डॉ. नौटियाल के जवाब का प्रत्युत्तर
कल की मेरी पोस्ट पर डॉ. नौटियाल की विस्तृत प्रतिक्रिया आयी है. उनके कुछ समर्थकों की भी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. इस संबंध में मुझे दो-तीन बातें कहनी हैं.
1. डॉ. नौटियाल ने कहा है कि, “उन्होंने (मैंने) लेख में जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया है वह भाषा किसी विद्वान को शोभा नहीं देता. अस्तु यह उनकी शैली हो सकती है.”
निस्संदेह मेरी भाषा कहीं- कहीं अशालीन हो गई है. किन्तु यह मेरी शैली नहीं है. एक भ्रामक तथ्य को समाज में प्रमाण के रूप में प्रतिष्ठित होता देखकर कहीं- कही मेरी भाषा तल्ख हो गई है. यह लेख अब प्रकाशित हो चुका है और इसमें संशोधन की गुंजाइश नहीं रह गई है ऐसी दशा में मैं इसके लिए सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त करता हूँ.
इसके साथ ही मैं अपने लेख को अपेक्षित संशोधनों के साथ वैश्विक हिन्दी सम्मेलन के वेबसाइट पर पोस्ट करने के लिए भेज रहा हूँ और पाठकों से आग्रह करता हूँ कि वे कृपया इस संशोधित लेख को ही प्रमाण मानें.
2. डॉ. नौटियाल के अनुसार मैंने उनकी 2015 की शोध- रिपोर्ट को ही आधार बनाकर अपनी बातें कही हैं जबकि उनके पास 2021 की अद्यतन रिपोर्ट है जिसमें प्रामाणिक तथ्य और नवीनतम आंकड़े हैं और उन्हें ही विद्वानों ने एप्रूव किया है.
डॉ. नौटियाल का यह कथन सही है कि मैंने उनकी 2015 की शोध- रिपोर्ट को ही आधार बनाया है क्यों कि गुगल में खोजने पर वही मुझे उपलब्ध हुआ. कोई भी पाठक वही प्रक्रिया अपनाएगा जिसे मैंने अपनाया. इंटरनेट पर जब वही सुलभ है तो भला मैं बातें किसी अन्य रिपोर्ट की कैसे कर सकता था ? यदि डॉ. नौटियाल अपनी 2015 की शोध- रिपोर्ट से खुद असहमत हैं तो उसे वहाँ से हटा क्यों नहीं लेते ? या वहां लिख क्यों नहीं देते कि वे इस निष्कर्ष को अब नहीं मानते ?
वर्ष 2021 की जिस शोध- रिपोर्ट को डॉ. नौटियाल प्रामाणिक मानते हैं क्या उसके निष्कर्ष भिन्न हैं ? उसकी शोध-प्रक्रिया और अपनाए गए तथ्य अलग हैं ? इस संबंध में डॉ. नौटियाल की प्रतिक्रिया में कोई जिक्र नहीं है. यदि 2021 में प्रस्तुत शोध-रिपोर्ट, उसकी शोध-प्रक्रिया, अपनाए गए तथ्य तथा उनके विश्लेषण का ढंग पहले जैसा ही है तो निस्संदेह निष्कर्ष भी पहले जैसा ही निकलेगा और इस संबंध में मेरा कहना वही है जो मैंने अपनी कल की पोस्ट में कहा है.
3. डॉ. नौटियाल ने लिखा है, ठ श्री अमरनाथ जी ने केन्द्रीय हिन्दी संस्थान जैसी शीर्ष संस्था के भाषाविदों पर और राजभाषा विभाग के अधिकारी विद्वानों की योग्य्ता पर जो प्रश्नचिह्न लगाया है वह दुर्भाग्यपूर्ण है.ठ
मैंने अपनी पोस्ट दुबारा पढ़ी है और मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि मैंने के.हि.सं. के विद्वानों और राजभाषा विभाग के अधिकारी विद्वानों की योग्यता पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया है. आग्रह है कि डॉ. नौटियाल एक बार और मेरी पोस्ट पढ़ लें.
4. डॉ. नौटियाल ने अपना परिचय देते हुए कहा है कि, “विश्व में सर्वाधिक बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति के रूप में मेरी ख्याति है, हिन्दी साहित्य को दी गई 1777 प्रकाशित रचनाएं मेरी प्रतिष्ठा का प्रमाण हैं, मेरी दर्जनों पुस्तकें भारतीय विश्वविद्यालयों / स्वायत्त महाविद्यालयों में पाठ्य पुस्तक अथवा संदर्भ ग्रंथ के रूप में चल रही हैं....... मैंने 54 शोधार्थियों को पी-एच.डी. तथा एम.फिल. व कई शोध परियोजनाओं में हिन्दी शोधार्थियों का ही नहीं बल्कि प्राध्यापकों को मार्ग दर्शन दिया है. अत: शोध के सिद्धांत मैं भली भाँति जानता हूँ.”
