तेभागा की रानी माँ : इला मित्र
प. बंगाल में 35 साल तक लगातार शासन करने वाली वाम मोर्चे की सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि थी भूमि सुधार. भूमि सुधार से चंद जमींदारों और भूस्वामियों के कब्जे से जमीन निकलकर जोतने वाले किसानों के हाथ में विकेन्द्रित हो गई. जोतने वालों को जमीन के स्वामित्व के सुख का एहसास हुआ. बटाईदार और अधियार किसानों की किस्मत बदल गई. बेदखली का खतरा हमेशा के लिए खत्म हो गया. उत्पादन में बेतहासा वृद्धि हुई. बंगाल के जिस 1943 के अकाल में लाखों लोग भूख से मर गए थे वह बंगाल खाद्यान्न के मामले में आत्म निर्भर बन गया.
बंगाल के इस भूमि सुधार के तार किसी न किसी रूप में तेभागा किसान आन्दोलन से जुड़े हैं. कहा जाता है कि कोई भी आन्दोलन व्यर्थ नहीं जाता. सन् 1947 की आजादी की सफलता के पीछे सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम का अनुभव भी काम कर रहा था. ठीक इसी तरह बंगाल के किसानों के हक में हुआ भूमि सुधार, वास्तव में किसानों के द्वारा लड़ी गई लंबी लड़ाई का नतीजा था. इस लड़ाई की शुरुआत तेभागा के किसान आन्दोलन से हुई थी जिसका नेतृत्व बंगाल के एक बड़े जमींदार की बेटी और एक बड़े जमींदार की बहू इला मित्र (18.10.1925-13.10.2002) ने किया था. पीड़ितों और दबाए गए लोगों के अधिकार के लिए लड़ने और इसी क्रम में डीक्लासीफाई होते जाने के ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं.
इला मित्र अविभाजित बंगाल के एक लेखाधिकारी की बेटी थीं. 1944 की ग्रेजुएट थीं. बंगाल प्रेसीडेंसी की जूनियर चैंपियन एथलीट थीं. बॉस्केट बॉल की मशहूर खिलाड़ी थीं. 1940 में जापान में संपन्न होने वाले ओलंपिक खेल में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चयनित किन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के कारण खेल स्थगित होने के कारण भाग लेने से वंचित थीं. बंगाल के प्रतिष्ठित जमींदार परिवार की बहू होने के बावजूद इला मित्र अपने ही वर्ग के खिलाफ लड़ने वाले किसानों के हक की लड़ाई का नेतृत्व करने लगीं. इस कारण उनकी गिरफ्तारी हुई. थाने में पुलिस द्वारा उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं. न्यायालय द्वारा उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली. किसान इन्हें सम्मान से ‘रानी माँ’ या ‘बधू माँ’ कहकर पुकारते थे. उन दिनों के सामाजिक परिवेश को देखते हुए यह सब अविश्वसनीय सा लगता है.
इला मित्र का जन्म अविभाजित बंगाल के जेस्सोर जिला के सबडिविजन जेनिदह के बागुटिया नामक गांव में 18 अक्टूबर 1925 को हुआ था. इला के पिता नगेन्द्रनाथ सेन बंगाल के एकाउंटेंट जनरल के कार्यालय में लेखाधिकारी थे. इला ने कलकत्ता के प्रसिद्ध बेथून स्कूल व बेथून कॉलेज से पढ़ाई की और 1944 में बांग्ला साहित्य से बी.ए. ( ऑनर्स ) किया.
