अविश्वसनीय प्रतिभा के हिन्दी योद्धा : रांगेय राघव

जिनका आज जन्मदिन है.-3 अविश्वसनीय प्रतिभा के हिन्दी योद्धा : रांगेय राघव मात्र 39 वर्ष की उम्र (जन्म-17.01.1923) और डेढ़ सौ से अधिक ग्रंथों का प्रणयन। ग्रंथ भी साधारण नहीं। कई बहुचर्चित और बहुप्रशंसित। मातृभाषा तेलुगू किन्तु अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत, तमिल पर समान अधिकार। अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच के साहित्यकारों की कृतियों का भी हिन्दी में अनुवाद। अनुवाद भी ऐसा कि शेक्सपियर के नाटकों के अनुवाद देखकर लोग उन्हें ‘हिन्दी का शेक्सपियर’ कहने लगे। वे एक साथ उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार, रिपोर्ताजकार, निबंधकार, कवि, आलोचक, अनुसंधित्सु और अनुवादक थे। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट भी किया था। अगर सारे प्रमाण उपलब्ध न होते तो भला हम विश्वास कैसे कर पाते ? उनके बारे में कहा जाता था कि जितने समय में कोई एक किताब पढ़ता है, उतने में वे एक किताब लिख देते हैं। आगरा में जन्म लेने वाले रांगेय राघव मूलत: तेलुगु भाषी थे और उनका मूल नाम तिरुमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य था। इनकी माता श्रीमती कनकवल्ली और पत्नी का नाम श्रीमती सुलोचना था। उन्होंने स्वयं अपना साहित्यिक नाम ‘रांगेय राघव’ रखा। उन्होंने ‘विषाद मठ’, ‘उबाल’, ‘राह न रुकी’, ‘बारी बरणा खोल दो’, ‘रत्ना की बात’, ‘भारती का सपूत’, ‘यशोधरा जीत गई’, ‘घरौंदा’, ‘लोई का ताना’, ‘लखिमा की आँखें’, ‘मेरी भव बाधा हरो’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘पक्षी और आकाश’, ‘चीवर’, ‘राई और पर्वत’, ‘आखिरी आवाज’, ‘बन्दूक और बीन’ जैसे उपन्यास, कई दर्जन कहानियाँ, ‘अँधेरा रास्ता’ के दो खण्ड तथा ‘रैन और चंदा’ के दो खण्ड जैसे यात्रा वृत्तांत, बड़ी मात्रा में कविताएं, नाटक आदि प्रचुर सृजनात्मक साहित्य का प्रणयन किया है। इसके अलावा उन्होंने ‘जैसा तुम चाहो’, ‘हैमलेट’, ‘वेनिस का सौदागर’, ‘ऑथेलो’, ‘निष्फल प्रेम’, ‘परिवर्तन’, ‘तिल का ताड़’, ‘तूफान’, ‘मैकबेथ’, ‘जूलियस सीजर’, ‘बारहवी रात’ आदि कृतियों सुन्दर अनुवाद भी किया है। रांगेय राघव की पहचान एक प्रतिष्ठित मार्क्सवादी आलोचक की भी है। ‘अधुनिक हिन्दी कविता में विषय और शैली’, ‘आधुनिक हिन्दी कविता में प्रेम और श्रृंगार’, ‘काव्य, कला और शास्त्र’, ‘प्रगतिशील साहित्य के मानदंड’, ‘समीक्षा और आदर्श’, ‘काव्य यथार्थ और प्रगति’, ‘काव्य के मूल विवेच्य’, ‘भारतीय संत परंपरा और समाज’, ‘भारतीय पुनर्जागरण की भूमिका’ आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं। अपने समय के साहित्यिक विवादों में लगातार हस्तक्षेप करने वाले रांगेय राघव प्रगतिवादी आलोचना के सैद्धांतिक चिंतन से आक्रांत होने पर अपनी गहरी चिन्ता प्रकट करते हैं और अनेक मुद्दों पर रामविलास शर्मा से अपनी असहमति प्रकट करते हैं। साहित्य और कला के मूल्यांकन में वर्ग -संघर्ष की भूमिका स्वीकार करते हुए भी वे इसे ही साहित्य के मूल्यांकन का एक मात्र आधार मानने से इनकार करते हैं और प्रगतिशील चिंतन की व्यापकता पर विशेष बल देते हैं। विचारों से मार्क्सवादी होने के बावजूद एक लेखक के लिए पार्टी की अपेक्षा जनता के प्रति प्रतिबद्धता को वे अधिक महत्व देते हैं। किसी भी राजनीतिक दल को वे जन –जीवन के विकल्प के रूप में स्वीकार नहीं करते। किसी भी रचनाकार पर पार्टी के अंकुश को वे सिरे से खारिज करते हैं। उनकी दृष्टि में यदि तुलसी के काल में ‘रामचरित मानस’ के प्रकाशन का निर्णय अकबर के दरबारी मुल्लाओं और कबीर के बारे में सिकंदर लोदी के सभासदों को करना होता तो इतना महत्वपूर्ण साहित्य कभी प्रकाशित ही नहीं हो पाता। कैन्सर जैसे असाध्य रोग से यह अद्भुत प्रतिभाशाली रचनाकार असमय ही (12.09.1962) काल-कवलित हो गया। रांगेय राघव जैसी असाधारण प्रतिभा को हम उनके जन्मदिन पर नमन करते हैं।

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