23 मार्च को ‘सांप्रदायिक सद्भाव दिवस’ के रूप में मनाया जाए

23 मार्च. भारत माता को खून से लथपथ कर देने वाला, उसका अंग भंग कर देने वाला ऐसा काला दिन जिसे हम बार-बार भूलने की कोशिश करते हैं किन्तु उसका वीभत्स रूप हमारे सामने बार बार उपस्थित होता रहता है. इसी दिन शहीदे आजम भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दी गई थी. इसी दिन पंजाब के मशहूर इंकलाबी कवि अवतार सिंह पाश को खालिस्तानी उग्रवादियों ने गोली मार दी थी और यही 23 मार्च का मनहूस दिन है जब 1940 में मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में मुसलमानों के लिए पृथक पाकिस्तान का प्रस्ताव पास किया था. इसी की परिणति में हमारे देश में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए और देश बँट गया. इन दंगों में लाखों निरपराधों, महिलाओं और बच्चों तक को बेरहमी से कत्ल किया गया और आज भी देश के किसी न किसी हिस्से में यह कत्लेआम जारी है. हम हर साल आजादी का जश्न मनाते हैं. जश्न मनाते- मनाते और विजय के गीत गाते- गाते हम भूल चुके हैं कि जिस मुल्क की आजादी हमें मिली उसे मजहब के नाम पर चंद जिद्दी नेताओं ने पद और कुर्सी के लिए तीन टुकड़ों में बाँट दिया. यह बँटवारा साधारण बँटवारा नहीं था. पाकिस्तान के लिए ‘कायदे आजम’ के खिताब से नवाजे गए मुहम्मद अली जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को जब धर्म के आधार पर देश बाँटने के लिए ‘डाइरेक्ट ऐक्शन डे’ का फरमान जारी किया तो पूरे बंगाल में मौत का तांडव मच गया. पूर्वी बंगाल का मुस्लिम बहुल जिला नोआखाली और पश्चिम बंगाल का महानगर कलकत्ता श्मशान बन गए. यहाँ हिन्दुओं का व्यापक कत्लेआम हुआ. मुस्लिम लीग के इशारे पर कलकत्ता में सिर्फ 72 घंटे में 20 हजार से अधिक लोगों का कत्ल हुआ था, तीस हजार से अधिक लोग घायल हुए थे और कई लाख बेघर हो गए थे. साप्रदायिकता का यह तांडव पूरे देश में साल भर चलता रहा-कहीं थोड़ा कम, कहीं ज्यादा. इस दौरान हुई हिंसा में कम से कम दस लाख लोगों को बेरहमी से काट दिया गया था या जलाकर मार डाला गया था. लगभग 1.45 करोड़ लोगों ने अपना पुस्तैनी घर परिवार छोड़कर अपने कभी न भरने वाले जख्मों के साथ अपने संप्रदाय वाले देश में जाकर शिविरों में शरण ली थी. 14 अगस्त 1947 को जिस समय जिन्ना कराँची में माउंटबेटन के साथ देश के बँटवारे और सत्ता हस्तांतरण का जश्न मना रहे थे और 15 अगस्त को पं. नेहरू लाल किले से तिरंगा फहरा रहे थे, तब भी देश के विभिन्न हिस्सों में कत्लेआम जारी था. उस समय महात्मा गाँधी कलकत्ता में सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए अनशन पर बैठे हुए थे. कहा जाता है कि ‘अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो’ की नीति का यह परिणाम था. किन्तु यदि हमारे रक्त में सांप्रदायिकता का जहर न घुला होता तो अंग्रेजों की वह चाल भला कैसे सफल हो पाती ? अंग्रेजों को इसका मौका किसने दिया ? मुस्लिम लीग को जनसमर्थन न मिलता तो भला जिन्ना अकेले क्या कर लेते ? और आज तो अंग्रेज नहीं है. सांप्रदायिकता से संबंधित खबरों से कोई दिन खाली रहता है क्या ? इतिहास की नाइंसाफी देखिए कि जिस व्यक्ति ने दो राष्ट्र के सिद्धांत को हवा दी, जो लाखों के