हिन्दी आन्दोलन के भटकाव ( मुक्तांचल, जुलाई-सितंबर,2018 में प्रकाशित )
भाषा, संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण घटक होती है. किसी भी जाति की संस्कृति को मिटा दें तो वह जाति खत्म हो जाती है और उस जाति की संस्कृति को खत्म करने का सबसे सरल उपाय है उसकी भाषा को नष्ट करना. पराई भाषा को ओढ़ने- बिछाने वाली जाति अपना स्वाभिमान, अपनी जातीय अस्मिता सबकुछ स्वयं ही खो दती है. गुलाम मानसिकता उसका संस्कार बन जाता है. एक गुलाम व्यक्ति ही सोचता है कि यदि वह मालिक की जबान बोलेगा तो वह फायदे मे रहेगा.
अपनी स्वाधीनता के लिए जब भी कोई जाति संघर्ष करती है तो प्रकारान्तर से वह अपनी भाषा और संस्कृति की लड़ाई भी साथ-साथ लड़ती है. भारत की संस्कृति दुनिया की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है. यह संस्कृति प्रमुखत: जिस भाषा में अभिव्यक्त होती रही वह संस्कृत भाषा भी दुनिया की सबसे प्राचीन, सबसे समृद्ध और सबसे वैज्ञानिक भाषाओं में से एक है. पाणिनि कृत ‘अष्टाध्यायी’ जैसा पुष्ट और परिपूर्ण व्याकरण ग्रंथ दुनिया की अन्य किसी भाषा के पास नहीं है. किन्तु ग्यारहवीं सदी के बाद तुर्कों, मुगलों, पठानों आदि के आगमन और उनके शासन के बाद इस देश की राजभाषा फारसी हो गई और उसके बाद अंग्रेजों के आने के बाद अंग्रेजी. इस देश में लगभग छ: सौ वर्ष तक फारसी राज- काज की भाषा रही और उसके बाद अंग्रेजी. दुख इस बात का है कि अंग्रेजों के जाने के बाद उनकी अंग्रेजीयत जस की तस बनी रही और आज भी हम सही अर्थों मे आजाद नहीं हो पाए.
संवैधानिक स्वरूप पर सवाल -दरअसल स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान आजादी की जो अवधारणा तमाम स्वतंत्रता-सेनानियों के मन में थी वह पूरी नहीं हुई. सन् सैंतालीस में सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण हुआ था. प्रेमचंद के शब्दों में गद्दी पर ‘जॉन’ की जगह ‘गोविन्द’ बैठ गए. व्यवस्था में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं हुआ. अंग्रेजी सदा शोषकों की भाषा रही है, सत्ताधारी वर्ग की भाषा रही है. देशी अंग्रेज जब गद्दीनसीन हुए तो उन्होंने विरासत में मिली भाषा को सिर आंखों पर बिठाया. देश की बहुसंख्यक जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए उन्होंने हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकृति तो दी पर साथ साथ सह राजभाषा के रूप में अगले पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी को भी यथावत चलते रहने की इजाजत दे दी, इस आश्वासन के साथ कि अगले पंद्रह वर्ष के भीतर हिन्दी को इस लायक बना दिया जाएगा कि वह अंग्रेजी की जगह ले सके. संविधान की धारा 343 (1) के अनुसार “संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी.” किन्तु इसी धारा के खण्ड (2) में लिख दिया गया कि ,” खण्ड (1) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की कालावधि के लिए संघ के उन सब राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा प्रयोग की जाती रहेगी जिनके लिए ऐसे प्रारंभ के ठीक पहले वह प्रयोग की जाती थी. “ नतीजा जो होना था वह सामने है. दुनिया में न तो ऐसा पहले कभी हुआ है और न हो सकता है कि भाषा का पहले विकास किया जाय और बाद में उसकी प्रतिष्ठा हो. वस्तुत: भाषा की पहले प्रतिष्ठा होती है बाद में उसका विकास हो जाया करता है. अंग्रेजों के शासन काल में हमारे देश के राजकाज की भाषा अंग्रेजी थी, सरकारी मुलाजिमों को इसका अभ्यास था. यदि हमें विकल्प चुनने का अधिकार हासिल हो तो स्वाभाविक है हम आसान विकल्प ही चुनेंगें. अंग्रेजी में काम करने का अभ्यस्त व्यक्ति हिन्दी में काम करने की नई समस्याएं क्यों मोल लेगा – यदि उसमें कोई अतिरिक्त आकर्षण न हो ? सत्ता की कुर्सी पर बैठे अभी कुछ ही दिन बीते थे कि नेताओं की राष्ट्रीय चेतना, सत्ता और स्वार्थ की भेंट चढ़ गई. पंद्रह वर्ष की निर्धारित अवधि आने के पहले ही राजभाषा अधिनियम 1963 लाकर यह सुनिश्चित कर दिया गया कि “ संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की कालावधि की समाप्ति हो जाने पर भी, हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा, नियत दिन से ही (क) संघ के उन सब राजकीय प्रयोजनों के लिए जिनके लिए वह उस दिन से ठीक पहले प्रयोग में लाई जाती थी, तथा ( ख) संसद में कार्य के संव्यवहार के लिए प्रयोग में लाई जाती रह सकेगी. “
इस तरह पंद्रह वर्ष की निर्धारित अवधि बढ़ती गई और आज छ: दशक बीत जाने के बावजूद स्थिति जस की तस है. प्रतिवर्ष हजारो करोड़ रूपए सरकारी कार्यलयों में हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने के नाम पर बरबाद होते हैं, मगर दशा में सुधार की कौन कहे, स्थिति दिन प्रति दिन प्रतिकूल होती जा रही है. वर्षों से हिन्दी शिक्षण योजना के माध्यम से सरकारी कर्मचारियों को हिन्दी सिखाई जा रही है और उन्हें प्राज्ञ तथा प्रवीण प्रमाण पत्र दिए जा रहे हैं किन्तु उनसे हिन्दी में काम कराने की कोई पहल नहीं की जा रही है. हिन्दी के नाम पर सारे बजट रोक दिए जाएं और सिर्फ इतना किया जाय कि हिन्दी में काम करने की योग्यता रखने वाला कर्मचारी यदि हिन्दी मे काम नहीं करता है तो उसकी वेतन वृद्धि एक –दो वर्ष न दी जाय और जो हिन्दी में काम करते हैं उन्हें एक -दो अतिरिक्त वेतनवृद्धि का प्रावधान कर दिया जाय तो स्थिति बदलते देर नहीं लगेगी और इसपर खर्च भी नहीं आएगा. किन्तु सरकार की नीयत में ही खोट है, वह राजभाषा के लिए ऐसे किसी दण्ड या पुरस्कार की योजना नहीं लाने जा रही है. उल्लेखनीय है कि संविधान के अनुच्छेद 344 के आधार पर हिन्दी के प्रसार को बढ़ाने के लिए 7 जुलाई 1955 को एक राजभाषा आयोग की नियुक्ति हुई थी जिसके अध्यक्ष एक अहिन्दी भाषी श्री बाल गंगाधर खेर थे. इस आयोग ने जुलाई 1956 में अपना प्रतिवेदन राष्ट्रपति को प्रस्तुत कर दिया था जिसमें सिफारिश की गई थी कि राजभाषा में निर्धारित काम न करने वाले कर्मचारियों या अधिकारियों के लिए कुछ दण्ड की व्यवस्था होनी चाहिए और जो न्यूनतम स्तर से अधिक काम करते हैं उन्हें प्रोत्साहन और पुरस्कार दिया जाना चाहिए. बाद में यह प्रतिवेदन पुनरीक्षण के लिए जब संसदीय समिति के पास पहुँचा तो उसने दण्ड की ब्यवस्था वाले इस प्रावधान पर रोक लगा दी. इस संसदीय समिति के अध्यक्ष एक हिन्दी भाषी श्री गोविन्द वल्लभ पंत थे. सचाई यही है कि हिन्दी भाषियों ने ही हिन्दी का सबसे ज्यादा अहित किया है. आज हमारे देश में अंग्रेजी माध्यम वाले प्राइवेट कान्वेन्ट स्कूलों की बाढ़ आ गई है. शहर हो या देहात, हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूल या तो टूट रहे हैं या अंग्रेजी माध्यम में बदल रहे हैं. हालत यह है कि कई राज्य सरकारें भी अभिभावकों की मांग का हवाला देकर सरकारी विद्यालयों को भी अंग्रेजी माध्यम में बदल रही हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि इस पूरे देश में अब सम्पूर्ण शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से होने जा रही है.
