मार्क्सवादी आलोचक अजय तिवारी ( 6 मई 2020 को फेसबुक पर )
हिन्दी के समकालीन मार्क्सवादी आलोचकों में अजय तिवारी (जन्म 6.5.1955) का प्रमुख स्थान है. उनकी तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टि, विश्लेषण क्षमता और अपने समाज व इतिहास का व्यापक अध्ययन किसी भी रचना के मूल्यांकन में गलती नहीं करने देता. ‘प्रगतिशील कविता के सौन्दर्य मूल्य’, ‘कुलीनतावाद और समकालीन कविता’, ‘साहित्य का वर्तमान’, ‘पश्चिम का काव्य-विचार’, ‘आलोचना और संस्कृति’, ‘नागार्जुन की कविता’, ‘हिन्दी कविता : आधी शताब्दी’, ‘जनवादी समस्या और साहित्य’, ‘आधुनिकता पर पुनर्विचार : शिल्प और समाज’, ‘राजनीति और संस्कृति- व्यवस्था का आत्मसंघर्ष’, ‘ ‘विवेकानंद का क्रान्तिकारी वेदान्त‘ आदि उनकी प्रमुख आलोचना पुस्तकें हैं.
अजय तिवारी की आलोचना के केन्द्र में नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवि हैं. वे अपने समय और समाज के विश्लेषण में धोखा नहीं खाते. इतिहास और समाज के वे गंभीर अध्येता हैं. साहित्य के किसी विषय, विधा या साहित्यकार पर बात करने से पहले वे उसकी ऐतिहासिक परिस्थितियों तथा राजनीतिक अवधारणाओं की जाँच परख जरूर करते हैं. नई कविता के बहाने आज के भारतीय समाज और राजनीतिक परिस्थितियों का जब वे विश्लेषण करते हैं तो इतिहास के प्रति उनकी वैज्ञानिक दृष्टि का सहज अनुमान हो जाता है. मार्क्सवाद के अलावा बाकी दर्शन उन्हें बेमानी लगते हैं. वे लिखते हैं, “नवस्वाधीन भारत की विकासशील और संघर्षशील परिस्थितियों में अस्तित्ववाद को मोहक बनाने का काम लोहियावाद करता है. जर्मनी जैसे उन्नत देश में ‘समाजवाद’ ने हिटलर का समर्थन किया. भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में ‘समाजवाद’ प्रतिक्रियावाद का समर्थन करता है. नवनिर्माण वाले प्रगतिशील अगर नेहरू की जनवादी भूमिका को अतिरंजित करके देखते थे तो लोहियावादी बुद्धिजीवी ‘नेकनाम नेहरू’ की किसी भी जनतांत्रिक भूमिका को अस्वीकार करते थे. अतिवादी प्रवृत्तियाँ रोमांटिक भावुकता की उपज होती हैं. नई कविता रोमांटिक साहित्य का विरोध करते- करते खुद रोमांटिसिज्म के दलदल में धँस गई, यह बात अधिकाँश नए कवि ही कहने लगे थे.” ( हिन्दी कविता : आधी शताब्दी, भूमिका, पृष्ठ- 15) लोहिया के समाजवाद के विषय में उनकी स्पष्ट मान्यता है कि “लोहिया के ‘शाश्वत प्रतिपक्ष’ का अर्थ समाज में परिवर्तन नहीं है. इस राजनीतिक दर्शन का साहित्यिक अनुवाद है ‘यथार्थ की स्वीकृति.” जाहिर है, एक मार्क्सवादी परिवर्तन का आकाँक्षी होता है यथार्थ की स्वीकृति का नहीं.
अजय तिवारी की आलोचना का प्रमुख क्षेत्र आधुनिक साहित्य है. वे किसी भी रचना का मूल्याँकन समग्रता में करते हैं. विषय के साथ साथ उसके शिल्प पर भी उतना ही ध्यान देते हैं. प्रतिरोध की कविता की हिमायत उनके आलोचक का स्वभाव है, किसी भी परिस्थिति में वे कवि से, जनता के हित में खड़े होने की अपेक्षा नहीं छोड़ते.