कत्लेआम और देश को बाँटने के लिए जिम्मेदार था, उसे पाकिस्तान में ‘कायदे आजम’ कहा गया. पाकिस्तान हो या हिन्दुस्तान, सत्ता की कुर्सियों पर जो बैठे उन्हीं के बंशज आज भी आजादी का जश्न मना रहे हैं. किन्तु जिन्होंने विभाजन का दंश झेला; जिनके माता-पिता, भाई-वहन, पुत्र -पुत्रियों की हत्याएँ हुईं; जिनके जीवन भर की कमाई आग के हवाले कर दी गई; जिन्हें अपना पुस्तैनी घर, खेत- खलिहान सबकुछ छोड़कर पराए देश में खानाबदोश की तरह जाना और वर्षों रहना पड़ा; क्या वे विभाजन चाहते थे ? क्या आम जनता विभाजन चाहती है ? हुकूमत करने वालों ने हमारे ऊपर विभाजन लाद दिया और ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दीं कि हम विभाजन के अपने दर्द को हमेशा के लिए भूल जायँ और उनके सुख को अपना सुख समझते हुए केवल विजय के गीत गाएँ, केवल आजादी के जश्न मनाएँ जबकि आजादी के स्वाद से करोड़ों लोग कोसों दूर हैं. अली सरदार जाफरी के सवाल आज भी उत्तर की प्रत्याशा में भटक रहे हैं. “कौन आजाद हुआ ?/ किसके माथे से गुलामी की सियाही छूटी ? मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का / मादरे हिन्द के चेहरे पे उदासी है वही. कौन आजाद हुआ ?” धर्म के नाम पर लाखों लोग मरे, करोड़ो बेघर हुए, देश के तीन टुकड़े हुए किन्तु आज भी दोनो सांप्रदायिकताएँ फल-फूल रही हैं. दिन प्रतिदिन दोनो ही मजबूत हो रही हैं. देश अकेले लीगियों के कारण नहीं बँटा था. हिन्दू महासभा ने भी उनका समर्थन किया था. विनायक दामोदर सावरकर ने 1937 में अहमदाबाद में हुए हिन्दू महासभा के 19वें अधिवेशन में कहा था कि, “आज यह कत्तई नहीं माना जा सकता कि हिन्दुस्तान एकता में पिरोया हुआ राष्ट्र है, इसके विपरीत हिन्दुस्तान में मुख्यत: दो राष्ट्र हैं, हिन्दू और मुसलमान.” ( वीडी सावरकर, समग्र सावरकर वांग्मय : हिन्दू राष्ट्र दर्शन, अंक-6, महाराष्ट्र प्रांतिक हिन्दू सभा, पूना, 1963, पृष्ठ-296) इस तरह 23 मार्च 1940 को जब मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में जिन्ना ने मुसलमानों के लिए पृथक पाकिस्तान का प्रस्ताव रखा था तो उससे तीन साल पहले ही अहमदाबाद में वीडी सावरकर दो राष्ट्रों के सिद्धांत का अपना दृष्टिकोण रख चुके थे. इतना ही नहीं, अपने समर्थन में जिन्ना ने सावरकर के उक्त कथन का हवाला भी दिया था. बाद में जिन्ना के उक्त प्रस्ताव का सावरकर ने भी समर्थन किया था. नागपुर में 15 अगस्त 1943 को एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि, “दो राष्ट्रों के मुद्दे पर मेरा जिन्ना से कोई मतभेद नहीं है. हम हिन्दू अपने आप में एक राष्ट्र हैं और यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि हिन्दू और मुस्लिम दो अलग अलग राष्ट्र हैं.” प्रो. शम्सुल इस्लाम सही लिखते हैं कि, “आजादी के आन्दोलन के दौरान मुस्लिम राष्ट्रवादियों ने मुस्लिम लीग के बैनर तले और हिन्दू राष्ट्रवादियों ने हिन्दू महासभा और आरएसएस के बैनर तले इस स्वतंत्रता संग्राम का यह कहकर विरोध किया कि हिन्दू और मुस्लिम दो पृथक राष्ट्र हैं. स्वतंत्रता संग्राम को विफल करने के लिए इन हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवादियों ने अपने औपनिवेशिक आकाओं से हाथ मिला लिया ताकि वे अपनी पसंद के