हिन्दी के ‘महामना’ : पं. मदन मोहन मालवीय

हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयागराज के संस्थापक, उ.प्र.(तत्कालीन पश्चिमोत्तर प्रान्त और अवध) में सरकारी काम-काज के लिए देवनागरी के प्रयोग के लिए सफलतापूर्वक आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले, हिन्दी के अनन्य सेवक, प्रख्यात वकील, ‘हिन्दुस्तान’, ‘अभ्युदय’, ‘लीडर’, ‘मर्यादा’, ‘विश्वबंद्य’ जैसे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का संपादन करने वाले महान पत्रकार, कांग्रेस के चार बार अध्यक्ष रहे वरिष्ठ नेता, गाँधी जी के अनन्य सहयोगी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक, भारत रत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ( 25.12.1861-12.11.1946) का जन्म प्रयागराज में एक सामान्य परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम पं. ब्रजनाथ और माँ का नाम मूना देवी था. वे कुल सात भाई- बहनों में पाँचवीं संतान थे. उनकी आरंभिक शिक्षा प्रयागराज और बी.ए. की पढ़ाई कलकत्ता विश्वविद्यालय में हुई. 1886 मे कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन हुआ था जिसकी अध्यक्षता दादभाई नौरोजी ने की थी. मदन मोहन मालवीय ने इस अधिवेशन में भाग लिया था. उस समय उनकी उम्र मात्र 25 वर्ष थी किन्तु उनमें राष्‍ट्रीय चेतना इतनी विकसित थी कि‍ उन्‍हें सभा को संबोधि‍त करने का अवसर मिला था और उनके भाषण का व्यापक प्रभाव पड़ा था. मालवीय जी के भाषण का असर अधिवेशन में मौजूद कालाकांकर के महाराजा रामपाल सिंह पर भी पड़ा और प्रभावित होकर महाराज ने उनसे साप्ताहिक समाचार पत्र ‘हिंदुस्तान’ का संपादक बनने और उसका प्रबंधन संभालने की पेशकश की. ढाई वर्ष तक संपादक के पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद वे एल.एल.बी. की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद वापस चले आए. 1891 में उन्होंने अपनी कानून की पढ़ाई पूरी की और पहले इलाहाबाद जिला न्यायालय और उसके दो वर्ष बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे. राष्‍ट्रीय आंदोलन में अपना पूर्ण योगदान देने के उद्देश्‍य से मालवीय जी ने 1909 में वकालत छोड़ दी और ‘लीडर’ अखबार निकालकर लोकमत निर्माण करने का महान कार्य करने लगे. यदयपि‍ उस समय वे इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय में पंडित मोतीलाल नेहरू और सर सुन्‍दर लाल जैसे प्रथम श्रेणी के वकीलों में गि‍ने जाते थे. वर्ष 1907 में मालवीय जी ने ‘‘अभ्युदय‘‘ नामक हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र शुरू किया और 1915 में इसे दैनिक समाचार पत्र में तब्दील कर दिया. इतना ही नहीं, कुछ दिन बाद उन्होंने ‘मर्यादा’ पत्रिका का प्रकाशन किया और इसके बाद 1924 में दिल्ली आकर उन्होंने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ को सुव्यवस्थित किया. बाद में वे लाहौर गए और वहाँ से ‘विश्वबंद्य’ निकाला. मालवीय जी ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर 35 साल तक कांग्रेस की सेवा की. उन्हें सन्‌ 1909, 1918, 