अजय तिवारी की पैनी आलोचना-दृष्टि को समझने के लिए उनके द्वारा की गई आधुनिक काल के दो लोकप्रिय कवियों ( नागार्जुन और धूमिल) की तुलना के प्रसंग को देखा जा सकता है. वे लिखते हैं, “ नागार्जुन और धूमिल दोनो प्रखर राजनीतिक चेतना वाले कवि हैं. दोनो की विशेषता यह है कि वे राजनीति को सामाजिक हितों के प्रश्न से अलग करके नहीं देखते. राजनीति और समाज के परस्पर संबंधों का चित्रण दोनो कवि जिस दृष्टि से करते हैं, उसका संबंध भारतीय राजनीति में वामपक्ष से रहा है. इसलिए अक्सर उनमें समानता की खोज की जाती है. वामपंथी दृष्टिकोण के चलते दोनो कवि भारतीय जीवन और समाज की ऐसी अनेक समस्याएं उठाते हैं, जो समानता की इस खोज को पुष्ट करती है. जाति विरादरी, सामंती उत्पीड़न, पूँजीवादी जनतंत्र, शोषण और क्रान्तिकारी परिवर्तन, ऐसे अनेक विषय हैं.”( हिन्दी कविता : आधी शताब्दी, पृष्ठ-37) इन समानता के सूत्रों का उल्लेख करने के बाद वे लिखते हैं,
“ लेकिन ये सभी समानताएं केवल ऊपरी हैं. यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो नागार्जुन की काव्य-दृष्टि अधिक सूक्ष्म भी है और अधिक व्यापक भी. धूमिल वर्ण और वर्ग के संबंधों को लेकर बहुत उलझे हुए हैं. मोचीराम न गाँव का चमार है, न औद्योगिक श्रमिक. वह परिधि पर स्थित असंगठित सर्वहारा है, जिसे लेनिन ‘लुंपेन प्रोलिटेरिएट’ कहते थे. उसकी पीड़ा का चित्रण करना, उसकी ऊर्जा और संभावना का निदर्शन करना उचित है लेकिन भारतीय समाज के जटिल विधान में वह सभी शोषितों और दलितों का एकमात्र प्रतीक नहीं हो सकता. वह जितना गाँव की सामंती संबंध-व्यवस्था से बाहर खड़ा है, उतना ही शहर की पूँजीवादी संबध-व्यवस्था से भी बाहर खड़ा है. “ ( उपर्युक्त, पृष्ठ-37)
इसके बाद अजय तिवारी ‘मोचीराम’ कविता पर आते हैं और लिखते हैं, “ सजीव सामाजिक प्रक्रिया से बाहर खड़ा करके ही धूमिल ने उसे प्रतिनिधि की जगह प्रतीक बनाया है. इस प्रतीक निर्माण में उन्होंने न सिर्फ अपनी धारणाओं और आग्रहों का, बल्कि अपनी भाषा का भी मोचीराम पर आरोपण किया है. यह आरोपण जनताँत्रिक काव्य-दृष्टि का परिचायक नहीं है. अहंकार का परिचायक है. यह अहंकार धूमिल को मोचीराम की नहीं, सामंत वर्ग की बिरादरी में खड़ा करता है. चरित्र की वस्तुगत सत्ता को मिटाकर लेखक जब उसपर आरोपण करता है, तब यथार्थवादी कला के बजाय रोमांटिक कला जन्म लेती है. “ ( उपर्युक्त, पृष्ठ 38)
