उर्दू की नई आलोचना के प्रमुख स्तंभ- शम्सुर्रहमान फारुकी

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में जन्मे, गोरखपुर में पले बढ़े और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. करके कुछ दिन अध्यापन करने के बाद आई.ए.एस. बनकर पोस्ट मास्टर जनरल के पद से अवकाश ग्रहण करने वाले शम्सुर्रहमान फारुकी ( 30.9.1935-25.12.2020) का उर्दू की नई आलोचना में विशेष स्थान है. क्लासिक्स के प्रति गहरा अनुराग होने के बावजूद वे आधुनिक साहित्य और आलोचना पद्धति के प्रति बहुत सजग हैं. उन्होंने साहित्यिक आलोचना के पश्चिमी सिद्धांतों को आत्मसात किया और बाद में उन्हें उर्दू साहित्य में लागू किया. उन्हें उर्दू आलोचना का टी.एस.इलियट कहा जाता है. काव्य समीक्षा के सभी पहलुओं पर फारुकी साहब की नजर गई है और उन्होंने उसकी बारीकी से जाँच- पड़ताल की है. हिन्दी और उर्दू में प्रगतिशील आन्दोलन एक साथ विकसित हुए थे. शम्सुर्रहमान फारुकी जैसे विद्वान साहित्यकार उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि से अपरिचित हों-यह असंभव है किन्तु एक प्रतिष्ठित नौकरशाह का जीवन जीते हुए समाज के शोषित वर्ग की पीड़ा और आकाँक्षा उन्हें प्रभावित न कर सकी हो, यह स्वाभाविक ही है. उनके पास वर्ग- संघर्ष की वैज्ञानिक दृष्टि का अभाव है. प्रेम कुमार नजर से एक बातचीत में उन्होंने मीर के एक शेर का जिक्र किया है और कहा है कि अली सरदार जाफरी जैसे साहित्यकारों नें भी इसकी गलत व्याख्या की है. मीर का वह शेर है, “अमीरजादों के लड़कों से मत मिला कर मीर, कि हम गरीब हुए हैं इन्हीं की दौलत से.” इसपर टिप्पणी करते हुए फारुकी कहते हैं- “तो दौलत का मतलब लोगों ने धन-दौलत से निकाल लिया जो कि गलत है. यहाँ दौलत का मतलब बदौलत से है यानी इनकी वजह से. लेकिन इसे दौलत से जोड़ दिया गया. जाफरी साहब ने कहा कि ये गरीब और अमीर तबके के बारे में कहा गया है, जबकि ऐसा था नहीं.” जाफरी साहब प्रगतिशील हैं और उन्होंने अपनी नजर से बिलकुल ठीक कहा है. वैज्ञानिक समाजवाद मानता है कि धन का असमान बँटवारा भूख और गरीबी की मुख्य जड़ है. हजारों झोपड़ियों की कब्र पर ही एक अट्टालिका निर्मित होती है. शम्सुर्रहमान फारुकी ने प्रगतिवादी आलोचना की सीमाओं की ओर संकेत किया और आत्म-व्यग्रता, स्वप्न-भंग, संप्रेषणीयता की समस्या आदि को नई आलोचना की विशेषताओं के रूप में रेखांकित करते हुए उनका विश्लेषण किया. इसी विषय पर उनका एक निबंध ‘आधुनिक समाज का मनुष्य तन्हाई के वीराने में’ शीर्षक से प्रकाशित है. फारुकी साहब के मशहूर लेख ‘शेर,गैर शेर और नस्र‘ को लोगों ने नई आलोचना का घोषणा पत्र कहा है. इसमें उन्होंने शेर और नस्र की विशेषताओं का विस्तार से विश्लेषण किया है. शम्सुर्रहमान फारुकी ने अपनी पुस्तक ‘अफसाने की हिमायत’ में कहानी को कविता की तुलना में दूसरे दर्जे का माना है. उनकी इस स्थापना पर कई लोगों ने एतराज किया है जो स्वाभाविक भी है. फारुकी साहब की आलोचना की सीमाओं की ओर संकेत करते हुए शाफे किदवई लिखते हैं, “ शम्सुर्हमान फारुकी के आलोचनात्मक ज्ञान और उनकी तर्कसंगत अभिव्यक्ति शैली की परिपक्वता में संदेह नहीं, मगर एक तो आकार संबंधी अनिवार्यता पर हद से ज्यादा आग्रह, दूसरे उन्होंने साहित्य को अधिक विस्तीर्ण साँस्कृतिक विमर्श के एक अंग के तौर पर स्वीकार नहीं किया, इस लिहाज से साँस्कृतिक अर्थविषयक सरोकार पसे-पुश्त जा पड़े और उनकी आलोचना बड़ी हद तक