धार्मिक राज्य हिन्दुस्थान या हिन्दू राष्ट्र और पाकिस्तान या इस्लामी राष्ट्र हासिल कर सकें.” (अंग्रेजों से माफी मांगने वाले सावरकर वीर कैसे हो गये ? कृष्णकांत, thewirehindi.com, December 14,2019). आजादी की लड़ाई हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई सबने मिलकर लड़ी थी. किन्तु उसी दौरान मुस्लिम लीग का भी जन्म हो चुका था और हिन्दू महासभा का भी. इन दोनो सांप्रदायिक ताकतों के साथ देश का बहुमत नहीं था फिर भी आजादी के साथ अपना प्यारा देश तीन टुकड़ों में बँट गया और देश की आम अमन पसंद जनता कुछ न कर सकी. हालाँकि मुस्लिम लीगियों और हिन्दुत्ववादियों के धर्म आधारित द्विराष्ट्र सिद्धाँत की व्यर्थता उसी समय दुनिया के सामने उजागर हो गई जब 1971 में पाकिस्तान का विभाजन हो गया और एक मुस्लिम राष्ट्र दो टुकड़ों में बँट गया. इस्लाम उन्हें एक राष्ट्र के रूप में सिर्फ 23 वर्ष तक ही जोड़े रख सका और जातीयता ने उन्हें अलग होने को बाध्य कर दिया. दरअसल, नेशनलिटी का आधार धर्म नहीं, जातीयता होती है. और बकौल रामविलास शर्मा जातीयता के चार आधार होते हैं-सामान्य भाषा, सामान्य संस्कृति, सामान्य भौगोलिक क्षेत्र और सामान्य आर्थिक जीवन. बंगलादेश इस दृष्टि से एक जातीय क्षेत्र है और इसीलिए एक राष्ट्र है. उक्त सभी दृष्टियों से वह पाकिस्तान से भिन्न था. इसीलिए मजहबी समानता उसे एकता के सूत्र में अधिक दिन तक बाँध न सकी. जबकि भारत अपने धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के साथ और जातीयता के आधार पर संगठित होते हुए भी अटूट है. किन्तु आज फिर से देश की दशा 19वीं सदी के चौथे- पाँचवें दशक जैसी हो रही है. पिछले कुछ वर्षों में सांप्रदायिक ताकतें फिर से संगठित और मजबूत हुई हैं. हिन्दू राष्ट्रवादियों की निगाह में आज वे लोग भी देशद्रोही हैं जो सांप्रदायिकता का विरोध करते हैं और सेकुलर हैं. दूसरी ओर, 2020 में हुए बिहार के विधान सभा चुनाव में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन की जीत ने इस तथ्य को फिर से प्रमाणित कर दिया है कि किसी भी क्षेत्र में जब मुसलमानों की संख्या तीस-पैंतीस प्रतिशत से ज्यादा होती है तो वे सांप्रदायिक हो जाते हैं. धर्म की राजनीति करने वालों का आचरण और स्वभाव धार्मिक नहीं होता. जिन्ना अपने कर्म से मुसलमान नहीं थे. वे दाढ़ी नहीं रखते थे, नमाज पढ़ना नहीं जानते थे, शराब पीते थे और सूअर का मांस भी खाते थे. ( द्रष्टव्य, क्यों हिन्दू से मुस्लिम बन गए थे जिन्ना के पिता! hindi.news18.com, December 24,2018) इतना ही नहीं, जिन्ना आरंभ में कांग्रेसी थे. पक्के राष्ट्रवादी और ब्रिटिश साम्राज्य के शत्रु थे. रोलट एक्ट के खिलाफ लड़ने वालों में वे सबसे आगे थे. उन्होंने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा 30 मई 1939 को ही वसीयत लिखकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को दान कर दिया था. जाहिर है उस समय तक उनके मन में पाकिस्तान के रूप में किसी इस्लामिक राष्ट्र की कोई कल्पना नहीं थी. उन्होंने डॉ. इकबाल के पाकिस्तान के विचार को महज एक कवि का सपना करार दिया था. किन्तु समय के साथ वे धीरे- धीरे कट्टरपंथी बनकर उभरे. उनके विचारों में बदलाव परिस्थितियों के