दूसरी ओर नागार्जुन की ‘हरिजन गाथा’ कविता में उन्हें गाँव के हरिजनों की वास्तविक दशा और उनकी अपनी भाषा के दर्शन होते हैं और वे कहते हैं, “ (हरिजन गाथा में ) समाज के संबंधों में स्थित चरित्र हमारे यथार्थ का पूरा परिदृश्य उपस्थित करते हैं. सामंतों और भूमिहीनों के बीच बढ़ते आर्थिक टकराव के साथ ऊंची और नीची जाति की भावनाएं जुड़ जाती है. इस तरह वर्ण और वर्ग के उलझे हुए रिश्ते की सच्चाई उभरती है.” (उपर्युक्त, पृष्ठ 38)
उनकी दृष्टि में नागार्जुन प्रगतिशील आन्दोलन की उपज हैं और धूमिल साठोत्तरी मानसिकता के. प्रगतिवादी दौर में भारतीय जनता साम्राज्यवाद से लड़ रही थी, भविष्य निर्माण का स्वप्न देख रही थी, जहां- जहां साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष चल रहे थे, वहां- वहां की जनता से अपना संबंध जोड़ रही थी, जबकि धूमिल जिस दौर में कविता रच रहे थे उस दौर में जनता और बुद्धिजीवी के बीच काफी अलगाव आ चुका था. मोहभंग की मानसिकता घर कर चुकी थी. और वे निष्कर्ष देते हुए कहते हैं, “ ‘पटकथा’ जैसी महत्वाकांक्षी रचना भी मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ की भद्दी नकल बनकर रह जाती है. इसीलिए नागार्जुन में हास्य और व्यंग्य है, धूमिल में चिड़चिड़ापन. नागार्जुन में उम्मीद है, धूमिल में पराजयबोध. नागार्जुन में भविष्य है, धूमिल में भविष्यहीनता.” ( उपर्युक्त, पृष्ठ- 39). कहना न होगा, व्यक्ति की चेतना का निर्माण समाज में ही होता है. यही मार्क्सवादी नजरिया है. नागार्जुन और धूमिल के समय की ऐतिहासिक परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए अजय तिवारी अपने इसी मार्क्सवादी दृष्टिकोण का परिचय देते हैं.
अजय तिवारी नई कविता की एक कुलीनतावादी धारा को चिह्नित करते हैं जिसमें मृत्यु-श्रृंगार-अनंत-पतंग भी अमूर्त भाव प्रतीक बनकर ही आते हैं। उनकी एक पुस्तक ही है ‘समकालीन कविता और कुलीनतावाद’.
अजय तिवारी ने समकालीन कथा साहित्य पर भी लिखा है. यहां भी समकालीन उपन्यासों पर लिखते समय, सबसे पहले उनकी दृष्टि सोवियत संघ के विघटन के बाद पैदा हुई परिस्थितियों और वैश्वीकरण के बाद उपस्थित भारतीय यथार्थ पर ही जाती है और वे कहते हैं कि आज हिन्दी में जो समकालीन उपन्यास लिखे गए हैं उनका एक ठोस ऐतिहासिक संदर्भ है. जाहिर है उनकी दृष्टि में मूल्याँकन इसी परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए.