इस संबंध में मुझे कहना है कि यदि डॉ. नौटियाल सामान्य विद्वान होते तो मैं उनके शोध-निष्कर्ष पर हर्गिज सवाल नहीं उठाता. उनका शोध कार्य पूरी दुनिया में हिन्दी की हैसियत निर्धारित करने वाला है. इसीलिए उसमें अगर कहीं कोई कमी है तो भाषा-प्रेमी, आलोचक और एक जिम्मेदार नागरिक होने के कारण उसपर प्रश्न उठाना मेरा फर्ज भी है और अधिकार भी.
डॉ. नौटियाल की जानकारी के लिए मैं भी अत्यंत विनम्रता पूर्वक बताना चाहता हूँ कि मैं भी जीवनभर अनुसंधान ही करता और कराता रहा हूँ. कलकत्ता विश्वविद्यालय की रिसर्च कमेटी का लगभग एक दशक तक अध्यक्ष रहा हूँ, पचीस साल तक पी-एच.डी. और एम.फिल. के शोधार्थियों को शोध-प्रविधि ( रिसर्च मैथेडोलॉजी) पढ़ाता रहा हूँ. दिल्ली, जेएनयू, बीएचयू, हैदराबाद, इलाहाबाद, लखनऊ, गोरखपुर आदि देश के अधिकाँश प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में शोध परीक्षक रहा हूँ, पीएच.डी और डी.लिट. के दो सौ से भी अधिक शोध- प्रबंधों का मूल्यांकन कर चुका हूँ, इसलिए मैं डॉ. नौटियाल की शोध-रिपोर्ट पर प्रश्न उठाने की योग्यता रखता हूँ.
5. डॉ. नौटियाल ने लिखा है कि, “समाचार पत्र में छपी सामग्री को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि श्री अमरनाथ जी हीनताबोध से ग्रसित हैं. अन्यथा अपने राष्ट्र की भाषा, अपनी भाषा और जो भाषा उन्हें रोजी रोटी दे रही है उसके बारे में इतने नकारात्मक विचार न रखते.” डॉ. नौटियाल के एक मित्र ने मुझे सुझाव दिया है कि, “उनकी ( डॉ. नौटियाल की) शोध-प्रविधि पर टीका-टिप्पणी करना बिलकुल उचित नहीं..... इतने बड़े डी.लिट्. उपाधिधारक विद्वान के शोध पर प्रश्न चिह्न उठाना उचित नहीं है...... आशा है श्री अमरनाथ जी डॉ. नौटियाल जी के नवीनतम शोध का अवलोकन करेंगे और भूल सुधार कर उनका साथ देंगे.” उनके एक दूसरे मित्र ने व्यंग्य किया है कि, “विद्वत्ता पर एकमात्र अध्यापकों का अधिकार है.” एक तीसरे मित्र ने बहुत नेक सुझाव दिया है, “यदि हिन्दी बोलचाल की भाषा में विश्व की सर्वाधिक बड़ी भाषा बन रही है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए...... यदि उन्होंने शोध-कार्य किया है और उसे 20 वर्षों से प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं तो हमें चाहिए कि हम उनके परिश्रम को भी गंभीरता से लेकर उसका जहाँ तक हो लाभ उठा सकें.” एक अन्य मित्र ने तो आरोप लगाया है कि, “किसी विचार पर नीचे गिरकर व्यक्तिगत टिप्पणी करना शोभा नहीं देता.”
मित्रो, आप सबके सुझाव बड़े नेक हैं और मैं इनपर अमल करने की कोशिश करूँगा. हाँ, आप सबकी सूचना के लिए यह जरूर कहना चाहता हूँ कि डॉ. नौटियाल से न तो मेरी कभी भेंट हुई है और न तो कभी बात-चीत ही हुई है. ऐसी दशा में उनपर व्यक्तिगत आरोप का कोई प्रश्न ही नहीं उठता.
मैं भी अपनी हिन्दी से आप सबकी तरह ही प्यार करता हूँ और हिन्दी की प्रगति और प्रतिष्ठा चाहता हूँ किन्तु मैं यह मानता हूँ कि हिन्दी को इस प्रगति और प्रतिष्ठा के लिये किसी झूठ का सहारा लेने की जरूरत नहीं है. वह इतनी सहज और समृद्ध भाषा है और उसके पास ऐसी वैज्ञानिक लिपि है कि हम यदि उससे प्यार करना सीख लें तो उसे अपना यथोचित स्थान पाने में कोई नहीं रोक सकता.
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