हिन्दी के विशेषज्ञों की विशेषज्ञता ? ( जनसत्ता 22 मार्च 2020 )

देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के चयन के लिए एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा ‘नेट’ अर्थात ‘नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट’ अथवा ‘राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा’ उत्तीर्ण करना अनिवार्य है. यह परीक्षा प्रतिवर्ष दो बार ( जून और दिसंबर ) में एन.टी.ए. ( नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ) दावारा आयोजित की जाती है और इसका पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अपने विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार करता है. देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित इस परीक्षा के लिए यू.जी.सी. ने हिन्दी का जो नया पाठ्यक्रम तैयार किया है वह हमें चौंकाता है. आगामी जून में होने वाली परीक्षा इसी पाठ्यक्रम पर केन्द्रित होगी. पूरा पाठ्यक्रम यू.जी.सी. की वेबसाइट पर मौजूद है. यह पाठ्यक्रम कुल दस इकाइयों में विभक्त है. इनमें से प्रत्येक इकाई पर समान अंक निर्धारित हैं. परीक्षार्थियों से दो –दो अंकों के कुल सौ प्रश्न अर्थात दो सौ अंकों के वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाएंगे. इनमें से अन्तिम दस प्रश्न दिए गए दिए गए अवतरणों पर केन्द्रित होंगे और बाकी अस्सी प्रश्न निर्धारित पाठ्यक्रम पर. तात्पर्य यह कि प्रत्येक इकाई से आठ प्रश्न पूछे जाने की संभावना है. सबसे पहले मैं पाठ्यक्रम की उन भूलों की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूँ जिन्हें मैं विशेषज्ञों की असावधानी मानता हूँ, अल्पज्ञता नहीं. क्योंकि मेरा विश्वास है कि इस स्तर की परीक्षा का पाठ्यक्रम तैयार करने वाले विशेषज्ञ इतने अल्पज्ञ नहीं हो सकते. इकाई पाँच में ‘घनानंद कवित्त’ के संपादक का नाम ‘विश्वनाथ मिश्र’ छपा हुआ है जबकि उनका नाम ‘विश्वनाथ प्रसाद मिश्र’ है. ‘द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र’ शीर्षक कविता को महादेवी वर्मा की कविताओं शामिल किया गया है जबकि यह कविता सुमित्रानंदन पंत की है. इकाई आठ नाटकों पर केन्द्रित है जिसमें मन्नू भंडारी का ‘महाभोज’ रखा गया है. ‘महाभोज’ मन्नू भंडारी का उपन्यास है, न कि नाटक. इकाई नौ निबंधों पर केन्द्रित है जिसमें बालकृष्ण भट्ट का निबंध संग्रह ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ रखा गया है जबकि ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ शीर्षक निबंध संग्रह के वास्तविक रचनाकार बाल मुकुन्द गुप्त हैं और अन्तिम इकाई दस में मुक्तिबोध की पुस्तक ‘एक लेखक की डायरी’ रखी गई है जबकि उनकी पुस्तक का वास्तविक नाम ‘एक साहित्यिक की डायरी’ है. इनके अलावा अन्य अनेक छोटी- छोटी गलतियाँ हैं जिन्हें मैं प्रूफ की गलतियाँ मानकर छोड़ रहा हूँ. हाँ, इकाई सात में कहानियाँ है जिनमें अज्ञेय की कहानी ‘गैंग्रीन’ रखी गई है. यह सही है कि यह कहानी ‘गैंग्रीन’ नाम से ही पहले छपी थी किन्तु कहानी की मूल संवेदना को अधिक प्रखरता से उभारने के लिए स्वयं लेखक अज्ञेय ने बाद में इसका शीर्षक बदलकर इसे ‘रोज’ नाम से प्रकाशित किया था. निस्संदेह यही शीर्षक कहानी की मूल संवेदना का वाहक है और विशेषज्ञों से अपेक्षा थी कि वे विषय से जुड़े तथ्य समझते और ‘गैंग्रीन’ की जगह ‘रोज’ लिखते. अब मैं विशेषज्ञों की विशेषज्ञता पर कुछ कहना चाहता हूँ. इकाई दो ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ है. इसमें “स्वच्छंदतावाद और उसके प्रमुख कवि” का अध्ययन प्रस्तावित है, किन्तु इसके ठीक बाद में “छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषताएं, छायावाद के प्रमुख कवि” रखा गया है. जहाँ तक मैं जानता हूँ स्वच्छंदतावाद ( रोमैंटिसिज्म) पश्चिम का एक प्रसिद्ध काव्यान्दोलन है जिसका व्यापक प्रभाव हिन्दी के छायावादी काव्य पर पड़ा है. इसी के कारण कुछ आलोचकों तथा इतिहासकारों ने ‘छायावाद’ की जगह इसे ‘स्वच्छंदतावाद’ कहा है और कुछ ने स्वच्छंदतावाद को छायावाद की एक प्रवृति बताया है. जहाँ तक स्वच्छंदातावादी कवियों और छायावादी कवियों का सवाल है, दोनो में कोई अंतर नहीं है. जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा इस धारा के प्रमुख कवि हैं. इन्हें स्वच्छंदतावादी कवि कहें या छायावादी. ऐसी दशा में “स्वच्छंदतावाद और उसके प्रमुख कवि” के साथ फिर से दुबारा “छायावाद के प्रमुख कवि” के अध्ययन का प्रस्ताव परीक्षार्थियों में भ्रम पैदा करता है. क्या आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य नंददुलारे बाजपेयी, डॉ.