इला की शादी 1940 में मालदह जिले के रामचंद्रपुर ( संप्रति बंगलादेश ) में एक प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में हुई. उनके पति रमेन्द्रनाथ मित्र मालदह के कम्युनिस्ट आन्दोलन से जुड़े थे और उस दौरान वे मालदह जिला के किसान सभा के अध्यक्ष थे. अपने पति के माध्यम से इला ने अविभाजित उत्तर बंगाल के किसानों के शोषण और उनकी दयनीय दशा के बारे में जाना. विवाह के पहले से वे कम्युनिस्ट पार्टी के छात्र संगठन (एस.एफ.आई.) तथा महिला आत्मरक्षा समिति से जुड़ी थीं. इतना ही नहीं, अपने विद्यार्थी जीवन में ही 18 वर्ष की उम्र में वे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( सी.पी.आई.) की सदस्य बन चुकी थीं. पीड़ितों के हक के लिए हर क्षण लड़ने को तैयार रहने वाली इला मित्र ससुराल में भी अपने पति के साथ कम्युनिस्ट आन्दोलन में सक्रिय हो गईं. इला जी ने नचोल क्षेत्र में पार्टी के निर्देश पर किसान संगठन का काम अपने हाथ में ले लिया. उन्ही दिनों देश में विभाजन के पूर्व के भयंकर साम्प्रदायिक दंगे हुए. इला मित्र ने शान्ति स्थापना के लिए महात्मा गांधी के साथ दंगों से प्रभावित क्षेत्रों की यात्राएं कीं. अब वे घर की चहारदीवारी तोड़कर पूरी तरह अपने को सामाजिक कार्यों में झोंक चुकी थीं. वे गांधी जी तथा अन्य हिन्दू - मुस्लिम नेताओं के साथ शान्ति- स्थापना के लिए नोआखाली भी गईं, जो सांप्रदायिक दंगों से सबसे ज्यादा प्रभावित था.
जिस समय देश आजाद हुआ उन दिनों इला जी तेभागा किसान आन्दोलन का नेतृत्व कर रही थीं. तेभागा का तात्पर्य है तीन भाग. उस क्षेत्र के किसानों की मांग थी कि फसल की उपज का तीन भाग होना चाहिए जिसमें से दो भाग जोतने वाले किसानों के हिस्से में और एक भाग जमीन के मालिक जमींदार के हिस्से में जाना चाहिए. दरअसल वहां जमींदारी प्रथा में जमीन थोड़े से भूस्वामियों के पास थी. बाकी लोग भूमिहीन थे. भूमिहीन किसानों की दशा बंधुआ मजदूरों जैसी थी. खेतों में फसल पैदा करने का काम तो वे करते थे किन्तु फसल का आधा हिस्सा भूमि का मालिक हथिया लेता था और इसके बावजूद जब चाहे वह अपना खेत वापस ले सकता था. उन दिनों उन्नत तकनीक के अभाव, उन्नत बीज के अभाव, रासायनिक खादों और सिचाई के साधनों के अभाव के चलते पैदावार बहुत कम होती थी. उपज का आधा हिस्सा पाने पर किसानों की लागत ही नहीं निकल पाती थी और उनके सामने भुखमरी की समस्या आती रहती थी. दूसरी ओर किसानों को यह डर हमेशा सताता रहता था कि जमीन का मालिक कभी भी अपना जमीन उनसे वापस ले सकता था. इस तरह पीड़ित किसानों की वह लड़ाई उनके जीवन- मरण का हिस्सा थी.
यह तेभागा आन्दोलन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की बंगाल इकाई के भूमिहीन किसान संगठन के नेतृत्व में शुरू हुआ था. 1946 में यह आन्दोलन अपने चरम पर था. उत्तर बंगाल के जलपाइगुड़ी, मालदह, दिनाजपुर, राजशाही, रंगपुर, बोगरा और पबना जिलों के विस्तृत क्षेत्र में यह आन्दोलन चल रहा था. बाद में जेस्सर, खलना और 24 परगना जिलों में भी यह आन्दोलन फैल गया. यह आन्दोलन दिनाजपुर जिले में एक स्थानीय कम्युनिस्ट नेता रूप नारायन रॉय द्वारा शुरू किया गया था जो स्वयं एक जमींदार भी थे. रूप नारायन रॉय सन् 1946 में बंगाल की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पहले और अकेले विधायक निर्वाचित हुए थे.