याँत्रिक और एकांगी हो गई.” ( बीसवीं शताब्दी में उर्दू साहित्य, पृष्ठ- 247) शम्सुर्रहमान फारुकी की आलोचना में अनुसंधान के तत्व भी है और इतिहास के भी. इतिहास में उनकी गहरी रुचि है. वे अपनी स्थापनाएँ देने से पहले उसे भली- भाँति जाँच-परख कर लेते हैं और पूर्ण रूप से संतुष्ट हो जाने के बाद ही उसे स्थापित करते हैं. उदाहरणार्थ अनेक तर्कों और प्रमाणों से पुष्ट करने के बाद वे लिखते हैं, “ अत: अमीर खुसरो और शेख खूब मुहम्मद चिश्ती, उर्दू काव्यशास्त्र के प्रथम सिद्धांतकार ठहरते हैं.” ( उर्दू का आरंभिक युग, पृष्ठ- 77) इसी तरह कविता के स्वभाव का विश्लेषण करते हुए सनअती के हवाले से वे कहते हैं, “ इस प्रकार सनअती यह सिद्धांत बताते हैं कि कविता में देशी हवा और रंग होना चाहिए. न बहुत अधिक संस्कृत, न बहुत अधिक फारसी. लेकिन छन्द-अलंकार, कलात्मक गूढ़ता और शिल्प की जगह फिर भी है. सनअती की नजर में कविता मनुष्य के तमाम कामों से बढ़कर है. इसमें बेहिसाब हुनरमंदी है और यह किसी बाहरी सत्ता के सामने नहीं झुकती. यह न संस्कृत के आगे घुटने टेकती है, न फारसी –अरबी के आगे. प्राचीन उर्दू साहित्यिक कव्यशास्त्र के बारे में संभवत: सबसे अधिक ध्यान देने योग्य और महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें हर जगह आजादी और आत्मनिर्भरता का वातावरण पाया जाता है. सैद्धांतिक स्वतंत्रता की यह परंपरा दकन में उसके अन्तिम बड़े क्लासिकी साहित्यकार मौलाना बाकर आगा ( 1745-1806) तक लगातार बनी रही.” ( उपर्युक्त पृष्ठ- 82) हिमांशु बाजपेयी ने उनके बारे में लिखा है, “उनको देखो तो एक आदमी नहीं दिखाई देता था बल्कि नज़र आता था कि जैसे ज्ञान का कोई महासागर लहरा रहा है या इल्म का कोई हिमाला है जो अपने अनगिनत उच्च शिखरों के साथ हमेशा से क़ायम है और हमेशा क़ायम रहेगा. उनकी शख़्सियत मानो कई सदियों पर फैली है. उनके आर-पार आती-जाती है. जब वो मीर पर, ग़ालिब पर, आचार्य मम्मट पर, कालिदास पर, मुंशी नवल किशोर पर, मोहम्मद हुसैन आजाद पर बात करते थे या लिखते थे तो लगता था कि जैसे ये सब उनके समकालीन थे, मानो उनके क़रीबी और अज़ीज़ हैं. ये बात जो अमूमन अतिशयोक्ति-सी लगेगी, सिर्फ़ एक ही शख़्स के लिए सच हो जाती है, वो थे शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी. वो एक ऐसे आलोचक, कहानीकार, संपादक और शायर थे जिन्होंने उर्दू के साहित्य और इतिहास को अपने अंदर ज़िंदा कर लिया था.” उनकी आलोचना के वितृत फलक पर टिप्पणी करते हुए सफदर इमाम कादरी ने लिखा है, “कविता, पुस्तक समीक्षा और सैद्धांतिक विषय- वस्तु पर आरंभिक काल में उन्होंने अधिक ध्यान दिया था. मगर धीरे- धीरे वे अलंकार शास्त्र, भाषा विज्ञान, कथा साहित्य विवेचना के साथ शब्दकोश विज्ञान, मुहावरा विधान और भाषा शुद्धीकरण तक की भूली-बिसरी कहानियों तक आए. उर्दू के साथ फारसी और अंग्रेजी में उनका लगभग समान अधिकार था. इसका उन्होंने लाभ उठाया और इससे अपने लेखन को विस्तार दिया.” ( हमारी पीढ़ी ने शम्सुर्रहमान फारुकी को कैसे देखा, ‘सबलोग’, 31 दिसंबर 2020) हसन जमाल ने गोपीचंद नारंग और शम्सुर्हमान फारुकी के बीच चलने वाले शीतयुद्ध पर चुटकी लेते हुए लिखा है, “उर्दू अदब व तन्कीद में दो खेमे साफ तौर पर नजर आते हैं. एक खेमा प्रो. गोपीचंद नारंग का है, दूसरा शम्सुर्हमान फारुकी का है और परस्पर आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं. मजे की बात यह है कि कभी दोस्त रहे दोनो हजरात जाती तौर पर एक –दूसरे को सराहते हैं, मगर रकाबत का जबा तो है ही, जो छुपाए नहीं छुपता है. प्रो. गोपीचंद नारंग का पलड़ा इसलिए भारी है कि वो फारुकी साहब के बरक्स जरूरतमंदों को नवाजने में बड़े माहिर हैं.”