अस्सी के हुए विजय बहादुर सिंह

आज मेरे प्रिय और हमारे समय के महत्वपूर्ण आलोचक और कवि विजय बहादुर सिंह अस्सी वर्ष पूरे कर रहे हैं. 16 फरवरी 1940 को जन्में विजय बहादुर सिंह साहित्य की लोकतांत्रिकता में विश्वास करने वाले आलोचक हैं. उन्होंने अपनी आलोचना की शुरुआत नई कविता की आलोचना से की. ‘आधुनिकता और हिन्दी कविता’ शीर्षक उनका पहला लेख 1964-65 के आस- पास प्रकाशित हुआ. उन्होंने डॉक्टरेट छायावाद पर किया. धूमिल और राजकमल चौधरी पर लिखने के क्रम में वे भवानीप्रसाद मिश्र और नागार्जुन के संपर्क में आए और उसके बाद उनके ऊपर मार्क्स, लोहिया और गाँधी का व्यापक प्रभाव पड़ा. इस तरह विजयबहादुर सिंह की आलोचना दृष्टि के निर्माण में गाँधी, लोहिया और मार्क्स तीनों के दर्शनों का सम्मिलित प्रभाव है. उनके चिन्तन की जमीन भारतीय है. उन्होंने नागार्जुन और भवानीप्रसाद मिश्र को अपनी आलोचना के केन्द्र में रखकर एक ऐसी स्वाधीन आलोचना-दृष्टि विकसित की है जो शास्त्रीय जकड़बंदियों और वादग्रस्त संकीर्णताओं को न केवल झुठला सकी बल्कि उनकी साम्प्रदायिकताओं को भी उजागर करने में आगे रही. साहित्यालोचन में उनकी अंतर्दृष्टि निरंतर नवनिर्माणकारी सृजनशीलता पर रही न कि उस राजनीति पर जो प्रतिभाओं के ईमानदार मूल्याँकन से कहीं अधिक उन्हें दिग्भ्रमित करने की होती है. विजयबहादुर सिंह पर मार्क्सवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव है और यदि कोई चाहे तो इन्हें प्रगतिवादी आलोचकों की श्रेणी में भी रख सकता है, किन्तु, जिस निष्ठा से उन्होंने भवानीप्रसाद मिश्र, नंददुलारे वाजपेयी और दुष्यंत कुमार के साहित्य की समीक्षा की है और उनकी ग्रंथावलियों का संपादन किया है, उसे देखकर उन्हें गाँधीवादी आलोचकों की श्रेणी में रखना मुझे अधिक उचित लगा. ‘छायावाद के कवि : प्रसाद, निराला और पन्त’, ‘नागार्जुन का रचना संसार’, ‘नागार्जुन संवाद’, ‘कविता और संवेदना’, ‘उपन्यास : समय और संवेदना’, ‘महादेवी के काव्य का नेपथ्य’, ‘मुक्ति संघर्ष और साहित्यकार की भूमिका’, ‘लोकप्रिय कविता की कसौटियां’, ‘आचार्य नंददुलारे वाजपेयी’ आदि उनकी प्रमुख आलोचना कृतियाँ हैं. ‘आलोचक का स्वदेश’ जैसी महत्वपूर्ण जीवनी से उन्हें काफी ख्याति मिली. आठ खण्डों में ‘भवानीप्रसाद मिश्र ग्रंथावली’, चार खण्डों में ‘दुष्यंत कुमार ग्रंथावली’ और फिर आठ खंडों में ‘नंददुलारे वाजपेयी रचनावली’ का संपादन करके उन्होंने अपनी शोध -दृष्टि और संपादन क्षमता का भी परिचय दे दिया है. आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के वे प्रिय शिष्य रहे हैं. इसीलिए उनकी ग्रंथावली का संपादन करते हुए वाजपेयी जी की प्रामाणिक और तर्कसंगत समीक्षा कर पाने में वे सफल हो सके हैं. विजयबहादुर सिंह से नागार्जुन का भी गहरा और आत्मीय संपर्क रहा है. इसी आत्मीय संपर्क के आधार पर वे नागार्जुन के रचना संसार से पर्याप्त प्रामाणिक साक्षात्कार करा पाने में सफल हो सके हैं. विजयबहादुर सिंह की महत्वपूर्ण विशेषता उनकी भाषा की सरलता और सहजता है. वो गंभीर से गंभीर विषय को अपनी सरल भाषा में बड़ी ही सहजता से व्यक्त कर देते हैं. एक बातचीत में उन्होंने मुझे बताया कि नागार्जुन ने उन्हें गुरुमंत्र की तरह ‘जनोन्मुखी बौद्धिकता’ नामक शब्द दिया था जिसे उन्होंने अपने लेखन और चिन्तन का अनिवार्य हिस्सा बना लिया. ‘जनोन्मुखी बौद्धिकता’ का तात्पर्य है कि जो भी सोचें या लिखें उसका रिश्ता आम जनता से होना चाहिए और भाषा भी उसी तरह की होनी चाहिए. विजयबहादुर सिंह अपनी परंपरा को टटोलने और उसे निरंतर पुनर्नवा करने में भरोसा रखते हैं. अपनी परंपरा की अर्थवत्ता पर उनका गहरा विश्वास है. मार्क्स से गहरे प्रभावित होने के बावजूद वे इस तथ्य को भली- भाँति समझते हैं कि जहाँ मार्क्स दार्शनिक मात्र हैं वहाँ हमारे गाँधी प्रयोक्ता. विजयबहादुर सिंह ने अज्ञेय, मुक्तिबोध, भवानीप्रसाद मिश्र, नागार्जुन, कुँवरनारायण, शलभ श्रीराम सिंह, मैत्रेयी पुष्पा, बसंत पोतदार तथा शंकरगुहा नियोगी पर विस्तार से लिखा है. वे एक आलोचक का दायित्व भली- भाँति समझते हैं. इसीलिए वे आलोचना करते समय मूल्य- निर्धारण भी करते हैं किन्तु वह सबकुछ अपनी भारतीय जमीन पर करते हैं. उनकी दृष्टि में नागार्जुन और रामविलास शर्मा दो ऐसे मार्क्सवादी हैं जो भारतीय जमीन पर खड़े हैं. ‘आजादी के बाद के लोग’ उनके स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज के चारित्रिक प्रगति और पतन से संबंधित लेखों की चर्चित पुस्तक है. हिन्दू धर्म, भारतीय संस्कृति के सवालों पर भी विजयबहादुर सिंह ने स्वयं को जब-तब एक सचेत नागरिक की जिम्मेदारियों के बतौर केन्द्रित किया है. आज वे जीवन के अस्सी वर्ष पूरे कर रहे हैं. अभी भी वे पूरी तरह सक्रिय और सृजनरत हैं. हम उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं और उनके शतायु होने की कामना करते हैं.

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