अभी यह आन्दोलन चल ही रहा था और हजारों किसान तथा किसान नेता जेलों में थे तभी देश का बंटवारा हो गया. दुर्भाग्यवश मित्रा परिवार के मालदह जिले की जमींदारी पूर्वी पाकिस्तान के हिस्से में आ गई. विभाजन के बाद मालदह जिले के पांच पुलिस थाना क्षेत्र (नवाबगंज, भोलाहाट, शिवगंज, नचोल और गोमोस्तपुर) पाकिस्तान के राजशाही जिले मे शामिल कर लिए गए. इला मित्र के परिवार ने पूर्वी पाकिस्तान में रहने का फैसला किया. इनकी जमींदारी का बड़ा हिस्सा राजशाही जिले में पड़ता था. इसका एक कारण यह भी था कि इला मित्र के परिवार की जमींदारी के क्षेत्र में ज्यादातर हिन्दू, आदिवासी और संथाल लोग थे. इला मित्र के परिवार के पूर्वी पाकिस्तान में रहने से उनके क्षेत्र के हिन्दू गरीबों को बहुत बल मिलने वाला था. 14 अगस्त 1947 को इला मित्र के पति रमेन्द्रनाथ मित्र ने रामचंद्रपुर गांव में पाकिस्तानी झंडा फहराकर पूर्वी पाकिस्तान के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की. इनके घर से थोड़ी दूर पर एक विद्यालय भी खोला गया था जिसमें गांव वालों की मांग पर बधूमाता ( इला मित्र ) पढ़ा रही थीं. मात्र तीन विद्यार्थियों से शुरू होने वाले इस विद्यालय में एक वर्ष के भीतर ही 55 विद्यार्थी हो गये थे. उन्होंने अपने गांव से निरक्षरता खत्म करने की प्रतिज्ञा ली थी. उनका उद्देश्य सबके लिए शिक्षा का था, खास तौर पर लड़कियों के लिए शिक्षा का उद्देश्य तय करना उन दिनों सामान्य घटना नहीं थी. इला मित्र इस क्रान्तिकारी लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ने लगीं. धीरे- धीरे इस विद्यालय के माध्यम से उनके संपर्क में जमींदारों के अधियार प्रथा से पीड़ित भूमिहीन किसान बड़ी संख्या में आने लगे.
देश विभाजन के बाद 1948 में कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति पाकिस्तान सरकार के सख्त रवैये के कारण वहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने भूमिगत होकर कार्य करने का निर्णय लिया. इला मित्र सहित सभी नेताओं को भूमिगत हो जाने को कहा गया. इला मित्र उन दिनों गर्भवती थीं. वे छिपकर बार्डर पार करके कलकत्ता आ गईं और यहां अपने बेटे मोहन को जन्म दिया. इसके बाद उन्होंने अपने बेटे को अपनी सास के पास रामचंद्रपुर में छोड़ा और तीन-चार सप्ताह बाद फिर से अपने पति के साथ नचोल किसान आन्दोलन में शामिल हो गईं. नचोल क्षेत्र में चांदीपुर, कृष्नापुर, केंदुआ, घामिरा, शिवनगर, मांडा, गोलापाड़ा, मालिकपुर, कालूपुर तथा महीपुर क्षेत्र तेभागा आन्दोलन से सर्वाधिक प्रभावित था. इस क्षेत्र में धीरे- धीरे यह नारा प्रचलित हो गया कि “लंगल यार, जमीं तार” यानी, जमीन जोतने वाले की. कहीं- कहीं आन्दोलन हिंसक हो जाता था. इस आन्दोलन का असर यह हुआ कि 1950 तक आते- आते ज्यादातर जमींदारों को समझौता करना पड़ा और वे उपज का एक तिहाई लेने के लिए विवश हुए, किन्तु धीरे- धीरे जमींदारों को मुस्लिम लीग सरकार का सहयोग मिलने लगा और किसानों द्वारा फैलाए गए इस आतंक के खिलाफ सरकार का दबाव बढ़ता गया. किसान नेताओं के ऊपर इतना दबाव बनाया गया कि वे ज्यादातर भूमिगत हो गए अथवा जेलों में बंद कर दिए गए. इसी बीच एक बड़ी घटना हो गई.