कारण यह है कि जब चपरासी तक की नौकरियों में भी अंग्रेजी अनिवार्य रहेगी तो अंग्रेजी की माँग बढ़ेगी ही. यह एक ऐसा मुल्क बन चुका है जहाँ का नागरिक चाहे देश की सभी भाषाओं में निष्णात हो किन्तु एक विदेशी भाषा अंग्रेजी न जानता हो तो उसे इस देश में कोई नौकरी नहीं मिल सकती और चाहे वह इस देश की कोई भी भाषा न जानता हो और सिर्फ एक विदेशी भाषा अंग्रेजी जानता हो तो उसे इस देश की छोटी से लेकर बड़ी तक सभी नौकरियाँ मिल जाएंगी. छोटे से छोटे पदों से लेकर यू.पी.एस.सी. तक की सभी भर्ती परीक्षाओं में अंग्रेजी का दबदबा है.
व्यवहार ही किसी भी सिद्धांत को परखने की कसौटी होता है. हमारे संविधान का उक्त प्रावधान व्यवहार पर खरा नहीं उतरा. ऐसी दशा में हमारे संविधान की धारा 343 पर पुनर्विचार की जरूरत है. इतना ही नहीं, भारत के संविधान की धारा 348 और 351 पर भी पुनर्विचार की जरूरत हैं. हमारे संविधान की धारा 348 हमें अपनी भाषा में न्याय पाने के मौलिक अधिकार से भी हमें वंचित करता है. उच्चतम न्यायालय से लेकर सभी उच्च न्यायालयों में सारी बहसें और फैसले सिर्फ अंग्रेजी में होने का प्रावधान है. यह ऐसा तथाकथित आजाद मुल्क है जहां के नागरिक को अपने बारे में मिले फैसले को समझने के लिए भी वकील के पास जाना पड़ता है और उसके लिए भी वकील को पैसे देना पड़ता है. मुकदमों के दौरान उसे पता ही नही होता कि वकील और जज उसके बारे में क्या सवाल-जबाब कर रहे हैं.
वस्तुत: प्रत्येक राज्य के उच्च न्यायालयों द्वारा उस राज्य की राज भाषा में न्याय देने का प्रावधान सुनिश्चित होना चाहिए तथा उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के समस्त आदेश, नियम, विनियम आदि के हिन्दी अथवा उस राज्य की राजभाषा के पाठ को ही प्राधिकृत पाठ माना जाना चाहिए. इसी तरह धारा 351 में स्पष्ट उल्लेख है कि अपने शब्द भंडार को बढ़ाने के लिए हिन्दी मुख्यत: संस्कृत से तथा गौणत: अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करेगी. संविधान की इस धारा का दुष्परिणाम यह हुआ है कि सरकारी कार्यालयों में प्रयुक्त होने वाली हिन्दी अत्यंत कृत्रिम और दुरूह हो चुकी है. आजादी के बाद होने वाले भाषा वैज्ञानिक शोधों से यह प्रमाणित हो चुका है कि संस्कृत कभी आम जनता की भाषा नहीं रही और न तो आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएं संस्कृत की बेटियां हैं. आज यह प्रमाणित हो चुका है कि हिन्दी पर संस्कृत से ज्यादा लोक भाषाओं का प्रभाव है. इसलिए संविधान की उक्त धारा में इस तरह का स्पष्ट संशोधन होना चाहिए कि हिन्दी अपने शब्द भंडार के विकास के लिए मुख्यत: आधुनिक लोक भाषाओं से और गौणत: संस्कृत से शब्द ग्रहण करे.
आज की सरकारी हिन्दी सिर्फ अनुवादी हिन्दी है. इसके स्वरूप निर्धारण में प्रो. रघुवीर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. स्वाभाविक रूप से उन्होंने संविधान का अनुकरण किया था. अब समय आ गया है कि हम इस मुद्दे पर पुनर्विचार के लिए सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाएं. आज यह प्रमाणित हो चुका है कि संस्कृत भारतीय भाषाओं की जननी नहीं है. बल्कि भारत की सारी भाषाएं उतनी ही पुरानी है जितनी संस्कृत. वस्तुत: काल के प्रवाह में भाषाओं के स्वरूप में परिवर्तन होता रहा हैं और इस तरह भाषाएं बदलती रही हैं और इसे ही भाषाओं के जन्म के रूप में रेखांकित किया जाता रहा है. दुनिया में भाषाएं सिर्फ मर रही हैं. भाषाओं का जन्म नहीं होता. भारतीय भाषाओं ने संस्कृत से शब्द जरूर ग्रहण किए हैं, किन्तु इस आधार पर वह सबकी जननी नही हो जाती. वैसे भी भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार संस्कृत से वर्तमान हिन्दी तक पहुंचने के लिए उसे पाली, प्राकृत और अपभ्रश से होकर गुजरना पड़ा है. इस तरह हिन्दी संस्कृत की प्रपौत्री हो सकती है बेटी तो कत्तई नहीं. प्रो. रघुवीर यह भी मानते थे कि कोई भी शब्द सरल या कठिन नहीं होता, प्रयोग में आने के बाद शब्द आसान हो जाते हैं. उनकी इस अवधारणा का भी प्रतिकूल असर पड़ा. जो शब्द आसान और जनता में पहले से प्रचलित होते हैं उन्हें अपनाना आसान होता है बरक्स उनके जिन्हें अभी प्रचलित करना है. आज सरकारी हिन्दी जनता से कट गई है. अब बोलचाल और सरकारी कार्यालयों के लिए अलग- अलग हिन्दी है.
राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी और महात्मा गाँधी -
थोड़ी चर्चा हम सन् 1949 में होने वाले संविधान सभा के बहसों को लेकर भी करना चाहते हैं जिसके परिणामस्वरूप धारा 343 वजूद में आया और भारत संघ की राजभाषा ‘देवनागरी लिपि’ में लिखी जाने वाली ‘हिन्दी’ तय की गई. 12 सितंबर से 14 सितंबर 1949 तक लगातार चलने वाली संविधान सभा की यह बहस दो दृष्टियों से अभूतपूर्व थी. एक तो सदस्यों की इतनी बड़ी उपस्थिति अन्य किसी मुद्दे पर होने वाली बहसों में नहीं हुई थी और दूसरी यह कि किसी एक विषय पर इतनी लम्बी बहस भी कभी नहीं चली थी. इस बहस में सबसे अहम मुद्दा था हिन्दुस्तानी और हिन्दी में से किसी एक को राजभाषा बनाने का मुद्दा. हम सभी जानते हैं कि गाँधी जी हिन्दुस्तानी के समर्थक थे. हिन्दी के लिए दशकों पहले से उन्होंने जो प्रयास किया था उसी का परिणाम था कि दक्षिण में ही नहीं, समूचे भारत में हिन्दी के पक्ष में वातावरण तैयार हो गया था. हिन्दी के हित में लगातार काम करते हुए गाँधी जी ने अपनी अवधारणा को अपने अनुभवो से और अधिक पुष्ट किया और निर्णय लिया कि देश की राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी होनी चाहिए जिसे हिन्दी और उर्दू ( फारसी) दोनो लिपियों में लिखा जा सकता है. जो जिस लिपि को जानता है वह उसी लिपि में लिखे. गाँधी जी को इस तथ्य की भली भाँति पहचान हो गई थी कि जिस भाषा को उत्तरी भारत में आम लोग बोलते हैं, उसे चाहे उर्दू कहें चाहे हिन्दी, दोनो एक ही भाषा है. यदि उसे फारसी लिपि में लिखें तो वह उर्दू भाषा के नाम से पहचानी जाएगी और नागरी में लिखें तो वह हिन्दी कहलाएगी. इसीलिए उन्होंने ‘हिन्दुस्तानी’ कहकर इन दोनो के समन्वय का उपयुक्त मार्ग ढूंढ लिया था.
इस हिन्दुस्तानी के इतिहास को भी थोड़ा देखें. हिन्दी का पहला ब्याकरण हालैंड निवासी जॉन जोशुआ केटलर ( john Joshua Ketler ) ने औरंगजेब के शासन काल में अर्थात 1698 ई. में डच भाषा में की थी. इस ब्याकरण ग्रंथ का नाम है, हिन्दुस्तानी ग्रामर. यह पुस्तक फिलहाल उपलब्ध नहीं है किन्तु डेविड मिल द्वारा लैटिन में अनूदित इसके अनुवाद का विस्तृत विश्लेषण डॉ. सुनीति कुमार चाटुर्ज्या ने अपने एक लेख में की है. यह पुस्तक उन्हें लंदन में मिली थी. ( द्रष्टब्य, द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, 1928 ई, ‘हिन्दुस्तानी का सबसे प्राचीन ब्याकरण’ शीर्षक लेख, पृष्ठ-197). ‘राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द का हिन्दी ब्याकरण’ शीर्षक पुस्तक का संपादन करते हुए उसकी प्रस्तावना में डॉ. रामनिरंजन परिमलेन्दु ने लिखा है, “ केटेलर के कालखण्ड ( 1698 ई. के पूर्व) में हिन्दी भाषा के लिए ‘हिन्दुस्तानी’ शब्द का ही व्यवहार किया जाता था.” ( प्रस्तावना, पृष्ठ-4, प्रकाशक नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ). किन्तु सच यह है कि उसके बाद भी लगभग डेढ़ सौ वर्षों तक हिन्दी- व्याकरण के नाम पर जो व्याकरण- ग्रंथ उपलब्ध हैं वे सब के सब हिन्दुस्तानी के ही हैं. बेंजामिन शुल्जे ( Benjamin Schulz) द्वारा लैटिन भाषा में लिखित और 1745 ई. मे प्रकाशित व्याकरण ग्रंथ का नाम है, ‘ग्रामेटिका हिन्दोस्तानिका’ ( Grammatica Hindostanica ). जॉन फार्गुसन ( John Fergusan ) ने ‘ए डिक्शनरी आफ द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’ के नाम से हिन्दुस्तानी भाषा का शब्दकोश बनाया जो 1773 ई. में लंदन से प्रकाशित हुआ. इसी पुस्तक में हिन्दुस्तानी भाषा का व्याकरण भी समाविष्ट है. शब्दकोश की भूमिका में फार्गुसन ने कहा था कि हिनदुस्तानी ही देश अर्थात भारत की सर्वमान्य भाषा है जिसे देश की सभी श्रेणियों और पेशे के लोग, शिक्षित-अशिक्षित, दरबारी और किसान, हिन्दू- मुसलमान समान रूप से समझते हैं. ( द्रष्टव्य, राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द का हिन्दी व्याकरण, संपादक. रामनिरंजन परिमलेन्दु, प्रस्तावना, पृष्ठ- 6) और जिसे हम हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास कहते हैं वह फ्रेंच इतिहासकार गार्सां द तासी ( Garsan de tassy) का ‘इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐंदुई ऐंदुस्तानी’ नाम से दो खण्डों में प्रकाशित हुआ था. एक खण्ड 1839 में और दूसरा खण्ड 1846 में प्रकाशित हुआ था. इसे हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास कहा जाता है किन्तु है यह वास्तव में हिन्दुई और हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास. इसमें हिन्दी और उर्दू ( आज के अर्थ में ) का अलग अलग भाषा के अर्थ में भेद नहीं किया गया है.
इससे भी पहले सन् 1800 में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासनकाल में कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज बना. हमारे देश में वास्तव में आधुनिक काल में खुलने वाला यह पहला शिक्षण संस्थान था. इसके पहले कोई विश्वविद्यालय हमारे देश मे नहीं खुला था. कलकत्ता विश्विद्यालय इस देश का पहला आधुनिक विश्वविद्यालय है जिसकी नींव 1857 में पड़ी थी. फोर्ट विलियम कॉलेज में जिस हिन्दी विभाग के खुलने की चर्चा की जाती है, वह वास्तव में हिन्दुस्तानी विभाग था. जॉन गिलक्रिस्ट ( John Worthwick Gilchrist ) की नियुक्ति 1801 ई. में वास्तव में वहाँ हिन्दुस्तानी के प्रोफेसर के रूप में हुई थी. उनकी व्याकरण की पुस्तक का नाम है, ‘ए ग्रामर आप द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’, जो 1790 ई. में प्रकाशित ही थी. उनकी एक और पुस्तक का नाम हैं, ‘द स्ट्रेंजर्स ईस्ट इंडिया गाईड टु हिन्दुस्तानी’, जो 1802 में प्रकाशित हुई थी. रोएबक ( Roabuck ) द्वारा लिखित ‘एन इंग्लिश ऐण्ड हिन्दुस्तानी डिक्शनरी टू ह्विच इज प्रिफिक्स्ड ए शार्ट ग्रामर आफ हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’ का प्रकाशन भी कलकत्ता से ही 1801 ई. में हुआ था. इतना ही नहीं, जॉन शेक्सपियर ( Joan Shakespear) का ‘ए ग्रामर आफ द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’ का प्रथम संस्करण भी 1813 ई. में लंदन से प्रकाशित हुआ था. उनकी एक और पुस्तक ‘एन इंट्रोडक्शन टु द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’ भी 1845 ई. में प्रकाशित हुई थी. विलियम येट्स ( W.B.Yeats ) द्वारा लिखित ‘इंट्रोडक्शन टु द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’, का प्रकाशन कलकत्ता से 1824 ई. में हुआ था. डंकन फोर्ब्स ( D.Forbes ) कृत ‘हिन्दुस्तानी मैनुअल’ 1845 ई. में लंदन से छपा. ई.बी.इस्टविक ( E.B.Eastwick) लिखित ‘ए कन्साइज ग्रामर आफ द हिन्दुस्तानी लैंग्वेज’ 1847 ई. में लंदन से प्रकाशित हुआ और मोनियर विलियम्स ( Monier Williams ) जैसे प्रसिद्ध विद्वान का भी ‘रूडिमेंट्स आफ हिन्दुस्तानी ग्रामर’ नामक ब्याकरण ग्रंथ 1858 ई. में इंग्लैण्ड से छपा. इसके अलावा इनका ‘ए प्रेक्टिकल हिन्दुस्तानी ग्रामर’ शीर्षक व्याकरण ग्रंथ भी लंदन से 1862 ई. में प्रकाशित हुआ.