1930 और 1932 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था. एक वकील के रूप में उनकी सबसे बड़ी सफलता चौरीचौरा कांड के अभियुक्तों को फाँसी से बचा लेने की थी. चौरी-चौरा कांड में 170 भारतीयों को सजा-ए-मौत देने का ऐलान किया गया था, लेकिन महामना ने अपनी योग्यता और तर्क के बल पर 151 लोगों को फाँसी के फंदे से छुड़ा लिया था. लाहौर में 28 जून 1933 को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से दिए गए अपने भाषण में उन्होंने कहा था, “देश की स्वतंत्रता के लिए पहला कदम हिन्दू तथा मुसलमानों की एकता का होना चाहिए. मैं धर्म में विश्वास करता हूँ. जब भी मैं मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों, गिरजाघरों के सामने से गुजरता हूँ, तो मेरा सिर स्वाभाविक रूप से झुक जाता है.” शिक्षा के क्षेत्र में मालवीय जी का सबसे बड़ा योगदान काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना है. उन्होंने एक ऐसा विश्वविद्यालय बनाने का संकल्प लिया था, जिसमें प्राचीन भारतीय परंपराओं को कायम रखते हुए देश-दुनिया में हो रही तकनीकी प्रगति की भी शिक्षा दी जाए. अंतत: उन्होंने अपना यह प्रण पूरा भी किया और 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गया. मालवीय जी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई. उन्होंने 1910 में काशी में आयोजित प्रथम हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की थी. इस सम्मेलन में देश भर से तीन सौ से भी अधिक प्रतिनिधि तथा प्रमुख समाचार पत्रों के सम्पादक सम्मिलित हुए थे. उनका अध्यक्षीय भाषण अत्यंत प्रभावशाली था. इस निमित्त उसी समय एक कोष की स्थापना की गयी जिसमें तुरन्त 3524 रुपये संग्रहीत हो गये. स्वयं मालवीयजी ने अपने अंशदान के रूप में ग्यारह हजार रुपये देने की घोषणा की. पं. श्यामबिहारी मिश्र ने मालवीय जी के संबंध में कहा था ``हिन्दी की जो उन्नति आज दिखाई देती है उसमें मालवीयजी का उद्योग मुख्य कहना चाहिए. इस अवसर पर हमें दूसरा सभापति इनसे बढ़कर नहीं मिल सकता था. अपने अध्यक्षीय भाषण में मालवीयजी ने हिन्दी अपनाने, सरल हिन्दी का प्रयोग करने तथा अन्य भाषाओं के प्रचलित शब्द ग्रहण करने की अपील की. जब मालवीय जी ने अदालतों और स्कूलों में हिन्दी और नागरी की स्थापना के लिए प्रयास आरंभ किया था, उन दिनों यद्यपि हि‍न्‍दी के सबसे बड़े वि‍रोधी सर सैयद अहमद खाँ का निधन हो चुका था किन्तु उनके अनुयायियों ने मोर्चा सँभाल लिया था. इस मुद्दे पर लॉर्ड कर्जन का झुकाव भी उर्दू और फारसी लिपि की ओर ही था. ऐसी परिस्थिति में मालवीय जी ने रात-दिन मेहनत करके नागरी के पक्ष में प्रमाण और आँकड़े इकट्ठे कि‍ए. उन्होंने हि‍न्‍दी भाषा और नागरी लि‍पि‍ की सुन्‍दरता, सहजता और उपयोगि‍ता के पक्ष में जनमत तैयार किया. अपने मित्र पंडि‍त श्रीकृष्ण जोशी के साथ मि‍लकर और अपने पास से रूपये खर्च करके तमाम तथ्य एकत्रित करके उन्होंने एक बेहतरीन पुस्‍तिका तैयार की जिसका शीर्षक रखा, ‘कोर्ट कैरेक्‍टर एण्‍ड प्रायमरी एजुकेशन इन नार्थ वेस्‍टर्न प्रौवि‍न्‍सेज’. मालवीय जी