वास्तव में 5 जनवरी 1950 को पुलिस की एक टुकड़ी नचोल के थाना इंचार्ज के नेतृत्व में आन्दोलन के केन्द्र चांदीपुर गांव में आई और दो कार्यकर्ताओं को पकड़कर पहले उन्हें बुरी तरह टार्चर किया और फिर उन्हें गिरफ्तार करके ले जाने लगी. यह संथाल बहुल गांव था. सूचनाएं करेंट की तरह चारो तरफ पहुंच गईं. गांव वालों ने संगठित होकर पुलिस की टुकड़ी को घेर लिया और उसमें थाना इंचार्ज सहित पांच सिपाही मारे गए. यह बड़ी घटना थी. सरकार की ओर से प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी. सरकार ने इस आन्दोलन को पूरी तरह दबाने का निर्णय ले लिया. 7 जनवरी 1950 को को दो हजार सैनिकों की एक बड़ी टुकड़ी भेजी गई. इन सैनिकों ने नचोल के 12 गांवों को उजाड़ दिया. घरों में आग लगा दी. सेना के परिष्कृत आधुनिक हथियारों के सामने धनुष बाण चलाने वाले संथाल भला कबतक टिक सकते थे? सैकड़ों की संख्या में किसान विद्रोही माने गए. महिलाओं के साथ बर्बरता की सारी हदें पार कर दी गई. बचे खुचे विद्रोही किसान गिरफ्तार कर लिए गए.
इस दौरान संथाल नेताओं ने अपनी रानी मां को बच कर सुरक्षित स्थान पर भाग जाने के लिए बार- बार आग्रह किया किन्तु उनकी वह बहादुर रानी मां अपने आन्दोलनकारी साथियों को छोड़कर तबतक भागने को तैयार नहीं हुईं जबतक उनके सभी साथी सुरक्षित निकल नहीं जाते. 7 जनवरी की रात में सुरक्षित भागने के क्रम में इला मित्र और उनके पति अलग- अलग ग्रुप में हो गए. रमेन्द्रनाथ मित्र तो अपने ग्रुप के साथ बार्डर पार करने में सफल हो गए किन्तु इला मित्र जो संथाल महिलाओं के वेश में थीं, रोहनपुर रेलवे स्टेशन पर खुफिया पुलिस द्वारा पहचान ली गईं. पुलिस उन्हें गिरफ्तार करके नचोल थाने ले आई. थाने पर पुलिस ने इला मित्र से अपने अनुकूल बयान देने के लिए दबाव डालना शुरू किया. वे चाहते थे कि इला स्वीकार करें कि उन्होंने ही पांचों सिपाहियों को मारने के लिए आन्दोलनकारियों को उकसाया था. उनपर यह भी दबाव डाला जा रहा था कि वे अपने साथी नेताओं के नाम बता दें और उनका भी नाम बता दें जिनके हमलों से सिपाहियों की मौत हुई थी. इला मित्र को अमानुषिक यातनाएं दी गईं. औरत होना भी मानो उनका एक अपराध था. इसके अलावा वे अब मुस्लिम लीग द्वारा शासित पाकिस्तान में रहने वाली हिन्दू थीं, कम्युनिस्ट थीं और उन्होंने आन्दोलनकारियों को भड़काया था. इतनी बर्बर यातनाओं के बावजूद यदि वे जिन्दा रह सकीं तो इसका एकमात्र कारण था कि वे एक एथलीट थीं और कठिन जीवन जीने की अभ्यस्त थीं. 4 दिन तक टार्चर करने के बाद खून से सनी, बुखार से पीड़ित अधमरी अवस्था में वे नवाबगंज पुलिस स्टेशन लाई गयीं. पुलिस द्वारा की गयी ज्यादती के बारे में अपने एक महिला कामरेड भानु देवी को उन्होंने बताया था,
