व्याख्यात्मक आलोचना के आदर्श प्रो.सूर्यप्रसाद दीक्षित ( जनसंदेस टाइम्स , लखनऊ, 6.7.20 को प्रकाशित)

सूर्यप्रसाद दीक्षित( जन्म-5.7.1938) का समीक्षा क्षेत्र व्यापक है. वे आधुनिक साहित्य, मुख्यत: छायावाद के विशेषज्ञ हैं और मानते हैं कि छायावाद आधुनिक हिन्दी कविता का शिखर है. उनके अनुसार साहित्य के सौन्दर्य की, शुद्ध कविता की और वृहत्तर मानव मूल्यों की सर्वश्रेष्ठ साधना छायावाद में प्रतिफलित हुई है. वे मानते हैं कि छायावाद ने कविता को स्वायत्त अनुशासन का रूप दिया है और उसे एक परिपूर्ण व्यवस्था के रूप में परिणत कर दिया है. उनके अनुसार छायावादी कवियों की अंतर्दृष्टि वैश्विक है. सौन्दर्यबोध छायावाद का सर्वाधिक मौलिक प्रदेय है. उनके अनुसार “छायावादी कवियों ने भक्तिकाव्य तथा द्विवेदी युग के परहेजी संस्कार, रीतिकालीन कवियों के कायिक कौतुकी कदाचार और प्रगतिवादियों, प्रयोगवादियों एवं साठोत्तरी पीढ़ियों के यौनाकुल आवेश ज्वार से ऊपर उठकर सौन्दर्य की श्रेष्ठ साधना की है.” उनके अनुसार छायावादी कवियों का सौन्दर्य-विधान इतना व्यापक है, उनका चित्राधार इतना विराट है और उनकी सृष्टि इतनी विलक्षण है कि उसमें प्राय: जीवन का सर्वस्व समाहित हो गया है. दूसरी ओर छायावादी गद्य की खोज करके उन्होंने छायावाद की अभिनव मीमांसा की है. प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी पर उनकी एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं. दीक्षित जी आज की पाठविहीन समीक्षा से असंतुष्ट हैं और भाष्य पद्धति को पुन: प्रतिष्ठित करने के लिए प्रयासरत हैं. उन्होंने ‘राम की शक्तिपूजा’, ‘कुकुरमुत्ता : समीक्षा भाष्य’, ‘पद्मावत भाष्य’ आदि लिखकर व्यवहारिक समीक्षा का एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया है. छायावाद को इतना महत्व देने के बावजूद उनके सबसे प्रिय कवि तुलसी हैं. ‘रामचरितमानस’ को उन्होंने विमानवीकरण के दौर से गुजरते हुए वर्तमान युग की विभीषिका का मुक्तिमार्ग घोषित किया है. उनकी स्थापना है कि एक लेखक कलम के बलबूते पर जो बड़ी से बड़ी वैचारिक क्रान्ति कर सकता है, उसका उत्कृष्ट उदाहरण है ‘मानस’. दीक्षित जी ने स्फुट रूप से आधुनिक काल से पूर्व के शताधिक कवियों की समीक्षाएं की हैं जिनमें सरहपाद, गोरखनाथ, खुसरो, कबीर, सूर, विद्यापति, चंदबरदाई, मीरा, रहीम, केशव, देव, बिहारी, घनानंद, पद्माकर, भूषण, मतिराम, घाघ, द्विजदेव आदि प्रमुख हैं. इसी तरह उन्होंने आधुनिक काल के भारतेन्दु से लेकर रघुवीर सहाय, दुष्यन्त, धूमिल और श्रीकान्त वर्मा तक के साहित्य की समीक्षा की है. हिन्दी साहित्य के एक व्यवस्थित इतिहास की दिशा में दीक्षित जी ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं. लोक साहित्य, दीक्षित जी का प्रिय विषय है. उन्होंने अवधी के लोक साहित्य का विस्तृत अध्ययन और हजारों गीतों, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकनाट्यों, कहावतों आदि का संग्रह भी किया है. शोध में दीक्षित जी की गहरी रुचि है. उन्होंने अल्पख्यात रह गए कई रचनाकारों जैसे- बेनी प्रवीन, गिरधारी, चंदन, चिन्तामणि, युगल अनन्य शरण, शिवसिंह सेंगर आदि की दुर्लभ पाण्डुलिपियां खोज निकालीं और उनका पाठसंपादन किया. दीक्षित जी के अनुसार ज्ञान विज्ञान के साहित्य और जनसंचार विषयक साहित्य के लिए आवश्यक है कि हम भाषा प्रौद्योगिकी और भाषा प्रबंधन के रहस्य को समझें. उन्होंने इस क्षेत्र में भी पर्याप्त काम किया है क्योंकि उनका मानना है कि आज जरूरत है भाषा को और अधिक प्रयोजनपरक बनाने की, ताकि वह जन संचार, जन संपर्क और कैरियर निर्माण में अधिकाधिक उपयोगी हो सके. ‘तुलसी मानस : आस्था का अर्घ्य’, ‘तुलसी मत’, ‘पद्मावत भाष्य’, ‘साकेत : कुछ पुनर्विचार’, ‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त और साकेत’, ‘छायावादी काव्य का व्यावहारिक सौन्दर्यशास्त्र’, ‘राज्याश्रय और साहित्य’, ‘आधुनिक - अत्याधुनिक हिन्दी कवि’, ‘हिन्दी साहित्येतिहास की भूमिका’, ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’, ‘नया साहित्य : नए रूप’, ‘जन पत्रकारिता, जनसंचार और जन संपर्क’, ‘भाषा प्रौद्योगिकी एवं भाषा प्रबंधन’, ‘संचार भाषा हिन्दी’, ‘अवधी भाषा और साहित्य संपदा’, ‘अवधी लोक वाड़मय’ आदि उनके प्रमुख आलोचना ग्रंथ हैं. दीक्षित जी ने ‘उत्कर्ष’, ‘उद्भव’, ‘अवधी’, ‘ज्ञानशिखा’, ‘शोध’, ‘कुलसन्देश’, ‘साहित्य भारती’, ‘संचारश्री’, ‘चाणक्य’, ‘प्रभास’ तथा ‘खोज’ जैसी पत्रिकाओं का समय समय पर संपादन किया है. व्यवस्था, व्यक्ति या विचारधारा- सबसे सामंजस्य बनाकर चलने वाले दीक्षित जी सिर्फ साहित्य के लिए समर्पित हैं. उनके व्याख्यानों में भी एक सिस्टम होता है. वे उसे भी किसी आलेख की तरह प्रस्तावना से शुरू करते हैं और निष्कर्ष पर जाकर खत्म करते हैं. उनके लखनऊ स्थित घर का नाम भी ‘साहित्यिकी’ है. अपने निजी पुस्तकालय को भी उन्होंने एक ट्रस्ट बनाकर सार्वजनिक उपयोग के लिए समर्पित कर दिया है. साहित्यिक अभिरुचि वाले लोग और शोधार्थी उनके ग्रंथालय का लाभ लेने नियमित रूप से जाते हैं. मैंने भी उनकी ‘साहित्यिकी’ का स्वाद लिया है. दीक्षित जी का आलोचना कर्म, ‘कला कला के लिए’ सिद्धांत का उत्तम उदाहरण है.

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