर्थ हुआ है, यही प्रोपेगेण्डा है.”( प्रेमचंद : साहित्यिक विवेचन, पृष्ठ -131) मगर दूसरी ओर अज्ञेय और जैनेन्द्र के उपन्यासों के मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिवादी चरित्रों से भी उन्हें एतराज है. अज्ञेय के ‘शेखर : एक जीवनी’ पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं, “ मेरे सामने प्रमुख प्रश्न यह रहा है कि कला और निरीक्षण- संबंधी लेखक की मार्मिकता और मनोविज्ञान की गहरी पैठ हमें ले कहां जाती है ? केवल मनोरंजक और चमत्कारी कथा ही पर्याप्त है या उस कथा की प्रेरणा और उसके सामाजिक प्रभाव का आकलन करना भी हमारा कर्तव्य है ?” (आधुनिक साहित्य, पृष्ठ 219) ). अन्त में उपन्यास के नायक को उन्होंने इसलिए नापसंद किया है कि “ किसी स्वस्थ केन्द्र से उसका लगाव नहीं रहा, किसी उच्च उद्देश्य के प्रति उसकी आस्था नहीं रही.” ( उपर्युक्त, पृष्ठ -230). यह उच्च उद्देश्य क्या शोषण विहीन समाज की स्थापना का मार्क्सवादी उद्देश्य हैय़ कदापि नहीं. मार्क्सवादियों की हिंसा का वे अनेकशछ विरोध कर चुके हैं. निश्चित रूप से यह उच्च उद्देश्य गाँधी के सपनों के समाज की स्थापना का उद्देश्य है. छायावाद, बाजपेयी जी को बहुत अधिक पसंद आया क्योंकि उसमें मानवीयता एवं आध्यात्मिकता का संगम हुआ है और उसमें सांस्कृतिक व राष्ट्रीय चेतना का स्वर प्रमुख है. छायावाद को मधुचर्या का काव्य अथवा पलायनवादी काव्य कहने वालों की खबर लेते हुए वे लिखते हैं, “खेद और आश्चर्य की बात है कि हमारे कतिपय समीक्षकों ने इस अत्यंत सीधी और सच्ची बात को समझने की चेष्टा नहीं की कि हमारे इस युग के साहित्य की मुख्य प्रेरणा राष्ट्रीय और सांस्कृतिक है. राष्ट्रीयता ने हमारे समस्त समाजिक जीवन को अनेक रूपों में आंदोलित कर रखा था और हमारे कवि और लेखक भी इस दुर्दमनीय प्रभाव से बच नहीं सकते थे.... यह सोचना भी असंभव है कि जिस समय हमारे देश में राष्ट्रीय मुक्ति का जीवन-मरण संग्राम चल रहा हो, उस समय हमारे कल्पनाशील कवि और लेखक उससे कुछ भी प्रेरणा न ग्रहण करें, बल्कि उसके प्रति विमुख और अन्यमनस्क होकर रहें. फिर भी हमारे कतिपय समीक्षकों ने उन्हे इसी रूप में चित्रित करने की चेष्टा की है. कुछ न उन्हे पलायनवादी संज्ञा देकर जीवन से उनकी विमुखता सिद्द करनी चाही है. शेष कुछ समीक्षकों ने उन्हें ‘मधुचर्या का प्रेमी’, ‘स्वप्नद्रष्टा’ या ‘अनंत का उपासक’ बताकर उनकी असामाजिकता का विज्ञापन किया है.” ( उद्धृत, दस्तावेज-162, पृष्ठ 17) इस संबंध में गाँधीवादी लेखक श्रीभगवान सिंह ठीक कहते हैं कि, “ मार्क्सवाद, समाजवाद या प्रगतिवाद से उन्हें वितृष्णा नहीं रही, किन्तु इन सबकी एकांगिकता से असंतुष्ट वाजपेयी जी के साहित्यिक मूल्यांकन के निकष के केन्द्र में गाँधीवादी चिंतन ही रहा....... वाजपेयी जी ने गाँधीवाद की पीठिका पर खड़े होकर छायावाद की जिस राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना को उकेरा, वही बाद में रामविलास शर्मा, नामवर सिंह जैसे मार्क्सवादी आलोचकों की भी छायावाद के संबंध में साम्राज्यवाद सामंतवाद विरोधी मूल्यांकन –दृष्टि का पाथेय बनी.” ( दस्तावेज-162, पृष्ठ- 17) जयशंकर प्रसाद में उन्होंने अपना आदर्श कवि प्राप्त किया है. उनके जीवन दर्शन को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं, “ प्रसाद का जीवन दर्शन क्या है? वह जीवन दर्शन है विशाल और बहुमुखी जीवनानुभूति का परिणाम, रहस्यवाद.” ( हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी, पृष्ठ -19) ऊपर के संक्षिप्त विश्लेषण के आधार पर हमारा निष्कर्ष है कि आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का मार्ग समन्वय का मार्ग है. अपने ग्रंथ ‘आधुनिक साहित्य’ में उन्होंने लिखा है, “ हमारा साहित्य नयी विचारधाराओं और नयी परिस्थितियों से प्रभावित होकर नए कला स्वरूपों में प्रकट होता और नयी शैलियों में ढला करता है. उसके क्रम विकास में विरोध के स्थान पर समन्वय का तत्व प्रमुख रहता है. विवादी स्वरों की अपेक्षा संवादी स्वरों की प्रधानता रहती है.” ( आधुनिक साहित्य, पृष्ठ -377) गांधी जी उन्हें बार-बार अपनी ओर आकृष्ट करते हैं, तो उसका एक बड़ा कारण गाँधीजी का भौतिकता और आध्यात्मिकता का समन्वयकारी व्यक्तित्व भी था. वस्तुत: यही समन्वय गाँधी-दर्शन का मूल है. वाजपेयी जी ने लिखा है, ”मेरी समझ मे साहित्य केवल व्यक्तिगत भावों के प्रदर्शन की भूमि नहीं हो सकता. व्यक्तिगत भाव भी आखिर क्या है? उस व्यक्तिविशेष पर पड़े हुए विभिन्न ज्ञात अज्ञात उपकरणों का प्रभाव ही तो. वे उपकरण उसे कहां से मिले ? अपने समय के समाज और सामाजिक चेष्टाओं से. तब प्रश्न यह है कि वह उस समाज और उन चेष्टाओं को आंख मूदकर क्यों लें ? आंखें खुली क्यों न रखें और क्यों न अपने सामूहिक उत्तरदायित्व को समझें ? फिर यह ऊपर से लादा हुआ कोई बोझ नहीं है, यह तो मनुष्य के सामाजिक प्राणी होने की स्वाभाविक सूचना है.” ( आधुनिक साहित्य, पृष्ठ-359) निष्कर्ष यह है कि वाजपेयी जी के चिन्तन पर गाँधी का गहरा प्रभाव है. गाँधी-दर्शन में उन्होंने एक प्रकार की पूर्णता लक्षित की है. उन्होंने कहा भी है, “ गाँधी जी की नीति का राजनीतिक मूल्य ही नहीं है, जीवन व्यापी या दार्शनिक मूल्य भी है..... वे केवल धन की चर्चा ही नहीं मन की भी उन्नति की साधना करते हैं. “( नया साहित्य : नए प्रश्न, पृष्ठ- 241) इसलिए हम वाजपेयी जी को गाँधीवादी आलोचक कहना अधिक न्यायसंगत समझते हैं.

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