“मुझे दिनभर न तो कुछ खाना दिया गया और न एक बूंद पानी. उसी दिन सिपाहियों ने एस.आई. के सामने अपने बंदूखों के बट से मेरे शरीर और सिर पर बुरी तरह मारना शुरू किया और मुझसे अपराध स्वीकार करने तथा मेरे सहयोगी नेताओं के बारे में जानने के लिए दबाव डालने लगे. पिटाई के नाते मेरे नाकों से खून बहता रहा. इसके बाद सेल में ही एस.आई. ने सिपाही को चार गरम अंडे लाने को कहा और कहा कि यह अब कबूल करेगी. इसके बाद चार -पांच सिपाहियों ने मुझे पीठ के बल लिटा दिया और एक सिपाही ने मेरे गुप्तांग में गर्म अंडा घुसेड़ दिया. मुझे लगा कि मैं आग में जल रही हूँ. कुछ ही देर बाद मैं बेहोश हो गई. दूसरे दिन 9 जनवरी को जब मुझे होश आया तो एस.आई. अपने कुछ सिपाहियों के साथ मेरे सेल में आया और अपने जूते से मुझे मारना शुरू किया. उस समय मैं अर्ध मूर्छित अवस्था में पड़ी थी. वह यह कहते हुए चला गया कि फिर रात में आएगा और यदि मैंने गुनाह स्वीकार नहीं किया तो सिपाही एक- एक करके मुझे रौंद देंगे. आधी रात को जब सभी लोग सो गए थे तो एस.आई. कुछ सिपाहियों के साथ आया और मुझे अपने गुनाह स्वीकार करने के लिए कहा. मैंने कुछ भी कहने को मना कर दिया. उसके बाद तीन चार आदमी मुझे सख्ती से पकड़ लिए और एक सिपाही ने मेरे साथ रेप किया. थोड़ी ही देर में मैं फिर मूर्छित हो गई. दूसरे दिन यानी, 10 जनवरी 1950 को जब मुझे होश आया तो मैंने पाया कि मेरे सारे कपड़े खून से सने हुए थे. उसी अवस्था में मुझे नचोल थाने से नवाबगंज लाया गया.”
इला मित्र के ऊपर एस.आई. और सिपाहियों को मारने का सीधा आरोप लगाया गया. चार्जशीट में लिखा गया था कि पुलिस की टुकड़ी को घेर कर मारने के लिए इला मित्र ने ही किसानों को उकसाया था और भूस्वामियों के खिलाफ भी किसानों को उन्होंने ही लामबंद किया था. इला मित्र को आजीवन कारावास की सजा हुई.
दूसरी ओर इला मित्र की गिरफ्तारी के बाद गावों से सैकड़ों क्रान्तिकारी संथालों और गरीब किसानों को गिरफ्तार करके नचोल पुलिस स्टेशन लाया गया. उन्हें एक साथ सामूहिक रूप से एक ही सेल मे बंद कर दिया गया. सेल में जगह की कमी के कारण बहुतों के हाथ पैर बांध कर बाहर मैदान में ही छोड़ दिया गया. उन्हें पानी भी पीने को नहीं दया गया. उनके बारे में मुस्लिम लीग सरकार को बताया गया कि वे हिन्दू हैं और पाकिस्तान के दुश्मन हैं. अत्यधिक यातना देने तथा भूख और प्यास के कारण बहुत से संथाल मर गए. बाद में जो बचे उन्हें राजशाही जेल में स्थानान्तरित कर दिया गया. इला मित्र के पति सहित बहुत से किसान नेता किसी तरह भारत की सीमा में भाग आए, किन्तु अजहर हुसेन, अनिमेश लाहिड़ी, चित्रा चक्रवर्ती जैसे अनेक अन्य बड़े नेता पकड़े गए और उन्हें जेल की सजा हुई.