क्या इतने व्याकरण- ग्रंथों, शब्द-कोशों आदि का उल्लेख करने के बाद भी इस बात में कोई संदेह रह जाता है कि उस काल खणड में हिन्दुस्तान की आम बोलचाल की भाषा हिन्दुस्तानी ही थी ? वास्तव में उस समय हिन्दवी, हिन्दुई और हिन्दुस्तानी एक ही भाषा के लिए प्रयुक्त शब्द थे और उनमें केवल शैली भेद ही माना जाता था. एक ओर उर्दू के प्रख्यात आलोचक गोपीचंद नारंग को अमीर खुसरो ( 1255-1325) की कविताओं के संकलन का नाम ‘अमीर खुसरो का हिन्दवी काव्य’ रखना पड़ा तो दूसरी ओर नासिख ( 1757-1838 ), सौदा ( 1713-1780 ) और मीर तकी मीर ( 1725-1810 ) आदि ने अनेक बार अपने शेरों को ‘हिन्दी शेर’ कहा है. मिर्जा गॉलिब ने अपने खतों में उर्दू, हिन्दी तथा रेख्ताँ को कई स्थलों पर समानार्थी शब्दों के रूप में प्रयुक्त किया है. मीर का एक मशहूर शेर है,
“क्या जानूं लोग कहते हैं किसको सरूरे कल्ब / आया नहीं है लब्ज ये हिन्दी जबाँ के बीच.”
बहरहाल, फोर्ट विलियम कॉलेज के हिन्दुस्तानी विभाग के प्रोफेसर जॉन गिलक्रिस्ट के अनुसार उस समय हिन्दुस्तानी की तीन शैलियाँ प्रचलित थीं- 1. फारसी या दरबारी शैली 2. हिन्दुस्तानी शैली और 3. हिन्दवी शैली. गिलक्रिस्ट दरबारी या फारसी शैली को आभिजात्य वर्ग में प्रचलित दुरूह मानते थे और हिन्दवी शैली को ‘वल्गर’ यानी गँवारू. उनकी दृष्टि में हिन्दुस्तानी ही “द ग्रेंड पापुलर स्पीच ऑफ हिन्दुस्तान” थी.
आगे चलकर इसी हिन्दुस्तानी की लड़ाई राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द ( 1823-1895 ) ने भी लड़ी. वे अत्यंत सूझ-बूझ वाले व्यक्ति थे. कचहरियों में उस समय फारसी लिपि प्रचलित थी. वे हिन्दी और उर्दू मे भेद नही मानते थे और कचहरियों के लिए एक सर्वमान्य भाषा के प्रयोग के पक्षधर थे जिसे उन्होंने “आमफहम और खास पसंद” भाषा कहा है. राज शिवप्रसाद ने भी हिन्दी व्याकरण की रचना की जो 1875 ई. में बनारस से प्रकाशित हुआ. इस ग्रंथ की भूमिका में उन्होंने लिखा है, “वाणी अर्थात् भाषा बोली को कहते हैं. यहाँ मतलब हिन्दी अथवा हिन्दुस्तानी बोली से है. अर्थात् जो अब हिन्द अथवा हिन्दुस्तान के सर्कार दर्बार और हाट बाजार मे बोली जाती है.” ( राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द का हिन्दी व्याकरण, सं. रामनिरंजन परिमलेन्दु पृष्ठ -18) उनकी मुख्य लड़ाई देवनागरी लिपि के लिए थी. वे कचहरियों के लिए फारसी लिपि की जगह देवनागरी लिपि के लिए कई मेमोरेंडम दिए, जिनमें माँग की कि अदालतों की भाषा से फारसी लिपि को हटा लिया जाय और उसकी जगह हिन्दी ( लिपि) को लागू किया जाय. 1837 ईं. मे हिन्दी और देवनागरी लिपि को कचहरियों में जो प्रतिष्ठा मिली उसमें राजा शिवप्रसाद की प्रमुख भूमिका थी. किन्तु इतिहास में उन्हें खलनायक की तरह चित्रित किया गया है और उनका ऐसा चरित्र निर्मित करने में भारतेन्दु और उनके मंडल की प्रमुख भूमिका थी. भारतेन्दु मंडल के लेखकों ने आरोप लगाया कि वे “देवनागरी में खालिस उर्दू” लिखते हैं सितारेहिंद का खिताब मिलने पर उन्हें अंग्रेजों का चापलूस कहा गया जबकि भारतेन्दु ने स्वयं लार्ड रिपन की प्रशंसा में ‘रिपनाष्टक’ लिखा.
पता नहीं, गाँधी जी को हिन्दुस्तानी के इस इतिहास की जानकारी थी या नहीं, किन्तु अपने अनुभवों से वे भली- भाँति समझ चुके थे कि इस देश की एकता को कायम रखने में हिन्दुस्तानी बड़ी भूमिका अदा कर सकती है और इसी में निर्विवाद रूप से इस देश की राष्ट्रभाषा बनने की क्षमता है.
उनके प्रयास से 1925 में संपन्न हुए कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में प्रस्ताव पास हुआ कि उस तिथि से कांग्रेस की सारी कार्यवाहियाँ हिन्दुस्तानी में होंगी और इस प्रस्ताव के साथ वे आजावन सख्ती के साथ जुड़े रहे. गाँधीजी ने हिन्दुस्तान के नेताओं को हिन्दी बोलना सिखाया. हम ऊपर कह चुके हैं कि गाँधी जी हिन्दी और हिन्दुस्तानी में कोई अन्तर नहीं मानते थे. हिन्दी भाषा के स्वरूप की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा है, “हिन्दी भाषा मैं उसे कहता हूँ, जिसे उत्तर में हिन्दू और मुसलमान बोलते हैं और देवनागरी या फारसी (उर्दू) लिपि में लिखते हैं. ऐसी दलील दी जाती है कि हिन्दी और उर्दू दो अलग -अलग भाषाएं हैं. यह दलील सही नहीं है. उत्तर भारत में मुसलमान और हिन्दू एक ही भाषा बोलते हैं. भेद पढ़े लिखे लोगों ने डाला है....... मैं उत्तर में रहा हूँ, हिन्दू मुसलमानों के साथ खूब मिला जुला हूँ और मेरा हिन्दी भाषा का ज्ञान बहुत कम होने पर भी मुझे उन लोगों के साथ व्यवहार रखने में जरा भी कठिनाई नहीं हुई है. जिस भाषा को उत्तरी भारत में आम लोग बोलते हैं, उसे चाहे उर्दू कहें चाहे हिन्दी, दोनो एक ही भाषा की सूचक है. यदि उसे फारसी लिपि में लिखें तो वह उर्दू भाषा के नाम से पहचानी जाएगी और नागरी में लिखें तो वह हिन्दी कहलाएगी.” ( सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय, खण्ड- 10, पृष्ठ-29 ) . बाद में जब हिन्दी और उर्दू का कृत्रिम भेद गहराया और उसे मजहबी रंग दिया जाने लगा तो उन्होंने हिन्दुस्तानी के पक्ष में दलील देनी शुरू की.