ने इस पुस्तिका के साथ एक प्रार्थना-पत्र लेकर 2 मार्च सन् 1898 ई. को अयोध्‍या नरेश महाराजा प्रताप नारायण सि‍हं, मांडा के राजा रामप्रसाद सि‍हं, आवागढ़ के राजा बलवंत, डॉ. सुन्‍दर लाल आदि‍ के साथ गवर्नमेंट हाउस प्रयाग में छोटे लाट साहब सर एन्‍टोनी मेक्‍डॉनेल से मि‍ले. उनका श्रम सफल हुआ और उनकी लगभग सारी माँगें मान ली गईं. परिणामस्वरूप 18 अप्रैल सन् 1900 ई. को मैक्‍डॉनेल ने एक वि‍ज्ञप्‍ति‍ (गवर्न्‍मेंन गजट) जारी की जि‍ससे अदालतों में तथा शासकीय कार्यों में हिन्दी और नागरी को भी स्‍थान मि‍ल गया. अब सभी लोग अपनी अर्जी, शि‍कायत की दरखास्‍त हि‍न्‍दी अथवा फारसी में दे सकते थे. अदालतों, शासकीय कार्यालयों को निर्देश दे दि‍या गया कि‍ सभी कागजात जैसे सम्‍मन आदि, जो सरकार की ओर से जनता के लि‍ए नि‍काले जायेंगे वे दोनों लि‍पि‍यों यानी नागरी और फारसी में लि‍खे अथवा भरे होंगे. सरकार ने इसके साथ ही यह भी ऐलान कर दि‍या कि‍ आगे कि‍सी भी व्‍यक्‍ति‍ को तभी सरकारी नौकरी मि‍ल सकेगी जब वह हि‍न्‍दी भाषा का भी जानकार हो. जो कर्मचारी हि‍न्‍दी नहीं जानते थे उन्‍हें एक साल के भीतर हि‍न्‍दी सीखने को कहा गया अन्‍यथा वे नौकरी से अलग कर दि‍ए जायेंगे. इस प्रकार मालवीय जी के अथक प्रयास से हि‍न्‍दी का प्रवेश संयुक्‍त प्रान्‍त की अदालतों में हो पाया. प्रथम हिन्दी साहित्य सम्मेलन ( 10,11,12 अक्टूबर 1910 ) के अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा था, “यह सत्य है कि कुछ लोग अपनी मातृभाषा में काम करते हैं, किन्तु ऐसे लोग कितने हैं? मेरा यह प्रस्ताव नहीं है मेरा यह निवेदन है कि जो हुआ वह हुआ, अब क्या करना चाहिए ? आपको यह आवश्यक है कि सरकारी दफ्तरों से जो नकलें दी जाती हैं, उनको आप हिन्दी में लें, जो डिगरियाँ तजबीजें आदि मिलती हैं, उनको आप हिन्दी में लें. यह सब आपके लिये आवश्यक है. गवर्नमेण्ट ने आपको जो अवसर दिया है, उसे आप काम में नहीं लाते. इसके उपरान्त यह भी सत्य है कि आज तक इस कारण से आपके अँगरेजी पढ़नेवालों में केवल उर्दू का अधिक प्रचार है. अब मैं यह आशा करता हूँ और सोचता हूँ कि जबतक यह प्रचार रहेगा, तबतक हिन्दी भाषा की उन्नति में बड़ी रुकावट रहेगी. उर्दू भाषा रहे, कोई बुद्धिमान पुरूष यह नहीं कह सकता कि उर्दू मिट जाय. यह अवश्य रहे और इसके मिटाने का विचार वैसा ही होगा, जैसा हिन्दी भाषा के मिटाने का. दोनों भाषाएँ अमिट हैं, दोनों रहेंगी. उर्दू भाषा के प्रेमी करोड़ों हैं और इस पचास वर्ष में उन्होंने बहुत कुछ उन्नति की है. मौलवी जकाउल्लाह साहब, मुहम्मद हुसैन आजाद और देहली के नजीर अहमद को लीजिए, उस शब्दकोष को लीजिए, जो निजाम हैदराबाद में छपकर तैयार हो गया है. हैदराबाद में मुसलमान भाई 25 वर्ष से उर्दू की उन्नति का बड़ा यत्न कर रहे हैं. हमको संतोष और सुख होता है कि मौलवी शिवली के काम से उसकी उन्नति में अधिकता हुई है और उसकी उन्नति हमारे देश की उन्नति है. हम इसकी भलाई चाहते हैं, किन्तु इसी के साथ-साथ हमें यह भी कहना चाहिए कि हिन्दी जानने वाले इस प्रान्त में बहुत हैं. पिछली मनुष्य गणना से जान पड़ा है