मेरे सपनों की पार्टी का घोषणा-पत्र
यदि मेरे सपनों की पार्टी सत्ता में आई तो -
1. शिक्षा का ब्यापार पूरी तरह बंद किया जाएगा और सबके लिए समान, मुफ्त और मातृभाषाओं मे गुणवत्तायुक्त शिक्षा की व्यवस्था की जाएगी.
2. “सादा जीवन- उच्च विचार” शिक्षा का मूल लक्ष्य होगा. शिक्षा में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और उदात्त मानवीय मूल्यों को विकसित करने पर जोर दिया जाएगा. ‘मानव संसाधन विकास मंत्रालय’ की जगह मंत्रालय का नाम ‘शिक्षा मंत्रालय’ रखा जाएगा
3. सरकारी अस्पतालों को हर तरह की सुविधाओं से सुसज्जित किया जाएगा तथा सबके लिए समान एवं उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करायी जाएंगी.
4. हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित किया जाएगा.
5. जाति आधारित आरक्षण पूरी तरह से और हर स्तर पर खत्म किया जाएगा.
6. अपने- अपने नामों के साथ लगने वाले जाति सूचक शब्दों को हटाने वाले तथा अंतरजातीय विवाह करने वाले नागरिकों को प्रोत्साहित किया जाएगा.
7. धर्म और संप्रदाय को व्यक्तिगत आस्था के रूप में महत्व दिया जाएगा और धार्मिक कार्यों / आयोजनों को सरकारी सहायता से मुक्त रखा जाएगा.
8. कृषि कार्यों में कृषि-यंत्रों पर निर्भरता की जगह शारीरिक श्रम के महत्व को प्रतिष्ठित किया जाएगा और किसानों को उनकी उपज की लागत का डेढ़ गुना मूल्य दिया जाएगा.
9. न्यूनतम और अधिकतम वेतन में पाँच गुने से अधिक का अंतर नहीं रखा जाएगा.
10. चुनाव प्रचार में सारा खर्च सरकार वहन करेगी. राजनीतिक दलों को मिलने वाले डोनेशन को सार्जनिक करने के लिए कानून बनेगा और उसका लेखा परीक्षण अनिवार्य होगा.
11. सभी स्तरों पर लोकपाल की नियुक्ति की जाएगी.
सारस्वत बोध के प्रतिमान : आचार्य रामचंद्र तिवारी ( जनसंदेस टाइम्स में 4 जून को प्रकाशित )
आचार्य रामचंद्र तिवारी ( 4.6.1924- 4.1.2009) शास्त्रीय और व्याख्यात्मक आलोचना के मानदंड की तरह हैं. उन्हें किसी विशेष विचारधारा से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. वे आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परंपरा के ही आलोचक हैं और रस सिद्धांत को साहित्य के मूल्यांकन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानदंड मानते हैं. किन्तु उन्होंने शुक्ल जी का भी अंधानुकरण नहीं किया है. उन्हें जहां भी जरूरत महसूस हुई, विनम्रतापूर्वक अपनी असहमति दर्ज की है. शुक्ल जी के रस संबंधी विवेचन पर अपनी सहमति व्यक्त करते हुए वे शुक्ल जी द्वारा सूरदास के विरह वर्णन को “बैठे ठाले का काव्य” कहने पर अपनी असहमति दर्ज करते हैं और कहते हैं, “वस्तुत: तुलसी को सर्वत्र आदर्श मानकर शुक्ल जी कहीं- कहीं सूर के साथ न्याय नहीं कर पाए हैं. गोपियों के सामने प्रश्न दूरी का नहीं, व्यक्तित्व का है. वे रस रूप कृष्ण की प्रेमिका हैं, राजनीतिज्ञ कृष्ण की नहीं. यदि वे मथुरा जातीं तो भी उन्हें उनका अपना ‘कन्हैया’ कहां मिलता ? वे तो “मोर- मुकुट मकराकृत कुंडल पीत -वसन वनमाली” को प्रेम करती थीं. चक्रसुदर्शनधारी से उनका कोई नाता नहीं था. इसके अतिरिक्त सूर पुष्टिमार्गीय ...
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