नर्मदा घाटी की अखण्ड आवाज : मेधा पाटकर
मेधा पाटकर (जन्म-01.12.1954) अपना 66वां जन्मदिन भी दिल्ली में देशभर से जुटे किसानों के साथ प्रदर्शन करते हुए मना रही हैं. कृषि कानूनों के विरोध में लंबे संघर्ष के लिए, तरह तरह की बाधाएं पार करते हुए वे भी किसानों तथा नर्मदा बचाओ आन्दोलन के अपने सहयोगियों के साथ दिल्ली बार्डर पर डटी हैं. मेधा पाटकर को भी यहाँ पहुँचने में पांच दिन लग गए. उनका कहना है, “संविधान की रक्षा करना जरूरी हो गया है. मजदूर किसान सबके साथ अन्याय हो रहा है. केन्द्र सरकार ने सारा कुछ निजी हाथों में ले लिया है. बस अब खेती किसानी बची है और आम आदमी बचा है. इनका अस्तित्व भी खतरे में है.”(हिन्दुस्तान,27.11.2020) वैसे तो मेधा पाटकर हर दलित पीड़ित प्रताड़ित समुदाय के हक के लिए लड़ने को तत्पर रहती हैं किन्तु उनकी पहचान नर्मदा बचाओ आन्दोलन की अनथक योद्धा के रूप में है. ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ बाँध परियोजनाओं के खिलाफ संभवत: दुनिया का सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला अहिंसक आन्दोलन है. सादा जीवन, सूती साड़ी और हवाई चप्पल पहनने वाली, गाँधीजी को अपना आदर्श और उनके द्वारा दिखाए गए संघर्ष के पथ पर अपनी एकनिष्ठ आस्था रखने वाली मेधा पाटक...
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