कि एक उर्दू जाननेवाला है, तो चार हिन्दी जाननेवाले. हमारे मुसलमान भाई जिनको इसका प्रेम है और जो देशभक्त हैं, जिनसे हमारे देश की सब तरह की उन्नति है, वह उर्दू की उन्नति का यत्न करें और हिन्दी जाननेवाले हिन्दी की उन्नति का. इस देश में हिन्दी भाषा जाननेवालों की कमी नहीं, कोई दस बारह करोड़ हैं. इनकी हिन्दी भाषा की उन्नति करने के लिये हमें क्या उपाय करना चाहिए? जितना अब विचार हो चुका है, उससे आपने यह देख लिया कि भाषाओं की अवस्था में कैसा उलट फेर हुआ और हिन्दी ज्यों की त्यों रही. यह दशा जो हमारी है, उसमें क्या करने की आवश्यकता है. इस बात के विचारने में मैंने आपसे कहा कि राजा के सहारे से बड़ा सहारा होता है. यदि आपको जैसा कि नागरी प्रचारिणी सभा के लिये गवर्नमेण्ट सहारा देती चली आई है, राजसाहाय मिले तो काम बहुत कुछ बन जा सकता है. किन्तु बड़े दुःख की बात यह है कि अंग्रेजी गवर्नमेण्ट ने इसका जितना प्रचार करना चाहा था, हमारी अपेक्षा से उसका उतना प्रचार नहीं हुआ. हमलोंगों को जितना करना चाहिए था, उसका सिर्फ कुछ अंश हमने किया. अब यह सम्मेलन ही विचार करे कि इसकी उन्नति का क्या उपाय होना चाहिए?” इसी तरह 15 अप्रैल 1919 को मालवीय जी ने इलाहाबाद के उच्च न्यायालय में हिन्दी को कार्यालयी व अदालती भाषा बनाने के लिए जमकर बहस की. इस दिन उन्होने अदालत में काली पोशाक पहनने से मना कर दिया था और श्वेत वस्त्र धारण करके आए थे. उनकी बहस से न्यायाधीश बहुत प्रभावित हुए और देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को अदालतो में स्वीकृति दे दी. इसके पूर्व 1882 ई्. में अंग्रेजों ने एक शि‍क्षा कमीशन बैठाया था जिसका उद्देश्‍य‍ यह सुझाव देना था कि शि‍क्षा का माध्‍यम क्‍या हो और शि‍क्षा कैसे दी जाये? इस आयोग में साक्ष्‍य के लिए महामना पंडित मदनमोहन मालवीय तथा भारतेन्‍दु हरि‍श्‍चन्‍द्र चुने गए थे। ‘भारतेन्‍दु’ अस्‍वस्‍थता के कारण आयोग के सम्‍मुख उपस्‍थि‍त नहीं हो पाए. उन्‍होंने अपना लि‍खि‍त बयान आयोग को भेजा था. परन्‍तु मालवीय जी आयोग के सामने उपस्‍थि‍त हुए थे. उन्‍होंने अपने बयान में इस बात पर जोर दि‍या था कि‍ शि‍क्षा समस्‍त क्षेत्रों में दी जाय और वह हि‍न्‍दी भाषा में हो. देश में व्‍यापक भ्रमण और गहन जन- सम्पर्क से मालवीय जी को यह भली- भाँति विश्वास हो गया था कि विभिन्न भाषाओं के इस देश में आजादी के बाद कि‍सी एक भाषा को सम्‍पर्क भाषा के लि‍ए राष्‍ट्रभाषा का रूप लेना पड़ेगा. उन्‍होंने देखा कि‍ देश के अधि‍कांश भू-भाग में अधि‍क से अधि‍क लोग कि‍सी न कि‍सी प्रकार की हि‍न्‍दी बोलते और समझते थे. जबकि‍ देश की अन्‍य भाषाएं यद्यपि उतनी ही महत्‍वपूर्ण थीं पर उनका दायरा सीमि‍त था. वे इतने वि‍शाल जनसमुदाय के द्वारा बोली और समझी नहीं जाती थीं. एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र को जोड़ने के लिए एक राष्‍ट्रभाषा के रूप में मालवीय जी ने हि‍न्‍दी की महत्‍ता को परखा. मालवीय जी के कुशल नेतृत्व में ‘हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य सम्‍मेलन’ की शाखाएं धीरे- धीरे पूरे देश में