चलते धीरे- धीरे हुआ था. इसी तरह सबसे पहले ‘टू नेशन थ्योरी’ का सिद्धांत देने वाले डॉ. इकबाल के पूर्वज कश्मीरी पंडित थे और “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा” नामक मशहूर तराना उन्होंने 1904 में ही लिखा था. बाद में उन्होंने 29 दिसंबर 1930 को मुस्लिम लीग के इलाहाबाद में होने वाले 25वें वार्षिक अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण देने हुए भारत के भीतर एक मुस्लिम भारत की बात की. ठीक इसी तरह वीडी सावरकर भी पहले अंग्रेजों के कट्टर दुश्मन थे और नासिक जिले के कलक्टर जैकसन की हत्या के आरोपी के रूप में काला पानी की सजा काट चुके थे, किन्तु बाद में उन्हीं के नेतृत्व में हिन्दू महासभा ने 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध किया और हिन्दुओं को ब्रिटिश सशस्त्र बलों में शामिल होने का सुक्षाव दिया. असल में हर सचेत व्यक्ति अपने अध्ययन और अनुभवों से सीखता है, सबक लेता है और बदलता है. ऐसी दशा में हम हिन्दू और मुसलमान बच्चों के लिए ऐसी परिस्थितियाँ क्यों नहीं पैदा कर सकते कि वे हिन्दू और मुसलमान की जगह अच्छे इन्सान बन सकें ? हमारा समाज ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि सूर, तुलसी और मीरा के साथ कबीर, जायसी और रसखान की परंपरा भी साथ- साथ चले ? गाँधी, सुभाष और भगत सिंह के साथ सीमांत गांधी, मौलाना आजाद और ए.पी.जे अब्दुल कलाम को भी अपनी परंपरा में शामिल करते हैं तो क्या हम और अधिक समृद्ध नहीं हो जाते ? कायदे से होना यह चाहिए था कि हम आजादी के जश्न के साथ ही विभाजन की त्रासदी का गम भी मनाते. इससे हमें बार- बार याद आती रहती कि बँटवारा होता कैसे है, बँटवारे का दुख कैसा होता है. जापान पर 6 अगस्त 1945 को ऐटम बम गिरा था. जापान और कुछ याद करे या न करे उस मनहूस दिन को कभी नहीं भूलता. गत 6 अगस्त 2020 को भी कोरोना के आतंक के बावजूद जापान के लोग मास्क लगाए प्रार्थना सभा में एक जगह एकत्रित हुए, युद्ध की विभीषिका को और उसमें जान गँवाए अपने पूर्वजों को याद किया. कोरोना के बावजूद यह संख्या गत वर्षों की तुलना में सिर्फ 10 प्रतिशत कम थी. स्मरणीय है कि जापान पर हुए ऐटम बम के हमले में लगभग 80 हजार लोग मारे गए थे और लगभग 35 हजार घायल हुए थे. उससे सबक लेकर जापान ने हथियारों की होड़ से अपने को अलग कर लिया. जापान एक विकसित देश है. उसके पास पास सबकुछ है किन्तु परमाणु बम नहीं है. दूसरी ओर हम हैं कि दस लाख लोगों की जघन्य हत्या और करोड़ों के विस्थापन की पीड़ा ऐसे भूल गए जैसे पीड़ित करने जैसा कुछ हुआ ही न हो. इन परिस्थितियों में मेरा सुझाव है कि आगे से प्रतिवर्ष 23 मार्च को देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें ‘सांप्रदायिक सद्भाव दिवस’ के रूप में मनाएँ. इस अवसर पर हम अपनी पिछली गलतियों को शिद्दत से स्मरण करें ताकि हम अपने बच्चों के लिए एक सुन्दर, सद्भावपूर्ण समाज की नींव डाल सकें. यह शहीदे आजम भगतसिंह और उनके साथियों के लिए भी सच्ची श्रद्धाँजलि होगी.

Comments

Popular posts from this blog

सारस्वत बोध के प्रतिमान : आचार्य रामचंद्र तिवारी ( जनसंदेस टाइम्स में 4 जून को प्रकाशित )

नर्मदा घाटी की अखण्ड आवाज : मेधा पाटकर

पूजा में बलि- प्रथा