कथाकार काव्यालोचक : दूधनाथ सिंह

बलिया ( उ.प्र.) जिले के ‘सोबंधा गाँव’ में जन्मे, इलाहाबाद से पढ़े-लिखे और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे दूधनाथ सिंह ( 17.10.1936- 12.01.2018 ) मूलत: कथाकार हैं, किन्तु निराला, महादेवी और मुक्तिबोध का विस्तृत मूल्यांकन करके आलोचना के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है. ‘निराला : आत्महंता आस्था’, ‘महादेवी’, ‘मुक्तिबोध : साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ’ उनकी बहुचर्चित आलोचनात्मक कृतियाँ है. ‘कहा-सुनी’ में उनके साक्षात्कार हैं जिनमें उनकी आलोचनात्मक मान्यताएं भी मुखरित हुई हैं. पंत के बारे में दूधनाथ सिंह ने लिखा है, “एक लेखक समय के समग्र शिल्प में जीवित रहता है. उसके किसी एक भाग में नहीं. जो लेखक समय के समग्र शिल्प में जीवित नहीं रहता उसकी विकलांगता निश्चित है.” किसी भी रचनाकार के मूल्यांकन के लिए दूधनाथ सिंह का यह कथन कसौटी की तरह है. दूधनाथ सिंह का अपना सृजन भी उनके इस कथन का प्रमाण है. निश्चित रूप से समय की कसौटी पर खरा उतरने के लिए ही उन्होंने ‘आखिरी कलाम’ जैसे उपन्यास का प्रणयन किया. ‘निराला : आत्महंता आस्था’ दूधनाथ सिंह की सर्वाधिक चर्चित आलोचना कृति है. अपनी इस कृति के बारे में वे स्वयं लिखते हैं, “शायद कुछ लोगों को भ्रम हो कि मैने अपनी पुस्तक में निराला को आत्महंता सिद्ध करने की कोशिश की है. ऐसा कुछ नहीं है. दरअसल कला और रचना को लेकर मेरी एक व्यक्तिगत धारणा है. मुझे लगता है कि एक बार पूरी तौर पर रचना के प्रति अपने समर्पण के बाद व्यक्ति कोई भी दूसरी जिम्मेदारी सच्चे मायने में और मुकम्मल तौर पर नहीं निभा सकता. वह कोशिश कर सकता है, वह संतुलन बनाए रखने का उत्कट प्रयत्न कर सकता है लेकिन अक्सर वह अपने को इसमें असफल पाता है. इसके लिए उसे दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता. कला रचना के प्रति एकांत समर्पण की अंतिम परिणति यही होती है. यह जीभ पर अपने ही खून का स्वाद लगने की तरह है. यह लगातार, अनवरत, निरंतर अपने को ही खाते रहना है. इस आत्म-बुभुक्षा से सच्चे और मौलिक रचनाकार की कहीं कोई मुक्ति नहीं है. इसी में वह सृजन के सघन क्षणों को रचना में मूर्त करता है.” ( आत्महंता आस्था -भूमिका से ) दूधनाथ सिह द्वारा की गई निराला की कविताओं की समीक्षा के बारे में ए. अरविन्दाक्षन ने लिखा है कि “ वह निराला की रचनाओं का विश्लेषण भर नहीं है. वह निराला की कविताओं के अंतस को खोजने वाली रचना है. दरअसल वे निराला की कविता के सौन्दर्य को एक शिल्पी की तरह गढ़ रहे हैं. एक शिल्पी अपनी शिल्प- रचना में सौन्दर्य का ही आह्वान करता है, शिल्प सापेक्ष सौन्दर्य का आह्वान. दूधनाथ सिंह के आह्वान में शिल्प- सापेक्ष सौन्दर्य के आह्वान के अतिरिक्त एक कॉस्मिक सौन्दर्य का संगुंफन भी मिलता है. यही उनके लावण्य- चिन्तन की खूबी है. अपनी आलोचना में वे न निराला को महिमा मंडित करते हैं और न उन्हें अतिशय उदारता के शिखर तक पहुँचा देते हैं. दूधनाथ सिंह यह जरूर चिह्नित करते हैं कि काल की सामान्य परिगणना से परे जाने वाली निराला द्वारा परिकल्पित काल-परिगणना है जो उनकी कविताओं को सार्वकालिकता और सार्वभौमिकता प्रदान करती है और वही उनके कॉस्मिक रेंज का निदान है. “ ( पक्षधर, अंक- 24, पृष्ठ-158) दूधनाथ सिहं ने निराला की रचनात्मकता के बारे में लिखा है, “ निराला की काव्यात्मक उपलब्धि उनकी शुरुआतों का कहीं अन्त न होना ही है. उनकी कविता का सजग –सचेत अंत कहीं नहीं होता. वह लगातार अपनी अर्थ- छवियों और अपनी ‘पीन-मधु‘ से पाठक को आन्दोलित करती चलती है और सर्वथा नए असंतोष का सृजन करती है. इस रूप में निराला का कहीं भी अंत नहीं होता. उनकी रचनात्मकता का कोई अंतिम पूर्णविराम नहीं है.” निराला की बहुत सी रचनाएं प्रगतिशील-दृष्टि संपन्न हैं. ‘कुकरमुत्ता’ आदि इसके उदाहरण हैं. इसी आधार पर आलोचकों ने निराला पर मार्क्सवाद का प्रभाव देखा है. दूधनाथ सिंह की इससे असहमति है और वे इसे उनके व्यक्तित्व का मनुष्योन्मुखी पक्ष मानते हैं. एक बात और. दूधनाथ सिंह की आलोचना में उनका रचनाकार प्रभावी ढंग से उनपर हर कहीं छाया हुआ है. ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’, ‘सुखान्त’, ‘प्रेमकथा का अन्त न कोई’, ‘पहला कदम’, ‘माई का शोकगीत’, ‘नमो अन्धकारं’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘तू फू, ‘जलमुर्गियों का शिकार’ उनके कहानी संग्रह हैं. ‘आखिरी कलाम’, निष्कासन’ उनके उपन्यास है, ‘यमगाथा’ उनका नाटक है, ‘अपनी शताब्दी के नाम’, ‘एक और भी आदमी है’, ‘युवा खुशबू’, ‘सुरंग से लौटते हुए’, ‘तुम्हारे लिए’, ‘एक अनाम कवि की कविताएं’, उनके काव्य संग्रह हैं, ‘लौट आ ओ धार’, ‘सबको अमर देखता हूँ’ उनके संस्मरण हैं और ‘कहा- सुनी’ उनका साक्षात्कार है.

Comments

Popular posts from this blog

सारस्वत बोध के प्रतिमान : आचार्य रामचंद्र तिवारी ( जनसंदेस टाइम्स में 4 जून को प्रकाशित )

नर्मदा घाटी की अखण्ड आवाज : मेधा पाटकर

पूजा में बलि- प्रथा