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन से इसी मुद्दे को लेकर उनका विवाद चला और लम्बे पत्राचार के बाद हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. इन सारे विवादों के पीछे की राजनीति का विश्लेषण करते हुए काका साहब कालेलकर ने लिखा है, “ हिन्दी का प्रचार करते हम इतना देख सके कि, हिन्दी साहित्य सम्मेलन को उर्दू से लड़कर हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाना है और गाँधी जी को तो उर्दू से जरूरी समझौता करके हिन्दू-मुस्लिमों की सम्मिलित शक्ति के द्वारा अंग्रेजी को हटाकर उस स्थान पर हिन्दी को बिठाना था. इन दो दृष्टियों के बीच जो खींचातानी चली, वही है गाँधीयुग के राष्ट्रभाषा प्रचार के इतिहास का सार.” ( हिन्दी : मत अभिमत, विमलेशकान्ति वर्मा, पृष्ठ-165)
खेद है कि संविधान सभा में होने वाली बहस के पहले ही गाँधी जी की हत्या हो गई. देश का विभाजन भी हो गया था और पाकिस्तान ने अपने देश की राष्ट्रभाषा उर्दू को घोषित कर दिया था. इन परिस्थितियों का गंभीर प्रभाव संविधान सभा की बहसों और होने वाले निर्णयों पर पड़ा. हिन्दुस्तानी और हिन्दी को लेकर सदन दो हिस्सों मे बंट गया. गाँधी जी के निष्ठावान अनुयायी जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित दक्षिण के डॉ. पी. सुब्बारायन, टी.टी. कृष्णामाचारी, टी.ए. रामलिंगम चेट्टियार, एन. जी. रंगा, एन. गोपालस्वामी आयंगर, एस. बी. कृष्णमूर्ति राव, काजी सैयद करीमुद्दीन, जी. दुर्गाबाई आदि ने हिन्दुस्तानी का समर्थन किया तो दूसरी ओर राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन, सेठ गोबिन्द दास, रविशंकर शुक्ल, अलगूराय शास्त्री, सम्पूर्णानंद, के. एम. मुँशी आदि ने हिन्दी का. बहुमत हिन्दी के पक्ष में था और संविधान सभा ने प्रचंड विरोध के बावजूद देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को संघ की राजभाषा तय कर दिया.
आज सत्तर वर्ष बाद जब हम संविधान सभा के उक्त निर्णय के प्रभाव का मूल्यांकन करते हैं तो हमें लगता है कि हिन्दी को इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. दक्षिण के हिन्दी विरोध का मुख्य कारण यही है. जो लोग पहले गाँधी जी के प्रभाव में आकर हिन्दी का प्रचार कर रहे थे वे ही बाद में हिन्दी के विरोधी हो गए और हिन्दी विरोध का नेतृत्व करने लगे. इतना ही नहीं, हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा न देकर उसे राजभाषा तक सीमित करने के पीछे भी अहिन्दी भाषी सदस्यों की यही नाराजगी काम कर रही थी. संविधान सभा में होने वाली बहसों को पलटकर देखने पर तो यही लगता है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि गाँधी जी के प्रभाव और प्रयास का ही फल था कि दक्षिण में ब्यापक रूप से हिन्दी का प्रचार हुआ. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने मद्रास प्रेसीडेंसी का मुख्यमंत्री रहते हुए 1937 में ही दक्षिण में हिन्दी अनिवार्य कर दिया था. विरोध होने पर विरोधियों के लिए क्रिमिनल लॉ लागू करने में भी संकोच नहीं किया और हजारों विरोधियों को जेल में डाल दिया था. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी गाँधी जी के समधी थे. गाँधी जी के सुपुत्र देवदास गाँधी की शादी सी. राजगोपालाचारी की बेटी से उसी दौर में हुई थी जब देवदास गाँधी हिन्दी का प्रचार करने दक्षिण गए थे. ऐसी दशा में गाँधीजी के प्रस्ताव के विपरीत यदि कोई प्रस्ताव आता है तो दक्षिण भारत के गाँधी जी के अनुयायियों से भला समर्थन की उम्मीद कैसे की जा सकती है ?
गाँधी जी की प्रख्यात अनुयायी श्रीमती जी. दुर्गाबाई, जिनकी कानून की शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हुई थी, मद्रास हाई कोर्ट की वकील थीं, आन्ध्र महिला सभा की सचिव थीं और जिन्होंने कोकानाड़ा में महिला हिन्दी विद्यालय की स्थापना किया था, ने तो सदन में इस ओर स्पष्ट संकेत किया था. मैं उनके वक्तव्य का कुछ अंश यहाँ उद्धृत करना चाहता हूँ, “श्री मान् भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी के अतिरिकित, जो हिन्दी तथा उर्दू का योग है, कुछ और नहीं होनी चाहिए और कुछ हो भी नहीं सकती. ....... कदाचित टंडन जी, सेठ गोविन्द दास जी आदि नहीं जानते और उन्हें पता नहीं है कि दक्षिण में हिन्दी भाषा का कितना प्रबल विरोध हुआ है. विरोधी यह समझते हैं, शायद ठीक ही समझते है कि यह हिन्दी के पक्ष का आन्दोलन प्रान्तीय भाषाओं की जड़ खोदता है और यह प्रान्तीय भाषाओं और प्रान्तीय संस्कृति के विकास के लिए गंभीर बाधा है. श्रीमान्, दक्षिण में हिन्दी विरोधी आन्दोलन बहुत प्रबल है. मेरे मित्र, डॉ. सुब्बारायन ने इस विषय मे कल विस्तृत बातें बताई थीं. किन्तु हमने, हिन्दी के समर्थकों ने क्या किया ? हमने विकट आन्दोलन का सामना किया और दक्षिण में हिन्दी का प्रचार किया. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पंडितों ने भारत की राष्ट्रभाषा बनाने की आवश्यकता समझी, उससे बहुत पहले हम दाक्षिणात्यों ने महात्मा गाँधी के आदेश का पालन किया और दक्षिण में हिन्दी प्रचार आरंभ किया था. हमने पाठशालाएँ चालू कीं और कक्षाएँ आरंभ की. इस प्रकार बहुत असुविधा से हम हिन्दी के प्रचार और शिक्षा में बहुत पहले ही लग गए थे.