इधर अमानुषिक यातनाओं के कारण जेल में इला मित्र की मानसिक और शारीरिक दशा दिन प्रतिदिन बिगड़ती गई. वे मरणासन्न हो गईं. उन्हें नहीं पता था कि कुछ माह पहले जिस बेटे को उन्होंने जन्म दिया था वह बच्चा और उनके पति कहां और किस अवस्था में हैं. उन्हें राजशाही जेल से ढाका सेन्ट्रल जेल लाया गया. वहां स्थिति और बिगड़ने पर लगभग मरने की अवस्था में उन्हें ढाका मेडिकल कालेज में भर्ती कराया गया. धीरे- धीरे पुलिस द्वारा दी गयी उनकी यातना की सचाई चारो ओर फैलने लगी. अनेक सामाजिक कार्यकर्ता, विद्यार्थी और राजनेता उन्हें देखने के लिए आने लगे. पूर्वी बंगाल की विधान सभा में मौलाना भसानी सहित कई दूसरे नेताओं ने उन्हें तत्काल रिहा करने की मांग की और जून 1954 में पैरोल पर उन्हें छोड़ा गया तथा कलकत्ता में इलाज कराने की उन्हें अनुमति मिली.
कलकत्ता आने के बाद इला मित्र को सामान्य होने में चार-पांच साल लग गए. वे दुबारा लौटकर पूर्वी पाकिस्तान नहीं गयीं. किन्तु पूर्वी पाकिस्तान के अपने लोगों को वे हमेशा याद करती रहीं. 1971 के मुक्ति संग्राम में उनका घर और उनका पार्टी कार्यालय मुक्ति कामी लोगों के लिए खुला रहा. पूर्वी पाकिस्तान के आजाद होने और बंगलादेश बनने के बाद 1972 और उसके बाद 1974 में वे बंगलादेश शिक्षक संगठन के सम्मेलन में भाग लेने के बहाने गयीं. वहां उन्होंने बंगबंधु मुजीबुर्हमान से भेंट की. भेंट के दौरान बंगबंधु ने कहा कि वे मित्रा जोड़े को अपना बेटा और बेटी मानते हैं. उन्होंने उनसे बंगलादेश की नागरिकता स्वीकार करने और बंगलादेश लौट आने की गुजारिश भी की जिसे इला मित्र ने विनम्रता पूर्वक अस्वीकार कर दिया.
प. बंगाल में रहते हुए उन्होंने 1957 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से बांग्ला साहित्य में एम.ए. किया और कलकत्ता सिटी कॉलेज (साउथ) में वे बांग्ला की प्रोफेसर बनीं. इसके बाद धीरे- धीरे वे फिर से पश्चिम बंगाल की राजनीति में सक्रिय हुईं. उनके पति भी पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता थे. प्रत्येक परिस्थिति में उनके पति रमेन्द्रनाथ मित्र ने इला मित्र का साथ दिया, धीरज और उत्साह बढ़ाया. बाद में इला मित्र 1967 से 1978 तक लगातार चार बार सीपीआई से एम.एल.ए. निर्वाचित होती रहीं.
इला मित्र और उनके साथियों की लड़ाई का ही परिणाम था कि आजादी के बाद बंगाल में बनी कांग्रेस की सरकार को प्रदेश के रैय्यतवारी कानून में परिवर्तन करने के लिए बाध्य होना पड़ा. आजादी के बाद टिनैंसी कानून में पहला परिवर्तन 1950 में बर्गादार (बटाईदार) कानून के जरिए हुआ. इसमें प्रावधान था कि बटाईदार और जमीन के मालिक के बीच फसल के बंटवारे को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता हो सकता है, लेकिन यदि किसी मामले में कोई विवाद पैदा हो जाए तो ऐसी दशा में बटाईदार को फसल का दो तिहाई हिस्सा मिलेगा और जमीन के मालिक को एक तिहाई. इसके बाद भी 1950 से लेकर 1969 तक इस कानून में जोतने वाले किसानों के पक्ष में कई तरह के संशोधन हुए. आखिर में 1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में वाममोर्चा की सरकार बनने के बाद भूमि सुधार करके भूमि की हदबंदी कर दी गयी और जोतने वालों को समुचित मात्रा में भूमि उपलब्ध कराई गई. भूमि सुधार की इस ऐतिहासिक योजना की सफलता में वाम मोर्चा सरकार में लगातार 19 वर्ष तक भूमि-सुधार मंत्री रहे विनय चौधुरी के योगदान को भी सदा स्मरण किया जाएगा.
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