खुल गईं और इसके माध्‍यम से देश के अहि‍न्‍दी भाषी क्षेत्र के लोगों को हि‍न्‍दी पढ़ने व सीखने का अवसर मि‍ला. अपने स्‍वभाव के अनुरूप मालवीय जी ने हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य सम्‍मेलन की स्‍थापना के बाद इसे आगे चलाने के लि‍ए इसे राजर्षि पुरूषोत्‍तम दास टण्‍डन को सौंप दि‍या. सन् 1918 में इन्‍दौर में हुए हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य सम्‍मेलन के अधि‍वेशन की अध्यक्षता महात्‍मा गाँधी ने की थी. गाँधीजी के नेतृत्‍व में हि‍न्‍दी के प्रचार का एक नया अध्‍याय शुरू हुआ. उन्‍होंने दक्षि‍ण भारत में राष्‍ट्रभाषा हि‍न्‍दी-प्रचार का काम प्रारम्‍भ कि‍या. महात्मा गाँधी ने मालवीय जी के हि‍न्‍दी-प्रचार की प्रशंसा करते हुए कहा था ‘’सबसे पहला अधि‍वेशन सन् 1910 में हुआ था. उसके सभापति‍ मालवीय जी महाराज ही थे. उनसे बढ़ कर हि‍न्‍दी-प्रेमी भारत वर्ष में हमें कहीं नहीं मि‍लेगा. कैसा अच्‍छा होता यदि‍ वह आज भी इस पद पर होते. उनका हि‍न्‍दी प्रचार-क्षेत्र भारतव्‍यापी है; उनका हि‍न्‍दी का ज्ञान उत्‍कृष्‍ट है.’’ काशी हि‍न्‍दू वि‍श्‍ववि‍दयालय में हि‍न्‍दी को सर्वप्रथम एक वि‍षय के रूप में मान्‍यता दिलाने वाले मालवीय जी ही थे. हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य के पुरोधा बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य रामचन्‍द्र शुक्‍ल, पं. अयोध्‍या सि‍हं उपाध्‍याय ‘हरि‍औध’ आदि‍ इसी वि‍श्‍ववि‍दयालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग के रत्‍न थे. इन्हें विश्वविद्यालय में चुनकर लाने का श्रेय मालवीय जी को ही है. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन में अपना अध्यक्षीय वक्तव्य रखते हुए हिन्दी के स्वरूप को लेकर उन्होंने जो कहा था उससे हिन्दी के प्रति उनकी समझ और निष्ठा का सहज ही अनुमान हो जाता है. वे कहते हैं कि, "उसे फारसी-अरबी के बड़े- बड़े शब्दों से लादना जैसे बुरा है, वैसे ही अकारण संस्कृत शब्दों से गूँथना भी अच्छा नहीं.” और भविष्यवाणी की कि “एक दिन यही भाषा राष्ट्रभाषा होगी." मालवीय जी को हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इंदौर अधिवेशन में शामिल होना था किन्तु वे शामिल न हो सके थे. उनकी अनुपस्थिति में महात्मा गाँधी ने स्वयं उनका पत्र 28 मार्च 1918 को सम्मेलन में पढ़कर सुनाया था. इस पत्र से हिन्दी के विषय में मालवीय जी के दृष्टिकोण को आसानी से समझा जा सकता है. पत्र का कुछ अंश निम्न है, “प्रिय भाई गाँधी जी, मुझे खेद है कि मैं अबतक हिन्दी के बारे में आपके पत्र का उत्तर न लिख सका. क्षमा कीजिए अवकाश नहीं मिला था. आपको तो मालूम ही है कि मेरा तो यह मत है कि हिन्दी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए. बहुत अंश में वह अब भी है. उर्दू, हिन्दी का एक विशेष रूप मात्र है. और कठिन संस्कृत, अरबी या फारसी के शब्द उसमें न लाए जाएं तो जो लोग उसको एक रूप में समझ सकते हैं वह दूसरे में भी समझ सकेंगे. ............ हमारे देश की दशा के सुधार और उन्नति के लिए हमारा सबसे बड़ा साधन विद्या है. यह अमृत है, जिसके सेवन करने से हमारे भाई-बहन फिर बलवान, धर्मवान, ज्ञानवान और धनवान हो सकते हैं. प्रजा में विद्या का प्रचार उसकी मातृभाषा के द्वारा ही हो सकता है. जिस प्रान्त में जो भाषा प्रचलित है, उस प्रान्त में उसी भाषा के द्वारा ऊँची से ऊँची शिक्षा देने का प्रबंध होना चाहिए. अंग्रेजी के द्वारा हमारा बहुत उपकार हुआ है, किन्तु हम अंग्रेजी के द्वारा पढ़े हुए लोगों को उचित था कि अबतक प्रत्येक प्रान्त की भाषा की ऐसी उन्नति करते कि उसी के द्वारा ऊँची जाति की शिक्षा हो सकती, क्योंकि बिना ऐसी शिक्षा के जातीय जीवन का वृक्ष न हरा- भरा और पुष्ट हो सकता है न रक्षित रह सकता है. इसलिए सब प्रकार से देशी भाषाओं का, विशेषकर हिन्दी भाषा का प्रचार करना हमारा धर्म है. जो लोग यह कहते या समझते हैं कि हिन्दी भाषा के द्वारा ऊँची से ऊँची शिक्षा नहीं दी जा सकती उनका यही प्रयोजन हो सकता है कि इस भाषा में आधुनिक ऊँचे -ऊँचे विषयों के ग्रंथ अभी नहीं लिखे गए. यह कमी अवश्य है, किन्तु इसको पूरा करने का प्रयत्न हो रहा है.” (उद्धृत, हिन्दी : राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक, विमलेशकान्ति वर्मा, पृष्ठ-52) मालवीय जी ने सन् 1931 में दूसरे गोलमेज सम्‍मेलन में भारत का प्रतिनिधित्‍व कि‍या था. महात्मा गाँधी ने उन्हें अपना बड़ा भाई और ‘भारत निर्माता’ कहा था. उन्होंने ही सम्मान में उन्हें ‘महामना’ की उपाधि से नवाजा था. पं. नेहरू ने लिखा है, “मालवीय जी ने अपना सारा वजन हिन्दुस्तानियत पर, भारतीयता पर डाला........ उस समय भी बहुत सारे लोग थे, बड़े विद्वान लोग थे, संस्कृति के बड़े पंडित लोग भी थे. पर जहाँ तक मेरा विचार है, राजनैतिक नेताओं में बड़े नेताओं में मालवीय जी ही शायद इस मामले में सबसे आगे थे. वे रोकते थे अंग्रेजियत की बाढ़ को, पर विरोध करके नहीं बल्कि अपने काम से, अपने विचारों से और कोशिश करते थे अपनी संस्कृति को बचाने की.” ( उद्धृत, मदनमोहन मालवीय, अशोक कौशिक, भूमिका से) मालवीय जी ने ही कांग्रेस के सभापति के रूप में सुझाया था कि ‘सत्यमेव जयते’ को भारत का राष्ट्रीय उद्घोष वाक्य स्वीकार किया जाय. उन्होंने हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गंगा आरती का आयोजन किया जो आज तक चल रहा है. प्रयागराज, लखनऊ, दिल्ली, देहरादून, भोपाल और जयपुर जैसे शहरों में मालवीय नगर के नाम से मुहल्ले हैं. जबलपुर में एक चौराहे का नाम मालवीय चौक है. उनके नाम पर आईआईटी खड़गपुर, आईआई रुढ़की, बिड़ला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान पिलानी आदि में छात्रावासों के नाम हैं. मदनमोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय गोरखपुर तथा मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान जयपुर का नामकरण उन्हीं के नाम पर किया गया है. 2001 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति मे डाक-टिकट जारी किया और 24 दिसंबर 2014 को भारत सरकार ने उन्हें ‘भारत रत्न’ जैसे सर्वोच्च सम्मान से विभूषित किया.

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