एक सुलझे हुए मार्क्सवादी आलोचक का परिचय देते हुए अजय तिवारी गैरप्रगतिशील कथाकारों के प्रति अन्याय नहीं करते और उन्हें भरपूर प्रतिष्ठा देते हैं. चित्रा मुद्गल के उपन्यास ‘आवाँ’ पर टिप्पणी करते हुए वे नि:संकोच कहते हैं, “ कम से कम दो लेखिकाएं, ऐसी हैं- मृदुला गर्ग और चित्रा मुद्गल, दोनो का मार्क्सवाद से कोई संबंध नहीं है, लेकिन दोनो ने संपत्ति-संबंध की विशेषता से दाम्पत्य- संबंध की विशेषता को जोड़ा. स्त्री के आर्थिक स्वावलंबन को स्त्री की मुक्ति के लिए अनिवार्य शर्त बताया. पितृसत्ता एक ऐसी सार्वभौमिक व्यवस्था है जिसका संबंध संपत्ति के स्वामिकत्व से है, यह बात इन लोगों ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कही.” ( उपन्यास का वर्तमान, पृष्ठ- 71)
अस्मिताओं के उभार के बाद जो उपन्यास लिखे गए हैं उनमें स्त्री संबंधी उपन्यासो की तो वे प्रशंसा करते हैं किन्तु दलित उपन्यास के बारे में कहते हैं कि, “ मुझे बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि कोई दलित उपन्यास ऐसा नही आया जो कहने सुनने लायक हो.” ( उपर्युक्त, पृ,ठ- 71) और वे इसका कारण भी बताते हैं और लिखते हैं, “ सब्जेक्टिविटी उपन्यास के शिल्प का, उपन्यास के स्वर का निर्माण करने में सहायक हो सकती है, लेकिन उस दुनिया का चुनाव, उन घटनाओं का चुनाव, उस तथ्य, विषयवस्तु या अंतर्वस्तु का चुनाव सब्जेक्टिविटी के आधार पर नहीं किया जा सकता. वह सब्जेक्टिविटी अंतर्वस्तु का, संसार का, घटना का निर्माण नहीं कर सकती, जिसे अपनी सबसे बड़ी पूँजी दलित लेखक मानते हैं. इसीलिए दलित उपन्यासकार आत्मकथा लेखक बनकर रह गए.” ( उपर्युक्त, पृष्ठ- 71)
अजय तिवारी के सर्वाधिक प्रिय आलोचक रामविलास शर्मा हैं. कहा जा सकता है कि उन्होंने रामविलास शर्मा की आलोचना परंपरा को आगे बढ़ाया है. मार्क्स की दो सौवीं जयंती के अवसर पर दुनिया में मार्क्स का प्रभाव कम होने के बावजूद उन्होंने लिखा है, “ भारत में मार्क्सवाद का प्रवेश हुआ था, तब ब्रिटिश पूँजीवाद की औपनिवेशिक सत्ता कायम थी. भारतीय जनता अपनी स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रही थी. औपनिवेशिक सत्ता का आधार पूँजी था, इसलिए साम्राज्यवाद से मुक्ति का संघर्ष पूँजी से मुक्ति के संघर्ष से जुड़ गया. राष्ट्रीय उत्पीड़न से मुक्ति का स्वप्न मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण से मुक्ति का सहचर बन गया. इसलिए तत्कालीन बौद्धिक समुदाय में, फिर साधारण जनता में, मार्क्सवाद का प्रभाव अपनी राष्ट्रीय आवश्कता के रूप में बढ़ा. मार्क्सवाद की लोकप्रियता का तब यह आलम था कि कांग्रेस के भीतर जवाहरलाल नेहरू –जयप्रकाश नारायण से लेकर काँग्रेस के बाहर भगत सिंह- चंद्रशेखर आजाद तक राष्ट्रीय मुक्ति के विभिन्न आन्दोलन उसके वैचारिक आलोक में आगे बढ़ रहे थे.” ( हस्तक्षेप, राष्ट्रीय सहारा, 12 मई 2018) उनका विश्वास है कि “लोकप्रियता कम होने पर भी मार्क्सवाद की आवश्कता बहुत अधिक जान पड़ती है क्योंकि वही एक जीवन दर्शन है जो विभाजन के खतरे को रोकने के लिए साम्राज्यवादविरोधी आधार पर विभिन्न राजनीतिक शक्तियों को एक जुट करने की चेतना प्रदर्शित कर सकता है.” ( हस्तक्षेप, राष्ट्रीय सहारा, 12 मई 2018)
हम अजय तिवारी को उनके जन्मदिन पर बधाई देते हैं और सुस्वास्थ्य व सतत सक्रियता की कामना करते हैं.
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