(pahalpatrika.com/frontcover/getrecord/49. दिसंबर 2013) उन्होंने गालिब, मीर तकी ‘मीर’, अनीस, दर्द और इकबाल पर विस्तार से लिखा है और उन्हें मौलिक ढंग से तथा नई सूझ- बूझ के साथ पेश किया है. उनकी पुस्तक ‘शेर-ए-शोर अंगेज’ तीन जिल्दों में है और उसके कई संस्करण हो चुके हैं. इसमें मीर तकी ‘मीर’ की रचनाओं का संपादन करते हुए उन्होंने उसकी विस्तृत समीक्षा की है. ‘जदीद उर्दू तन्कीद’, ‘फारुकी के तबसरे’, ‘लफ्ज –ओ-माअनी’, ‘अरुज, आहंग और बयान’, ‘दरसे बलागत’, ‘अन्दाज-ए-गुफ्तगू क्या है!’, ‘अफसाने की हिमायत में’ ‘उर्दू का आरंभिक युग’, ‘अकबर इलाहाबादी पर एक और नजर’, ‘हाउ टू रीड इकबाल’, ‘तफहीम-ए-गालिब’, ‘गालिब पर चार तहरीरें’, ‘आइना-ए-बलागत’, ‘द फ्लावर-लिट् रोड : एस्सेज इन उर्दू लिटरेरी थियरी एंड क्रिटिसिज्म’ आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं. उनकी आलोचनात्मक कृति ‘तनकीदी अफकार’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया है. उनकी कृति ‘कई चाँद थे सरे आसमाँ’ बहुत मशहूर हुई. ‘कब्ज-ए-जमाँ’, ‘अजब सह्र बयाँ था’, ‘द सन दैट रोज फ्राम द अर्थ’, ‘द मिरर ऑफ ब्युटी’( कई चाँद थे सरे आसमाँ का अंग्रेजी अनुवाद), ‘मजलिस-ए-अफक में परवाना सान’, ‘खुर्शीद का सामान-ए-सफर’, ‘गंजे सोख्ता’, ‘सवार और दूसरे अफसाने’ आदि उनकी अन्य रचनात्मक पुस्तकें हैं. साहित्यिक पत्रिका ‘शबखून’ का उन्होंने संपादन किया था. उन्हें दास्तानगोई शैली के पुनरुद्धार का श्रेय दिया जाता है. सहज ही पूछा जा सकता है कि हिन्दी के आलोचकों की इस श्रृंखला में शम्सुर्रहमान फारुकी जैसे उर्दू के आलोचकों का जिक्र क्यों? इस प्रश्न का उत्तर हम अवसर आने पर अन्यत्र विस्तार से देंगे. यहाँ मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि हिन्दी-उर्दू एक ही भाषा की दो शैलियाँ हैं और दोनो शैलियों का साहित्य एक ही जाति अर्थात् हिन्दुस्तानी जाति का साहित्य है. इसलिए अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को समग्रता में समझने के लिए हमें अपने साहित्य की दोनो परंपराओं का अध्ययन करना होगा. इस संबंध में शम्सुर्रहमान फारुकी की धारणा से हम पूरी तरह सहमत हैं. वे लिखते हैं, “हिन्दी/उर्दू साहित्य के इतिहास के नाम से आज तक जो धारणाएँ हमारे देश में प्रचलित हैं, उनका बड़ा हिस्सा केवल नामकरण के संयोग पर आधारित है. हम लोग इस बात को अक्सर भूल जाते हैं कि जिस भाषा को आज हम उर्दू कहते हैं, पुराने जमाने में उसी भाषा को हिन्दवी, हिन्दी, देहलवी, गुजरी, दकनी और फिर रेख्ता कहा गया है और ये नाम लगभग उसी क्रम से प्रयोग में आए, जिस क्रम से मैंने इन्हें दर्ज किया है. यह जरूर है कि इस भाषा का जो रूप दकन ( दक्षिण) में बोला और लिखा जाता था, उसे सत्रहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के लगभग मध्य तक दकनी ही कहते थे. और उत्तर भारत में एक बड़े समय तक रेख्ता और हिन्दी दोनो ही इस भाषा के नाम की हैसियत से साथ- साथ इस्तेमाल होते रहे.” ( उर्दू का आरंभिक युग, पृष्ठ-11) उन्हें बिड़ला फाउंडेशन का सरस्वती सम्मान भी मिला था और पद्मश्री भी.

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