रामविलास शर्मा और नामवर सिंह के आलोचना कर्म को समझे बिना हिन्दी साहित्य को समझा जा सकता है ? देखकर आश्चर्य होता है कि इस पूरे पाठ्यक्रम से इन महान आलोचकों के आलोचना- कर्म को हटा दिया गया हैं. ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ शीर्षक दूसरी इकाई का ही उत्तरार्ध ‘हिन्दी साहित्य की गद्य विधाएं’ है, जिसमें हिन्दी उपन्यास, हिन्दी कहानी, हिन्दी नाटक और हिन्दी निबंध के साथ अंत में ‘हिन्दी आलोचना’ का उल्लेख है. इसमें “हिन्दी आलोचना का उद्भव और विकास, समकालीन हिन्दी आलोचना एवं उसके विविध प्रकार, प्रमुख आलोचक.” रखा गया है, मगर वास्तविकता यह है कि आलोचना का यह निर्धीरित अंश, पाठ्यक्रम के अनुपात में नगण्य है. इस पर अधिक से अधिक दो अंक का एक प्रश्न ही बन सकता है. यहाँ उल्लेखनीय यह है कि इस पाठ्यक्रम में उपन्यास, कहानी, नाटक और निबंध पर क्रमश: छठीं, सातवीं, आठवीं और नवीं अलग -अलग इकाइयाँ हैं, जिन्हें दूसरी इकाई के उत्तरार्ध के उक्त अंशों को पढ़े बगैर समझ पाना असंभव है. ऐसी दशा में, दूसरी इकाई के उत्तरार्ध के अंशों को छठीं, सातवीं, आठवी और नवीं की भूमिका के रूप में शामिल किया जा सकता था और इस तरह दूसरी इकाई के उत्तरार्ध के आलोचना साहित्य को समुचित विस्तार दिया जा सकता था. विशेषज्ञों का ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया? इसी तरह, इस पाठ्यक्रम में मार्क्सवाद, स्त्री विमर्श, दलित विमर्श तथा आदिवासी विमर्श को इकाई चार के अन्तिम हिस्से में जितनी जगह दी गई है उसके आधार पर दो सौ अंकों के प्रश्न पत्र में इन सबके लिए सिर्फ दो अंकों का एक प्रश्न बनता है. ‘वैचारिक पृष्ठभूमि’ शीर्षक इस इकाई के अन्तिम अंश के रूप में मार्क्सवाद, मनोविश्वलेषणवाद, अस्तित्ववाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, अस्मितामूलक विमर्श ( दलित, स्त्री, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक )को एक ही साथ रखा गया है. स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आज हिन्दी में अध्ययन के प्रमुख विषय हैं. इनके महत्व को रेखांकित करते हुए ही अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में इन्हें स्वतंत्र प्रश्न-पत्रों के रूप में रखा गया है. इन सबको पाठ्यक्रम से इस तरह बाहर कर देना कहाँतक उचित है? यह ठीक है कि आज सत्ता में बैठे लोगों को मार्क्सवाद से परहेज है, किन्तु हिन्दी के प्रगतिशील साहित्य को बिना मार्क्सवाद को पढ़े भला कैसे समझा जा सकता है ? वैसे, किसी भी अवधारणा को खारिज करने लिए उसे पहले जानना और समझना पड़ता है. मार्क्सवाद का अध्ययन इतना तो किया ही जाना चाहिए कि हमारे भीतर उसे खारिज करने की समझ विकसित हो सके. इसी हिस्से में ‘अल्पसंख्यक विमर्श’ भी रखा गया है जबकि मेरी समझ में अभी हिन्दी में ‘अल्पसंख्यक विमर्श’ जैसी अवधारणा इस स्तर की विकसित नहीं हुई है कि इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सके. इस विषय पर कोई उल्लेखनीय पुस्तक भी देखने को नहीं मिली. इसी इकाई में ‘लोहिया दर्शन’ और ‘अम्बेडकर दर्शन’ के साथ ‘गाँधीवादी दर्शन’ रखा गया है. ‘गाँधीवादी दर्शन’ को भी क्या ‘गाँधी-दर्शन’ नहीं कहा जाता है ? पाठ्यक्रम में विभिन्न इकाइयों के बीच परिमाणगत अन्तर देखकर आश्चर्य होता है. ‘हिन्दी उपन्यास’ शीर्षक इकाई छ: में जहाँ ‘झूठा सच’, ‘राग दरबारी’, ‘जिन्दगीनामा’ जैसे बड़े- बड़े 13 उपन्यास हैं, वहीं ‘हिन्दी कहानी’ शीर्षक इकाई सात में सिर्फ सत्रह कहानियाँ, जिन्हें यदि एक जगह संकलित कर दिया जाय तो एक उपन्यास के आधे भर की सामग्री होगी. इसी तरह ‘हिन्दी निबंध’ शीर्षक इकाई नौ में जहाँ सिर्फ दस निबंध रखे गए हैं, वहीं “आत्मकथा, जीवनी तथा अन्य गद्य विधाएं” शीर्षक इकाई दस में चौदह मोटे- मोटे ग्रंथ, जिनमें दिनकर का ‘संस्कृति के चार अध्याय’ भी शामिल है. अलग- अलग इकाइयों की पाठ्य सामग्री में इतना अंतर ? उम्मीद है, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अपने विशेषज्ञों से इन मुद्दों पर एक बार जरूर विमर्श करेगा और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की पात्रता तय करने वाली इस परीक्षा की गरिमा को बनाए रखने की कोशिश करेगा.

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