श्रीमान्, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के प्रयत्नों के अतिरिक्त, मुझे इस संबंध में दक्षिण की स्त्रियों और बच्चों की भूरि भूरि प्रशंसा करनी चाहिए कि वे हिन्दी सीखने में बहुत लगन से और सच्चे दिल से लगे रहे. श्रीमान्, गाँधी जी के प्रयत्नों और प्रभाव से महाविद्यालयों के विद्यार्थियों में ऐसा जोश था कि दिन भर महाविद्यालयों में कठोर श्रम करने के पश्चात् वे इस भाषा को सीखने के लिए सायंकाल हिन्दी कक्षाओं में आते थे. केवल विद्यार्थी ही नही, वकील, न्यायालय के समय के पश्चात्, पदाधिकारी अपने कार्यालय के कार्य की समाप्ति के पश्चात, सायंकाल में मनोरंजन के स्थानों कर न जाकर हिन्दी कक्षाओं में आकर हिन्दी सीखते थे. मैं आप को यह बात इसलिए कह रही हूँ कि मैं यह सिद्ध करना चाहती हूँ कि हमने महात्मा गाँधी के आदेश और अनुरोध पर हिन्दी प्रचार का कार्य कितने सच्चे दिल से और ईमानदारी से आरंभ किया था.
मेरे मित्रों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह सब कुछ हमने राष्ट्रीय भावनाओं को पूरा करने के लिए स्वेच्छा से किया था. इस संबंध में मैं सेठ जमनालाल बजाज द्वारा 1923 में वहाँ जाने का निर्देश करना चाहती हूँ. उस वर्ष जब सेठ जी काँग्रेस सत्र के लिए कोकीनाड़ा गए थे तब वे कुछ महिला संस्थाओं को देखने गए थे और उन्होंने वहाँ सैकड़ों महिलाओं को हिन्दी पढ़ते देखा था. याद रखिए, श्रीमान् यह बात 1923 की है. सेठ जी महिलाओं को हिन्दी सीखते देख कर इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उस संस्था को एक महान राशि दान देनी चाही. पर संस्था ने उस दान को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि “ हम भी यह अनुभव करते हैं कि हमारी एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए. अत: हम अपने ही प्रयत्नों से इस पाठशाला को चला रहे हैं. “ हमने इसी भावना से कार्य किया था.
अब इसका परिणाम क्या है ? अब मुझे आश्चर्य है कि हमने इस शताब्दी के आरंभ में जिस जोश के साथ हिन्दी अपनायी थी, उसके विरुद्ध इतना आन्दोलन हो रहा है. श्रीमान्, अहिन्दी भाषी लोगों की भावनाओं में कटुता लाने का कारण आप का यह दृष्टिकोण है कि आप शुद्धत: एक प्रान्तीय भाषा को राष्ट्रीय रूप देना चाहते हैं. मुझे भय है कि इससे निश्चय ही उनके भावों और भावनाओं पर बुरा प्रभाव पड़ेगा, जिन्होंने पहले ही देवनागरी लिपि में हिन्दी को स्वीकार कर लिया है. संक्षेप में उनके इस अत्यधिक और कुप्रयुक्त प्रचार के कारण मेरे समान लोगों का समर्थन भी अब प्राप्त नहीं रहा जो हिन्दी जानते हैं और हिन्दी के समर्थक हैं. मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि राष्ट्रीय एकता के हितार्थ हिन्दुस्तानी ही भारत की राष्ट्रभाषा बन सकती है. “ ( उद्धृत, हिन्दी : राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक, विमलेश कान्ति वर्मा, पृष्ठ-335)
पंजाब के सरदार हुकुम सिंह ने अपना पक्ष रखते हे कहा, “ विभाजन से पूर्व उर्दू और हिन्दी में राष्ट्रभाषा बनने के लिए द्वंद्व था. यदि मैं यह कह दूँ तो ये दो कट्टरताएं थीं. उर्दू में फारसी और अरबी में से शब्द लिए जाते थे और हिन्दी में संस्कृत से. अत: दोनो में विरोध था. मेरा तो यह विश्वास है कि इसी कारण एक सामान्य भाषा बनाने का प्रयत्न किया गया था और उसका नाम हिन्दुस्तानी रखा गया था. फिर हमारे कुछ सदस्यों तथा बाहर के लोगों के मन में आशंका थी कि हिन्दुस्तानी शायद उर्दू का ही दूसरा नाम होगा. मेरी तुच्छ सम्मति में यह आशंका अब नहीं रही. विभाजन के पश्चात ऐसी कोई संभावना नहीं है कि हम जो भाषा स्वीकार करेंगे, वह इतनी अबाध रूप से फारसी और अरबी से शब्द लेगी. हाँ, उनसे शब्द लेने का वर्जन नहीं होगा, किन्तु अब ऐसी कोई आशंका नहीं है कि वे मुख्य स्रोत रहेंगे. किन्तु यह आशंका हट जाए तो दूसरी आशंका है, उस भाषा के फारसीनिष्ठ या अरबीनिष्ठ बनने का भय नहीं है तो दूसरा भय है कि उस भाषा का नाम हिन्दी रख दिया जाय पर वह संस्कृनिष्ठ हो. अत: हम इस भय को भी दूर कर देना चाहते हैं और ऐसा हम तब कर सकते हैं जब हम अपनी भाषा को हिन्दुस्तानी कहें, जिसे हमारे अधिकाँश लोग समझ सकें, और हिन्दी न कहें जिसमें उपर्युक्त भय है. इसी कारण मैने प्रस्ताव किया है कि वह हिन्दुस्तानी हो.” ( उद्धृत, हिन्दी : राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक, विमलेश कान्ति वर्मा, पृष्ठ-353)
संविधान सभा में बहस करते हुए काजी सैयद करीमुद्दीन ने कहा, “ सन् 1947 में इंडियन नेशनल काँग्रेस ने यह कबूल किया था कि हिन्दुस्तान की जबान हिन्दुस्तानी होगी जिसके दोनो उर्दू और देवनागरी रसमुलखत होंगे लेकिन आज यह फरमाया जाता है कि सिर्फ देवनागरी रसमुलखत होगा. उसकी वजह यह है जैसे कि मैं बता चुका हूं सन् 47 के पार्टीशन के बाद पाकिस्तान ने अपनी नेशनल ज़बान उर्दू होने का ऐलान किया और उसी के रिएक्शन की वजह से आज यहाँ हिन्दुस्तान में हिन्दी और देवनागरी रसमुलखत मुकर्रर किया जा रहा है. “ ( उद्धृत, हिन्दी : राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक, विमलेश कान्ति वर्मा, पृष्ठ-231 ) और अगले दिन अर्थात 14 सितंबर को मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कहा, “ आज से तकरीबन पच्चीस वर्ष पहले जब यह सवाल आल इंडिया काँग्रेस कमेटी के सामने आया था तो मेरी ही तजबीज से उसने हिन्दुस्तानी का नाम इख्तयार किया था. मकसद् यह था कि ज़बान के बारे में तंगख्याली से काम न लें. ज्यादा से ज्यादा वसीह मैदान पैदा कर दें. हिन्दुस्तानी का लफ्ज इख्तयार करके हमने हिन्दी और उर्दू के इख्तेलाफ को भी दूर कर दिया था. क्योंकि जब आसान उर्दू और आसान हिन्दी बोलने और लिखने की कोशिश की जाती है तो दोनो मिलकर एक जबान हो जाती हैं. तब उर्दू और हिन्दी का फर्क बाकी नहीं रहता. “ ( उद्धृत, हिन्दी : राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक, विमलेश कान्ति वर्मा, पृष्ठ-387) मोहम्मद इस्माईल ने गाँधी जी को उद्धृत करते हे कहा कि “ भारत के करोड़ो ग्रामीणों को पुस्तकों से कोई मतलब नहीं है. वे हिन्दुस्तानी बोलते हैं जिसे मुस्लिम उर्दू लिपि में लिखते हैं तथा हिन्दू उर्दू लिपि या नागरी लिपि में लिखते हैं. अतएव मेरे और आप जैसे लोगों का कर्तव्य है कि दोनो लिपियों को सीखें.” उद्धृत, उपर्युक्त, )
