सारस्वत बोध के प्रतिमान : आचार्य रामचंद्र तिवारी ( जनसंदेस टाइम्स में 4 जून को प्रकाशित )
आचार्य रामचंद्र तिवारी ( 4.6.1924- 4.1.2009) शास्त्रीय और व्याख्यात्मक आलोचना के मानदंड की तरह हैं. उन्हें किसी विशेष विचारधारा से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. वे आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परंपरा के ही आलोचक हैं और रस सिद्धांत को साहित्य के मूल्यांकन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानदंड मानते हैं. किन्तु उन्होंने शुक्ल जी का भी अंधानुकरण नहीं किया है. उन्हें जहां भी जरूरत महसूस हुई, विनम्रतापूर्वक अपनी असहमति दर्ज की है. शुक्ल जी के रस संबंधी विवेचन पर अपनी सहमति व्यक्त करते हुए वे शुक्ल जी द्वारा सूरदास के विरह वर्णन को “बैठे ठाले का काव्य” कहने पर अपनी असहमति दर्ज करते हैं और कहते हैं, “वस्तुत: तुलसी को सर्वत्र आदर्श मानकर शुक्ल जी कहीं- कहीं सूर के साथ न्याय नहीं कर पाए हैं. गोपियों के सामने प्रश्न दूरी का नहीं, व्यक्तित्व का है. वे रस रूप कृष्ण की प्रेमिका हैं, राजनीतिज्ञ कृष्ण की नहीं. यदि वे मथुरा जातीं तो भी उन्हें उनका अपना ‘कन्हैया’ कहां मिलता ? वे तो “मोर- मुकुट मकराकृत कुंडल पीत -वसन वनमाली” को प्रेम करती थीं. चक्रसुदर्शनधारी से उनका कोई नाता नहीं था. इसके अतिरिक्त सूर पुष्टिमार्गीय ...
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