हिन्दी के पहले डॉक्टोरेट : पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल

गढ़वाल (उत्तराखंड) जिले के ‘पाली’ नामक गाँव में जन्मे, श्रीनगर( गढ़वाल), लखनऊ, कानपुर तथा काशी में पढ़े-लिखे तथा काशी व लखनऊ विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल (13.12.1901-24.07.1944) को किसी भारतीय विश्वविद्यालय से हिन्दी का प्रथम डी. लिट. होने का गौरव हासिल है. ‘द निर्गुण स्कूल ऑफ हिन्दी पोयट्री’ विषय पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने उन्हें 1934 ई. में डी. लिट् की उपाधि से नवाजा था और हिन्दी जगत में उसकी भूरि- भूरि प्रशंसा हुई थी. उनका यह शोध-प्रबंध बाद में ‘हिन्दी में निर्गुण संप्रदाय’ के नाम से प्रकाशित हुआ. हिन्दी जगत में बड़थ्वाल जी ने अपनी शोध- वृति और समीक्षा-दृष्टि के कारण ही पहचान बनाई. संत, सिद्ध, नाथ और भक्ति साहित्य की खोज और विश्लेषण में ही उनकी विशेष रुचि थी. उन्होंने भक्ति आन्दोलन को हिन्दू जाति की निराशा का परिणाम नहीं माना अपितु उसे भक्ति धारा का स्वाभाविक विकास माना है. उन्होंने गोरखनाथ की रचनाओं का संपादन ‘गोरखबानी’ नाम से किया है. इस कृति से उन्हें विशेष ख्याति मिली. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘नाथ सिद्धों की रचनाएं’ की भूमिका में लिखा है, “नाथ सिद्धों की हिन्दी रचनाओं का यह संग्रह कई हस्तलिखित प्रतियो से संकलित हुआ है. इसमें गोरखनाथ की रचनाएं संकलित नहीं हुईं, क्योंकि स्वर्गीय डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ की रचनाओं का संपादन पहले से ही कर दिया है और वे ‘गोरखबानी’ नाम से प्रकाशित भी हो चुकी हैं. बड़थ्वाल जी ने अपनी भूमिका में बताया था कि उन्होंने अन्य नाथ सिद्धों की रचनाओं का संग्रह भी कर लिया है जो इस पुस्तक के दूसरे भाग में प्रकाशित होगा. दूसरा भाग अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है. अत्यंत दुख की बात है कि उसके प्रकाशित होने के पूर्व ही विद्वान संपादक ने इहलोग त्याग दिया. डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल को खोज में 40 पुस्तकों का पता चला था, जिन्हे गोरखनाथ –रचित बाताया जाता है. डॉ. बड़थ्वाल ने बहुत छानबीन के बाद इनमें प्रथम 14 ग्रंथों को निस्संदिग्ध रूप से प्राचीन माना, क्योंकि इनका उल्लेख प्राय: सभी प्रतियों में मिला. तेरहवीं पुस्तक ‘ग्यान चौंतीसा’ समय पर न मिल सकने के कारण उनके द्वारा संपादित संग्रह में नहीं आ सकी, परन्तु बाकी तेरह को गोरखनाथ की रचनाएं समझकर उस संग्रह में उन्होंने प्रकाशित कर दिया था. ( नाथसिद्धों की रचनाएं, भूमिका से ) डॉ. बड़थ्वाल की अध्ययनशीलता से प्रेरित होकर नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ने इन्हें अपने यहाँ पाण्डुलिपियों की खोज के लिए अवैतनिक संचालक के रूप में नियुक्त कर लिया. उनके नेतृत्व में अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की खोज भी हुई. ‘रामानंद की हिन्दी रचनाएं’, ‘सूरदास जीवन सामग्री’, ‘मकरंद’, ‘हिन्दी साहित्य में उपासना का स्वरूप’, ‘कवि केशवदास’, योग प्रवाह, ‘प्राणायाम : विज्ञान और कला’, ‘ध्यान से आत्म-चिकित्सा’ आदि डॉ. बड़थ्वाल की अन्य अनुसंधानपरक और आलोचनात्मक पुस्तकें हैं. उन्होंने ‘कबीर-ग्रंथावली’, ‘रामचंद्रिका’, रूपक रहस्य, ‘कबीर की साखी और सर्वांगी’, ‘हरिदास जी की साखी’, ‘रैदास जी की साखी’, ‘हरिभक्त प्रकाश’ और ‘सेवादास’ आदि का भी संपादन किया है. अपने गढ़वाल क्षेत्र के प्रति उनमें गहरा अनुराग था और वहाँ के पवाड़ों ( वीर गाथाओं), तंत्र-मंत्र, ग्राम-गीत तथा इतिहास का भी उन्होंने गहरा अध्ययन किया था. उन्होंने स्थानीय कथानकों के आधार पर गढ़वाली भाषा में कुछ नाटक भी लिखे. ‘उत्तराखंड में संत- मत और संत- साहित्य’ शीर्षक उनका शोधपूर्ण निबंध खासा चर्चित हुआ था. उनकी अंग्रेजी में प्रकाशित पुस्तकें ‘मिस्टिसिज्म इन हिन्दी पोयट्री’ और ‘मिस्टिसिज्म इन कबीर’ भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है. शोधकर्ता और निबंधकार के साथ -साथ बड़थ्वाल जी अपनी दार्शनिक प्रवृत्ति के लिए भी मशहूर थे. उनका समूचा लेखन उनकी गहरी अध्ययनशीलता का परिचायक है. बड़थ्वाल जी की प्रतिभा, सृजनशीलता और अन्वेषणवृत्ति को देखते हुए उनसे बहुत अधिक की उम्मीद थीं किन्तु वे असमय चले गए. 1944 में लखनऊ विश्वविद्यालय से छुट्टी लेकर वे अपने गाँव ‘पाली’ गए थे और वहीं बीमारी से उनका निधन हो गया. डॉ. बड़थ्वाल के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए डॉ. संपूर्णानंद ने लिखा था कि डॉ. बड़थ्वाल की मृत्यु से हिन्दी संसार को बड़ी क्षति हुई है. उन्होंने हमारे वांग्मय के एक विशेष क्षेत्र को जिसका संबंध आध्यात्मिक रचनाओं से है, अपने अध्ययन का विषय बनाया था. इस दिशा में उन्होंने जो कार्य किया उसका आदर विद्वत् समाज में होगा.

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