. कथा सम्राट मुँशी प्रेमचंद तो पहले उर्दू में ही लिखते थे और बाद में हिन्दी में आए. हिन्दी और उर्दू को लेकर उन्होंने ‘साहित्य का उद्देश्य’ नामक अपने मशहूर निबंध मे लिखा है., “ उर्दू वह हिन्दुस्तानी जबान है जिसमें फारसी- अरबी के लब्ज ज्यादा हों, उसी तरह हिन्दी वह हिन्दुस्तानी है जिसमें संस्कृत के शब्द ज्यादा हों, लेकिन जिस तरह अंग्रेजी में चाहे लैटिन या ग्रीक शब्द अधिक हों या ऐंग्लोसेक्सन, दोनो ही अंग्रेजी है, उसी भाँति हिन्दुस्तानी भी अन्य भाषाओं के शब्दों के मिल जाने से कोई भिन्न भाषा नहीं हो जाती.” ( साहित्य का उद्देश्य, पृष्ठ- 124))
हिन्दी और हिन्दुस्तानी को लेकर गाँधी जी और राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन के बीच लम्बा पत्र व्यवहार हुआ था किन्तु राजर्षि टण्डन अपने हिन्दी के एजेन्डे से चिपके रहे और अंतत: गाँधी जी को इसी मुद्दे को लेकर हिन्दी साहित्य सम्मेलन से त्याग पत्र देना पड़ा.
वैसे भी हिन्दुस्तानी कहने से जिस तरह व्यापक राष्ट्रीयता और सामाजिक समरता का बोध होता है उस तरह हिन्दी कहने से नहीं. जैसे पंजाबियों की पंजाबी, मराठियों की मराठी, बंगालियों की बंगाली, तमिलों की तमिल, गुजरातियों की गुजराती का बोध होता है उसी तरह हिन्दुस्तानी कहने से हिन्दुस्तानियों की हिन्दुस्तानी का बोध होता है. इस शब्द में न तो क्षेत्रीयता की गंध है और न जाति-धर्म की संकीर्णता की. निश्चित रूप से हिन्दुस्तानी की जगह हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया जाना एक बड़ी ऐतिहासिक भूल थी और इतिहास की इस भूल का भयंकर दुष्परिणाम आज भी हम झेल रहे है. किसी ने कहा है,
“तारीख की नजरों ने वो दौर भी देखा है,/ लमहे ने खता की थी सदियों ने सजा पाई.”
इस ऐतिहासिक भूल का परिणाम हम आज भी भुगत रहे हैं. हिन्दी आज भी दक्षिण का ही नही, भारत के दूसरे हिस्से के लोगों का भी विरोध झेल रही है. बल्कि आज तो हिन्दी वाले ही हिन्दी का सबसे बड़े दुश्मन बन बैठे हैं. वैश्वीकरण और हिन्दी की निर्मिति - यद्यपि हिन्दी की प्रतिष्ठा की लड़ाई भारतीय नवजागरण के दौर में शुरू हुई किन्तु खड़ी बोली हिन्दी का स्वरूप ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन काल मे ही निर्मित होने लगा था. जोशुआ मार्शमैन, विलियम वार्ड और विलियम कैरे ने विचार विमर्श करके 16 जनवरी सन् 1800 को सेरामपुर में इसाई धर्म के प्रचार के लिए मिशन की स्थापना की थी और सन् 1801 में उसी प्रेस से ‘न्यू टेस्टामेंट’ का पहला बंगला संस्करण प्रकाशित हुआ था. भारत में सबसे पहले नागरी लिपि की बड़ी टाईप का निर्माण भी सेरामपुर में ही सन् 1803 में हुआ. इसके पूर्व सन् 1800 में ही कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हो चुकी थी. बंगाल में हिन्दी –उर्दू गद्य की नींव डालने में इस कॉलेज की अन्यतम भूमिका थी.. तारिणीचरण मित्र ने ‘बैताल पचीसी’, लल्लू लाल ने ‘प्रेमसागर’ और सदल मिश्र ने ‘नासिकेत कथा’ लिखकर खड़ी बोली हिन्दी की गद्यशैली निर्धारित कर दी. इतना ही नहीं, 1857 का आन्दोलन मुख्यत: हिन्दी के माध्यम से लड़ा गया था. धाराप्रवाह संस्कृत बोलने वाले आर्यसमाज के प्रतिष्ठापक गुजराती भाषी पहर्षि दयानंद सरस्वती जब वंगाल में ब्रह्मसमाजी केशवचंद्र सेन से मिले तो सेन महाशय ने महर्षि दयानंद सरस्वती को हिन्दी सीखने की सलाह दी. यह घटना 1872 ई. की है. उन्हीं की प्रेरणा से महर्षि दयानंद सरस्वती ने हिन्दी सीखी और अपना महान ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ हिन्दी में लिखा. राजा राम मोहन राय स्वयं अपना ‘बंगदूत’ बांग्ला, अंग्रेजी और फारसी के साथ हिन्दी में भी निकाला. वैसे तो हिन्दी की प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ने वाले ज्यादातर अहिन्दी भाषी ही हैं किन्तु हिन्दी क्षेत्र में भी इस आन्दोलन को आगे ले जाने वालों की संख्या कम नहीं है. राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द, राजा लक्ष्मण सिह, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तमदास टंडन और महावीर प्रसाद द्विवेदी से लेकर यह परंपरा मुंशी प्रेमचंद से होते हुए आज तक चली आ रही है.
पिछली सदी के अन्तिम दशक में दुनिया में असाधारण घटना घटी. वह घटना थी सोवियत संघ का पतन और दुनिया भर में समाजवाद का पराभव. द्वितीय विश्वयुद्द के बाद दुनिया की यह सबसे बड़ी घटना थी. सोवियत संघ के पतन अर्थात 1990 के बाद जो भूमंडलीकरण आया उससे दुनिया एक ध्रुवीय हो गई. इसका व्यापक प्रभाव हमारी भाषाओं पर भी पड़ा है. हमारा देश भी इस ग्लोबल दुनिया का एक हिस्सा बनकर विशव- बाजार में तब्दील हो गया है. बाजार में भले ही कई भाषाएं प्रचलित हों किन्तु वर्चस्व उस भाषा की होती है जिस भाषा के बोलने वालों का बाजार पर कब्जा होता है. निस्संदेह वह भाषा अंग्रेजी है. इसलिए हिन्दी सहित इस देश की सभी भाषाएं अब हासिए पर चली गई हैं. मीडिया भी आज बाजार का एक हिस्सा है और उनके हाथों का औजार है जिनका बाजार पर कब्जा है, इसलिए बाजार के हित से अलग उसका कोई स्वतंत्र रोल नहीं रह गया है.
पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में एक ज्ञान आयोग का गठन किया था जिसके अध्यक्ष सैम पित्रोदा थे. इस आयोग ने सुक्षाव दिया था कि देश के आम लोगों को स्कूलों में भाषा के रूप में अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढ़ायी जाए. वह एजूकेशन फार आल के नाम पर इंग्लिश फार आल था जिसे लागू करना सरकार की मजबूरी थी क्योंकि यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की अघोषित शर्त थी. अब वह एजेन्डा काफी कुछ पूरा किया जा चुका है इसीलिए विगत दस-पंद्रह वर्षों में पल बढ़ कर बड़ी हुई पीढ़ी के लिए दिनों, फलों, सब्जिओं, पशु- पक्षियों, रिश्तों आदि के नाम अबोधगम्य और कठिन हो चुके हैं. अब रविवार, सोमवार की जगह संडे, मंडे, विशवविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी, माता पिता की जगह मॉम, डैड, लाल-पीले की जगह रेड- एलो, केले -सेब की जगह बनाना -एपिल ही बच्चे जानते हैं. उल्लेखनीय है कि हमारे शब्द हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा होते हैं और जब कोई शब्द हमारे जीवन से गायब होता है तो उसी के साथ हमारी संस्कृति का एक हिस्सा भी विलुप्त हो जाता है. आज इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया दोनो ने अपने प्रसारणों और प्रकाशनों से यह बात पूरी तरह हमारे भीतर बैठा चुकी है कि आज भारत में युवा होने का वास्तविक प्रमाण है पश्चिम की संस्कृति और अंग्रेजी. हमारी युवा पीढ़ी की भाषा, भूषा और भोजन तीनो बदल चुका हैं. हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाएं आज नहाने धोने खाने पीने और नाचने गाने की भाषाएं हैं विचार की भाषा सिर्फ अंग्रेजी है.
बहरहाल, हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की लड़ाई व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का ही एक हिस्सा है, आर्थिक सामाजिक असमानता के खिलाख लड़ी जाने वाली लड़ाई का ही एक हिस्सा है. अंग्रेजी के वर्चस्व का मूल लक्ष्य है देश की दलित शोषित जनता को बराबरी के हक से वंचित करना तथा आन्दोलन की शक्ति से अपरिचित रखना. माओ-त्से-तुंग ने अपने देश में अंग्रेजी की शिक्षा बन्द कर दी थी. अपनी भाषा की प्रतिष्ठा हो जाने के बाद तेंग ने वैकल्पिक विषय के रूप में अंग्रेजी को अपनाया था. चीनी भाषा, दुनिया की सबसे कठिन भाषाओं में से एक है. चीन ने आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जिस उंचाई तक छलांग लगई है वह अपनी चीनी भाषा के माध्यम से. चीन का अकेला उदाहरण ऐसे लोगों का मुंह बंद करने के लिए पर्याप्त है जो कहा करते हैं कि विज्ञान, मेडिकल या प्रौद्योगिकी की शिक्षा अंग्रेजी के अलावा अन्य किसी भाषा में नहीं दी जा सकती. वैसे आज तक दुनिया का कोई भी देश दूसरे की भाषा में शिक्षा पाकर महाशक्ति नहीं बन सका है. अमेरिका, इंग्लैण्ड, जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि सभी महाशक्तियाँ अपने विद्यार्थियों को अपनी भाषाओं में शिक्षा देती हैं.
दरअसल, आदमी चाहे जितनी भी भाषाएं सीख ले वह सोचता अपनी ही भाषा में है. आज हमारे विद्यार्थियों का आधा श्रम और समय दूसरे की भाषा को सीखने में चला जाता है क्योंकि देश के 95 फीसदी विद्यार्थियों की मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है. उन्हें दूसरे की भाषा में पढ़ना पड़ता है उसे अपनी भाषा में सोचना- समझना पड़ता है और फिर लिखने के लिए अंग्रेजी में ट्रांसलेट करना पड़ता है. पिछले दिनों इसी विषय पर एक गंभीर पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसका नाम है, ‘भाषा नीति : द इंग्लिश मीडियम मिथ, डिशमैटलिंग बैरियर्स टु इंडियाज ग्रोथ’. संक्रान्त सानू, राजीव मल्होत्रा और कार्ल क्लेमेन्स ने पराई भाषा के माध्यम से मिलने वाली शिक्षा के परिणाम का प्रामाणिक अध्ययन किया है. लेखकों ने दुनिया के अग्रणी बीस देशों का आकलन किया है. वे अग्रणी देश अपनी- अपनी भाषाओं के माध्यम से शिक्षा, शोध, शासन, कानून, विज्ञान, तकनीक और उद्योग चलाते हैं. जबकि सबसे पिछड़े बीस देशों में से सिर्फ नेपाल और यूथोपिया दो ऐसे देश हैं जिनके यहां शासन की भाषा भी उनकी अपनी भाषाएं हैं बाकी सभी ऐसे है जो किसी विदेशी भाषा को अपनी शिक्षा और सत्ता की भाषा बनाए हुए हैं. इस अध्ययन से स्पष्ट है कि किसी देश की बहुमुखी प्रगति यानी, संपूर्ण जनता की समान भागीदारी के लिए बिदेशी भाषा का जामा उतारना अनिवार्य है.
उल्लेखनीय है कि इजराइल जैसे देश ने कुछ वर्ष पहले अपने यहां की विस्मृत पुरानी भाषा, हिब्रू को अपनी शिक्षा और शासन का माध्यम बना कर वह सब कुछ उपलब्ध किया जो दुनिया के किसी भी सर्वोत्तम विकसित देश में है. इजराइल में विज्ञान, तकनीक और शोध-कार्य हिब्रू में होता है. यही स्थिति जर्मनी, जापान, रूस, फ्रांस, चीन, कोरिया आदि सभी विकसित देशों में है. इसके विपरीत जिन देशों में किसी विदेशी भाषा में काम होता है वहां थोड़े से लोगों को छोड़कर शेष आबादी गुलामों की तरह पिछड़ी और हीनता की ग्रंथि से ग्रसित है.
आज हिन्दी और अपने देश की अन्य भाषाएं प्यार की, संवेदना की, संगीत की, साहित्य की, कला की और परस्पर संपर्क की भाषाएं हैं. यदि इन्हें रोजी रोटी की भाषा भी बना दी जाए तो सारी समस्याएं स्वत: हल हो जाएंगी. प्रेमचंद ने कहा है, “ राष्ट्र की बुनियाद राष्ट्र की भाषा है. नदी पहाड़ और समुद्र राष्ट्र नहीं बनाते. भाषा ही वह बंधन है जो चिर काल तक राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधे रहती है और उसका शींराजा ( संरचना ) बिखरने नहीं देती.”
ईई-164/402, सेक्टर-2, साल्टलेक, कोलकाता-700091 ई-मेल: amarnath.cu@gmail.com Mobile: 9433009898
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